कृषि क़ानून: मोदी सरकार किसानों के आगे झुक गई या नया दाँव मास्टर स्ट्रोक है?

नरेन्द्र मोदी
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"कृषि सुधार क़ानूनों के क्रियान्वयन को एक से डेढ़ वर्ष के लिए स्थगित किया जा सकता है. इस दौरान किसान संगठन और सरकार के प्रतिनिधि किसान आंदोलन के मुद्दों पर विस्तार से विचार विमर्श कर किसी उचित समाधान पर पहुँच सकते हैं."

- केंद्रीय कृषि मंत्रालय की ओर से जारी बयान का अंश.

नए कृषि क़ानून को लागू करने को लेकर मोदी सरकार का ये दाँव एकदम नया है.

इस दाँव को कुछ जानकार राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ (आरएसएस) के हस्तक्षेप के बाद किया गया फ़ैसला बता रहे हैं, कुछ का कहना है कि नए कृषि क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट की रोक के बाद सरकार के पास कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा था.

कई जानकार इसे मोदी सरकार का मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं. अगले कुछ महीनों में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं, किसान आंदोलन की वजह से उन राज्यों के विधानसभा चुनाव पर असर पड़ सकता था, जो रिस्क सरकार, पार्टी और संघ नहीं लेना चाहता था.

अब तक जिस क़ानून को किसानों के लिए खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हितकारी बताते नहीं थक रहे थे. मन की बात से लेकर किसानों को केंद्रीय कृषि मंत्री की चिट्ठी पढ़ने की हिदायत तक दे रहे थे, एनडीए के पूर्व सहयोगी अकाली दल तक की उन्होंने परवाह नहीं की, उस पर 12 से 18 महीने तक स्थगित करने के लिए मोदी सरकार का राज़ी हो जाना, सरकार पर कई सवाल भी खड़े करता है.

दिल्ली सीमा पर नए कृषि क़ानून के विरोध में किसान पिछले दो महीने से प्रदर्शन कर रहे हैं. सरकार और किसान संगठनों के बीच 10 दौर की बातचीत हो चुकी है. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो चुकी है, कमेटी का गठन भी हो गया है. लेकिन अब तक कोई हल नहीं निकला.

आरएसएस की भूमिका

इतना कुछ होने के बाद मोदी सरकार अपने ही स्टैंड से पीछे कैसे हटी?

आरएसएस से जुड़ी संस्था स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रीय सह संयोजक अश्विनी महाजन से बीबीसी ने यही सवाल पूछा.

यहाँ ये जानना ज़रूरी है कि स्वदेशी जागरण मंच का मानना है कि नए कृषि क़ानून किसानों के हित में हैं, लेकिन किसानों के लिए फसल का एक न्यूनतम मूल्य तय हो, ये भी ज़रूरी है. इसके अलावा उनकी कुछ और माँगें भी हैं.

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अश्विनी महाजन ने बीबीसी से कहा, "ये फ़ैसला बताता है कि इन क़ानूनों को लेकर सरकार का मन खुला है. सरकार के इस फ़ैसले को 'अपने स्टैंड से पीछे हटना' ऐसा कुछ भी इस फ़ैसले में मुझे दिखाई नहीं देता. पहले भी सरकार ने कुछ निर्णय किए और उन निर्णयों के बारे में कुछ आपत्तियाँ रहीं और सरकार ने उन्हें वापस भी लिया. जैसे जेनेटिकली मोडिफाइड क्रॉप की बात हो, भूमि अधिग्रहण क़ानून हो, आरसीईपी में नए समझौते की बात हो - लेकिन सरकार ने जब देखा कि क़ानून से जुड़े लोगों को क़ानूनों से आपत्ति है, तो उसमें सरकार ने समय लेकर आपत्तियों को दूर करने का प्रयास पहले भी किया है."

उन्होंने आरएसएस की भूमिका से जुड़े सवाल पर कहा, "ये निर्णय स्वागत योग्य है. ऐसी कोई भूमिका नहीं है. वैसे हमारी कई तरह की समन्वय की बैठकें चलती रहती हैं. कई स्तर पर अनौपचारिक तरह की बातचीत भी होती रहती है."

पहले भी कई क़ानून पर पीछे हट चुकी है सरकार

ये बात सही है कि ये पहला मौक़ा नहीं है, जब किसी क़ानून पर केंद्र सरकार ने अपना स्टैंड बदला हो.

इससे पहले कृषि से जुड़े भूमि अधिग्रहण क़ानून पर भी केंद्र सरकार पीछे हटी थी. तब संसद में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भूमि अधिग्रहण क़ानून का विरोध करते हुए केंद्र सरकार को 'सूट-बूट की सरकार' कहा था. इसके अलावा चाहे एनआरसी की बात हो या फिर नए श्रम क़ानून की, इन पर भी सरकार उतनी आक्रामक अभी नहीं दिख रही है.

ग़ौर करने वाली बात है कि अश्विनी महाजन ने जिन तीन क़ानूनों का ज़िक्र किया, उन पर आरएसएस और उनसे जुड़ी संस्थाओं को पहले आपत्ति थी. फिर चाहे भूमि अधिग्रहण क़ानून की बात हो या आरसीईपी समझौता.

यही वजह है कि जानकार सरकार के इस फ़ैसले को आरएसएस के दवाब में लिया गया फ़ैसला बता रहे हैं.

सरकार के पास दूसरा विकल्प नहीं था

पूर्व बीजेपी नेता सुधींद्र कुलकर्णी ने ट्वीट कर इस बारे में अपनी बात भी रखी है.

नए कृषि क़ानूनों पर सरकार के नए प्रस्ताव को सुधींद्र कुलकर्णी 'अपनी बात से पीछे हटना' करार देते हैं. बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "ये प्रस्ताव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वाभाव के बिल्कुल विपरीत है. नरेंद्र मोदी के बारे में कहा जाता है कि एक बार जो वो क़दम लेते हैं, तो पीछे नहीं हटते. लेकिन ये प्रस्ताव, उनकी इस छवि के उलट है."

साथ ही सुधींद्र कहते हैं कि ये प्रस्ताव दवाब में लिया गया फ़ैसला है. सरकार के पास दूसरा कोई चारा नहीं था. दो महीने से किसान सड़कों पर बैठे थे, हिंसा नहीं हुई, माहौल शांति पूर्ण रहा, दुनिया भर से प्रतिक्रियाएँ आईं, सुप्रीम कोर्ट की कमेटी से भी कोई फर्क़ नहीं पड़ा, आख़िर में ट्रैक्टर रैली के आयोजन की बात हो रही है - इन सबसे सरकार को बात समझ में आ गई कि किसान झुकने वाले नहीं हैं."

सरकार के इस फ़ैसले से एक दिन पहले आरएसएस में नंबर दो की भूमिका रखने वाले भैय्याजी जोशी का बयान भी महत्वपूर्ण है. किसान आंदोलन को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में इंडियन एक्सप्रेस अखबार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था , "दोनों पक्षों को इस समस्या के हल के बारे में सोचना चाहिए. लंबे आंदोलन लाभकारी नहीं होते हैं. आंदोलन से किसी को समस्या नहीं होनी चाहिए. लेकिन बीच का रास्ता ज़रूर निकाला जाना चाहिए."

हालाँकि सरकार के नए प्रस्ताव पर किसान नेताओं का जवाब का आना अभी बाक़ी है.

भैय्याजी जोशी का एक दिन पहले इस तरह का बयान देना और दूसरे ही दिन सरकार का स्टैंड बदलना महज एक संयोग हो सकता है.

लेकिन सरकार के नए स्टैंड को उसी बीच के रास्ते की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है.

26 जनवरी को ट्रैक्टर रैली

आउटलुक मैग़ज़ीन की राजनीतिक संपादक भावना विज अरोड़ा लंबे समय से बीजेपी कवर कर रही हैं.

वो कहती हैं "आरएसएस के दवाब के अलावा ख़ुफ़िया विभाग से सरकार को ये भी जानकारी मिल रही है कि 26 जनवरी को किसानों की ट्रैक्टर रैली में कुछ गड़बड़ी फैलाने की कोशिश हो सकती है. सरकार किसानों का आंदोलन उससे पहले ख़त्म करवाना चाहती है. इसलिए सरकार 22 जनवरी को किसानों के साथ होने वाली बैठक को बहुत महत्वपूर्ण मान रही है. किसान अगर सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार कर लेते हैं, तो 26 जनवरी की ट्रैक्टर रैली को ना करने का प्रस्ताव भी किसानों के सामने सरकार रख सकती है."

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सरकार का मास्टर स्ट्रोक

लेकिन वरिष्ठ पत्रकार अदिति फडणीस केंद्र के इस फ़ैसले को मास्टर स्ट्रोक करार देती हैं और इसमें आरएसएस की भूमिका नहीं देखती. वो कहती हैं कि आरएसएस की माँग तो बहुत पहले से थी, फिर इतनी देर से सरकार क्यों मानी?

अपने नज़रिए को समझाते हुए अदिति कहती हैं, "सरकार अपने स्टैंड से बिल्कुल पीछे नहीं आई है. सरकार ने किसानों की कोई माँग नहीं मानी है. वो तो बस 18 महीने तक इस क़ानून को स्थगित कर रहे हैं. 18 महीने तक कई राज्यों के महत्वपूर्ण चुनाव ख़त्म हो जाएँगे. किसानों की मूल माँग थी, क़ानून को वापस लेने की और एमएसपी पर क़ानूनी गारंटी की. ना तो सरकार क़ानून वापस ले रही है और ना ही एमएसपी पर कोई गारंटी दे रही है."

वो आगे कहती हैं, "ये सरकार का मास्टर स्ट्रोक है अगर किसानों की मूल माँग को ना मानते हुए भी वो किसानों का आंदोलन ख़त्म करवा लें तो. सरकार को दिक़्कत इस बात की थी कि किसान आंदोलन ख़त्म करने को तैयार नहीं थे और ये 'पॉलिटिकल इंफेक्शन' की तरह देश में फैलता जा रहा था."

वैसे अदिति मानती हैं कि सरकार ये पहले भी कर सकती थी. अब सरकार इस आंदोलन में बहुत कुछ खो चुकी है. सरकार ने कुछ पाया नहीं है.

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किसान आंदोलन
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सरकार पीछे नहीं हटी है

हालांकि बीजेपी के राज्य सभा सांसद राकेश सिन्हा सरकार के रुख़ को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बता रहे हैं.

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, "पूरे आंदोलन को ख़त्म करने के दो ही तरीक़ा थे. शांतिपूर्ण तरीक़े से बातचीत से मुद्दे को सुलझाया जाए या फिर बल के प्रयोग से, जैसा इंदिरा गांधी के समय पर हमने देखा था. हमारी सरकार बातचीत से ही मुद्दे को सुलझाने की बात हमेशा से कहती आई है और आज भी वही बात कह रही है. बातचीत में जब गतिरोध आया, तो सरकार ने नए तरीक़े का समाधान खोजा. डेढ़ साल तक क़ानून को स्थगित करने का. हमने क़ानून को वापस तो आज भी नहीं लिया है."

वो आगे कहते हैं, "हमने किसानों के दुराग्रह को लोकतांत्रिक प्रक्रिया से जीतने का प्रयास किया है. ये किसानों का आंदोलन नहीं था. ये 'कुलक' का आंदोलन था जैसी रूसी क्रांति के दौरान देखने को मिला था, जो सत्ता को अस्थिर करना चाहते थे. कुलक आंदोलन में भोले भाले किसानों को दिग्भ्रमित करने की एक कोशिश की गई थी, जो इस आंदोलन में भी की जा रही है. हम भी डेढ़ साल में उन्हें सही बात समझाएँगें."

लेकिन कुछ जानकार ये कह रहे हैं कि इन डेढ़ सालों में सरकार ईडी और दूसरी सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल कर दोबारा आंदोलन की नौबत ही नहीं आने देगी?

इस सवाल के जवाब में राकेश सिन्हा कहते हैं, "देश के 11 करोड़ किसान हमारे साथ है, केवल कुलक हमारे साथ नहीं है. इन कुलक के पीछे ऐसी ताकतें हैं, जिनके लिंक बाहर की ताक़तों से है और भारत का माहौल अस्थिर करना चाहते हैं.

वो आगे कहते हैं कि इन नए क़ानूनों के आधार पर जहाँ जहाँ चुनाव लड़ेगें, वहाँ हम जीत जाएँगे. इसमें कोई दो राय नहीं है.

अब इंतज़ार है किसान नेताओं के प्रस्ताव का. क्या सरकार के प्रस्ताव के बाद आंदोलन ख़त्म होगा?

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