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आर्टिकल-370 हटने के बाद कैसे बदल गई कश्मीर की सियासी फिजा, अब अलगाववादियों के भी बदले सुर

नई दिल्ली-जम्मू-कश्मीर को दो केंद्र शासित प्रदेश बनाने और आर्टिकल 370 हटाने के लगभग दो हफ्ते बाद ही वहां की बदली हुई सियासी फिजा को भी महसूस किया जाने लगा है। मौजूदा माहौल में यह स्पष्ट नजर आने लगा है कि कश्मीर की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव होने जा रहा है। केंद्र सरकार के ऐतिहासिक झटके से उबरने के बाद घाटी में सक्रिय अलगाववादी और मुख्यधारा की पार्टियों के खेमों से जो संकेत मिल रहे हैं, उससे जाहिर है कि अब वे लोग अपने राजनीतिक भविष्य को लेकर सोचना शुरू कर चुके हैं। अबतक घाटी की राजनीति में सक्रिय रहे दूसरी और तीसरी पीढ़ी के अलगाववादी नेता इस सच्चाई को स्वीकार करने लगे हैं कि हालात को स्वीकार करके आगे बढ़ने में ही कश्मीर की और उसके सियासतदानों की भलाई है।

घाटी में अबतक कैसी राजनीति चल रही थी?

घाटी में अबतक कैसी राजनीति चल रही थी?

पिछले 30 साल से कश्मीर घाटी हिंसक अलगाववाद और आतंकवाद झेलने को मजबूर थी। अलगाववादी भारतीय संविधान की संप्रभुता कबूलने को तैयार नहीं थे और भारत से अलगाव की बात कर रहे थे। कश्मीर की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी नेशनल कांफ्रेंस की राजनीति राज्य के लिए 1953 से पहले वाली स्वायत्तता की मांग पर टिकी थी। दूसरी बड़ी पार्टी पीडीपी की राजनीति नरम-अलगाववाद और धार्मिक कट्टरता के भरोसे चल रही थी। दूसरी छोटी पार्टियां भी इसी तरह की राजनीति करती रही थीं। इन पार्टियों ने समय-समय पर राष्ट्रीय पार्टियों के साथ तालमेल करके चुनाव भी लड़ा और सरकारें भी बनाईं। लेकिन, 5 अगस्त को केंद्र सरकार के फैसले ने सारी परिस्थितियों और राजनीतिक हालातों को ही बदल दिया और सबको नए सिरे से सोचने को मजबूर कर दिया है।

क्षेत्रीय दलों का सियासी एजेंडा बेमानी हुआ

क्षेत्रीय दलों का सियासी एजेंडा बेमानी हुआ

टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी एक खबर के मुताबिक अब अलगाववादी हों या कश्मीर की मुख्यधारा की पार्टियों से जुड़े लोग, सब अंदरखाने यह मान रहें कि उनके लिए परिस्थितियां पूरी तरह से बदल चुकी है। क्षेत्रीय राजनीति में आने की चाहत रखने वाले एक युवा राजनीतिक कार्यकर्ता मुदासिर के अनुसार, "नई दिल्ली ने अब जम्मू और कश्मीर के बाकी भारत के साथ रिश्तों को लेकर सारी अस्पष्टता खत्म कर दी है। हम अब देश के बाकी हिस्से की ही तरह हैं, उस विशेष राज्य से अलग जिसका भविष्य भारत और पाकिस्तान के बीच अनिश्चित था। मामला सुलझ चुका है और यहां से पार्टियां अलगाववाद, नरम-अलगाववाद और स्वायत्ता की बजाय शासन के मुद्दों पर लड़ेंगी। कश्मीर में सभी क्षेत्रीय दलों का राजनीतिक एजेंडा आज बेमानी हो चुका है। "

अलगाववादियों का भी बदला अंदाज

अलगाववादियों का भी बदला अंदाज

ताज्जुब की बात ये है कि कश्मीर में आए बदलाव के दो हफ्ते बाद ही हुर्रियत के अंदरखाने से भी हालात को कबूल करने के संकेत उभर रहे हैं। हुर्रियत के भीतर के लोग बताते हैं कि उसकी युवा पीढ़ी अब मुख्यधारा में शामिल होना चाहती है। वह आगे कश्मीर को खून से लाल होते नहीं देखना चाहती। श्रीनगर के हजरतबल इलाके के एक अलगाववादी ने अपना नाम नहीं जाहिर होने की शर्त पर बताया "यह महसूस किया जाने लगा है कि पाकिस्तान और भारत दोनों की फंडिंग पर चले अलगाववाद से कश्मीरी समाज को मदद नहीं मिली है। रक्तपात से सबसे ज्यादा कश्मीरियों को ही नुकसान हुआ है, जबकि अलगाववादियों की टॉप लीडरशिप और उनके बच्चों ने ठाठ से जीवन गुजारा है। आज दूसरी और तीसरी पीढ़ी के अलगाववादी कश्मीर की लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहेंगे।"

कैसी होगी अब्दुल्ला की नई राजनीति?

कैसी होगी अब्दुल्ला की नई राजनीति?

नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी की लीडरशिप के लिए आने वाला वक्त आसान नहीं रहने वाला लगता है। खासकर राज्य की सत्ता पर कई दशकों तक राज कर चुके अब्दुल्ला परिवार के लिए इस बदलाव को स्वीकार करना आसान नहीं है। नेशनल कांफ्रेंस के सूत्रों की मानें तो फारूक अब्दुल्ला बदले हालात में केंद्र शासित प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की लड़ाई लड़ना चाहते हैं, लेकिन उनके बेटे उमर अब्दुल्ला अभी इसके लिए तैयार नहीं लग रहे हैं। पार्टी के एक कार्यकर्ता के मुताबिक, "अब्दुल्ला परिवार के लिए नई सच्चाई को स्वीकार करना थोड़ा कठिन है। जम्मू और कश्मीर जैसे बड़े राज्य में उन्होंने जो राजनीतिक ताकत देखी है उसमें कटौती को कबूल करना उनके लिए आसान नहीं है। अब सभी क्षेत्रों पर कश्मीर का आधिपत्य समाप्त हो चुका है। ये अब्दुल्ला के लिए विशेष रूप से नुकसानदेह है। वे और कोई भी क्यों मुख्यमंत्री के अधिकारों में कटौती को स्वीकारने के लिए तैयार होगा? "

पीडीपी के लिए गेम ओवर!

पीडीपी के लिए गेम ओवर!

पीडीपी की दिक्कत ये है कि जमात-ए-इस्लामी जैसी प्रतिबंधित पाकिस्तान परस्त संगठन के नेता जेल में जो पहले पार्टी को सक्रिय सहयोग देते रहे थे। पीडीपी चीफ महबूबा मुफ्ती के एक बेहद करीबी राजनेता ने बताया कि वो भी बदले हालातों में अपना विकल्प तलाश रही हैं। उसके अनुसार "पीडीपी के सत्ता तक पहुंचने में जमात का वोट ही मुख्य आधार रहा। लेकिन, अलगाववादियों और जमात पर हुई कार्रवाई के चलते पीडीपी खत्म हो चुकी है। आज की बात करें तो ऐसा लगता है कि पार्टी कई टुकड़ों में बंट जाएगी। पार्टी में बहुत कम ही लोग अब उनकी भारत-विरोधी राजनीति के साथ रहना भी चाहते हैं। सभी जानते हैं कि पुराना राजनीतिक खेल अब खत्म हो चुका है। "

कौन होगा बदले कश्मीर का नया किंगमेकर

कौन होगा बदले कश्मीर का नया किंगमेकर

कश्मीर की बदली हुई सियासी फिजा में नए लोगों और युवा पीढ़ी को मौका मिलने की उम्मीद है। इसमें उनकी अच्छी-खासी तादाद है जो पिछले दिनों में पंचायत चुनावों में कश्मीर की लोकल पॉलिटिक्स में सफलता पूर्वक उभरे हैं। एक ऐसे ही युवा स्थानीय नेता ने बताया है कि "बहुत सारे युवा, ऊर्जावान और प्रगतिशील कश्मीरी, जिन्होनें तब चुनाव लड़ा जब सबने बायकॉट कर दिया था, वे बहुत बड़ी ताकत बनकर उभरेंगे।" इन युवा नेता में आईएएस की नौकरी छोड़ने वाले शाह फैसल भी शामिल हैं, जिन्होंने अपनी एक राजनीतिक पार्टी भी बनाई हुई है। फैसल के एक नजदीकी दोस्त ने कहा भी है कि अब्दुल्ला और मुफ्ती की राजनीति के बाद बनी अनिश्चितता की स्थिति में उन्हें सबसे ज्यादा फायदा होने वाला है। उधर बीजेपी के सूत्र बता रहे हैं कि वह पीपुल्स कांफ्रेंस के सज्जाद लोन का समर्थन जुटाने की भी कोशिश कर सकती है, जो पहले भी मोदी सरकार का समर्थन कर चुके हैं।

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