Amrit Mahotsav: 'खुश रहो अहले-वतन, हम तो सफर करते हैं', बिस्मिल के शब्द भरते थे क्रांतिकारियों में जोश
नई दिल्ली, 9 अगस्त। भारत आजादी का अमृत महोत्सव मना रहा है। ये आजादी हमें बहुत सारे त्याग और बलिदान से मिली है। इन आजादी के लिए ना जाने कितनी मांओं की गोदें सूनी और कितनी औरतों से उनका सुहाग दूर हुआ था। त्याग, भरोसे और समर्पण की इस लड़ाई में बहुत सारे बच्चों के सिर से उनके मां-बाप का साया उठ गया था। ये देश कर्जदार है उनका लाखों वीरों का जिन्होंने भारत माता को अंग्रेजों से आजादी दिलाने के लिए हंसते-हंसते जान न्यौछावर कर दी।

इस आजादी में उन कवियों और लेखकों का भी अमर योगदान हैं, जिनकी कविताएं और लेख स्वतंत्रता संग्राम लड़ रहे वीरों के अंदर जोश भर देते थे। आजादी के इस अमृत महोत्सव पर आइए आपको रूबरू कराते हैं ऐसे ही कवियों और लेखकों से जिन्होंने अपने शब्दों से आजादी की लड़ाई को रेखांकित किया है।

इस लिस्ट में पहला नाम आता है क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल का, 11 जून 1897 को यूपी के शाहजहांपुर के पं. मुरलीधर के घर जन्मे राम प्रसाद के हाथों में दस उंगलियां थीं। जिन्हें देखने के बाद एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी की थी 'ये बालक अगर जी गया तो ये चक्रवर्ती सम्राट बनेगा।'
आजादी को अपने जीवन का मकसद मानने वाले राम प्रसाद बहुत अच्छे रचनाकार थे। उन्होंने अपनी लेखनी से ना केवल क्रांतिरकारियों के अंदर जोश भरा बल्कि उन्होंने अपनी रचनाओं में देश के संघर्ष को बखूबी बयां भी किया है। मात्र 30 वर्ष की आयु में देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले राम प्रसाद बिस्मिल ने अपने 11 वर्ष के क्रान्तिकारी जीवन में 11 पुस्तकें लिखीं थी। गौरतलब है कि राम प्रसाद ने ही मैनपुरी और काकोरी जैसे कांड में शामिल होकर अंग्रेजों के खिलाफ विरोध का बिगुल फूंका था।

यहां हैं राम प्रसाद बिस्मिल की कुछ लोकप्रिय कविताएं...
- बला से हमको लटकाए अगर सरकार फांसी से,
- लटकते आए अक्सर पैकरे-ईसार फांसी से।
- लबे-दम भी न खोली ज़ालिमों ने हथकड़ी मेरी,
- तमन्ना थी कि करता मैं लिपटकर प्यार फांसी से।
अमीरी को मिट्टी में मिला दूंगा
- दुनिया से गुलामी का मैं नाम मिटा दूंगा,
- एक बार जमाने को आज़ाद बना दूंगा।
- बेचारे गरीबों से नफरत है जिन्हें, एक दिन,
- मैं उनकी अमीरी को मिट्टी में मिला दूंगा।
खुश रहो अहले-वतन! हम तो सफर करते हैं
- सर फिदा करते हैं कुरबान जिगर करते हैं,
- पास जो कुछ है वो माता की नजर करते हैं ,
- खाना वीरान कहाँ देखिये घर करते हैं!
- खुश रहो अहले-वतन! हम तो सफर करते हैं ।
सुख-शांति-कान्तिमय हो
- ऐ मातृभूमि तेरी जय हो, सदा विजय हो ।
- प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शांति-कान्तिमय हो ।।
- अज्ञान की निशा में, दुख से भरी दिशा में,
- संसार के हृदय में तेरी प्रभा उदय हो ।












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