मुर्गे की लड़ाई में नपेंगे नेता! Cockfights पर हाई कोर्ट सख्त, आंध्र प्रदेश सरकार को दिया ये आदेश

मकर संक्रांति के मौके पर आंध्र प्रदेश में इस बार भी मुर्गे की लड़ाई आयोजित करवाने के मामले सामने आए हैं। ऐसे कार्यक्रमों में नेताओं के शामिल होने पर हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।

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मकर संक्रांति के मौके पर मुर्गे की लड़ाई को बढ़ावा दिए जाने के मामले में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्य सरकार से ऐसे आयोजनों में शामिल नेताओं के नाम और पूरा पता बताने को कहा है। गौरतलब है कि पशु-पक्षियों के खिलाफ क्रूरता कानून के तहत इस तरह के खेलों पर प्रतिबंध है, लेकिन फिर भी राज्य में ऐसे आयोजन किए जा रहे हैं, जिसके वीडियो सोशल मीडिया से लेकर मेन स्ट्रीम मीडिया तक पर आ रहे हैं। सरकार की ओर से बताया गया कि इसमें कोई भी नेता नहीं पहुंचा था, तो अदालत ने कहा कि टीवी पर देखा है कि जनप्रतिनिधि ऐसे कार्यक्रमों में हिस्सा ले रहे हैं।

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    मुर्गे की लड़ाई में नपेंगे नेता!

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    मकर संक्रांति उत्सव के नाम पर मुर्गे की लड़ाई में जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट को पूरी तरह से नागवार गुजरी है। अदालत की एक डिविजन बेंच ने आंध्र प्रदेश सरकार को आदेश दिया है कि संबंधित जन प्रतिधनियों के पदों और पतों की पूरी डिटेल अगली सुनवाई में कोर्ट के सामने पेश किया जाए। अदालत ने कहा है कि वह मुर्गे की लड़ाई के दौरान उसमें भागीदारी करने वाले जनप्रतिनिधियों को नहीं बख्शेगा। मीडिया रिपोर्ट के मुतताबिक एक ऐसे ही मामले में हाई कोर्ट की बेंच ने टीडीपी एमएलए ए सत्या प्रसाद, ए सतीश प्रभाकर और पूर्व एमएलए देवीनेनी, मल्लिकार्जुन राव और एम वेंकट सुबैया को कथित रूप से गुंटूर जिले में त्योहार के दौरान कॉक-फाइट (cock-fights)आयोजित करने के आरोप में नोटिस जारी किया है।

    जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है अदालत

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    हाई कोर्ट के ऐक्टिंग चीफ जस्टिस रमेश रंगनाथन और जस्टिस के विजय लक्ष्मी की अदालत मुर्गे की लड़ाई की आड़ में आंध्र प्रदेश के पश्चिमी गोदावरी जिले में मकर संक्रांति के दौरान चलने वाले कथित जुआ, शराब की गैर-कानूनी बिक्री और वेश्यावृत्ति के मामले को रोकने में सरकार के नाकाम रहने के खिलाफ दायर जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही है।

    1960 के कानूनों पर अमल करने की मांग

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    याचिकाकर्ता के रामचंद्रन राजू ने अदालत से राज्य सरकार को प्रिवेंशन ऑफ क्रूअल्टी टू एनिमल्स ऐक्ट, 1960 और आंध्र प्रदेश गेमिंग ऐक्ट, 1974 के प्रावधानों पर अमल करने और त्योहारों के दौरान असामाजिक तत्वों को मुर्गे की लड़ाई और जुआबाजी रोकने के लिए निर्देश देने की मांग की है। अदालत का इस मामले में रुख शुरू से ही कड़ा है और सरकारी अधिकारियों के टाल-मटोल वाले रवैए पर वह सख्त रुख दिखा चुकी है।

    'मुर्गे की लड़ाई पर रोक बिना चूक तामील हो'

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    अदालत ने गुंटूर जिले के वकील टी भानू प्रकाश की ओर से दायर याचिका पर नेताओं को नोटिस जारी किया है, जिसके तहत सत्ताधारी दल के विधायकों और विधान पार्षदों के खिलाफ गुंटूर में मुर्गे की लड़ाई आयोजित करने के खिलाफ केस दर्ज करने की मांग गई है। पिछले 4 जनवरी को बेंच ने अदालत के आदेशों के उल्लंघन के लिए राज्य के चीफ सेक्रेटरी और डीजीपी को जिम्मेदार ठहराते हुए स्पष्ट किया था कि 2016 में मुर्गे की लड़ाई पर रोक लगाने के आदेश को सरकार बिना चूक तामील करवाए।

    राज्य सरकार की दलील को अदालत ने ठुकराया

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    जब यह मामला पिछले सोमवार को बेंच के सामने सुनवाई के लिए लाया गया तो आंध्र प्रदेश के एडवोकेट जनरल दमालापति श्रीनिवास ने कोर्ट को बताया कि किसी भी जनप्रतिनिधि ने मुर्गे की लड़ाई का आयोजन नहीं करवाया। इसपर बेंच ने कहा कि उन्होंने टीवी चैनलों पर जनप्रतिनिधियों को मुर्गों की लड़ाई में हिस्सा लेते और उन कार्यक्रमों के बारे में बात करते देखा है। इसके बाद अदालत ने इस मामले पर चल रही सुनवाई को चार हफ्तों के लिए स्थगित कर दिया है। (तस्वीरें- सोशल मीडिया वीडियो)

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