ना करते ये 5 गलतियां तो आज भाजपा की आंखों के तारे होते आडवाणी

भाजपा और लालकृष्ण आडवाणी एक दौर में एक दूसरे के पर्याय थे। पार्टी के कई वरिष्ठ नेताअाें में आडवाणी की लोकप्र‍ियता आसमान छूती थी। कहते हैं ना हमारी की हुई गलतियां और वक्त कभी-कभी हमें ऐसे दो राहे पर लाकर खड़ा कर देते हैं, जहां से या तो समझौता करने का विकल्प बचता है या अडिग रहकर तमाशा देखने का।

इस लेख का आशय लाल कृष्ण आडवाणी पर एकपक्षीय प्रहार करना बिल्कुल भी नहीं है, पर राजनैतिक विश्लेषण के दायरे में यदि देखें तो बहुत कुछ इस कहानी में छिपा है। उस दौर से लेकर 'मोदी युग' तक भाजपा देश की मुख्य विपक्षी पार्टी से देश की मुख्य सत्तारूढ़ पार्टी बन गई। कई नेताओं ने अपने पैंतरों से अपनी साख बचाई, इनाम पाया, नाराज हुए व फिर उठ खड़े हुए।

ऐसा क्या हुआ जिससे बीजेपी को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाने वाले आडवाणी आज 'मार्गदर्शक मंडल' की औपचारिकताएं निभाने को तैयार हैं। क्या वाकई यह मार्गदर्शक मंडल है या 'ओल्ड एज नेता को औपचारिक सम्मान का न्यौता'? घुमाएं स्लाइडर और जानें कि किन बातों ने आडवाणी का ग्राफ नीचे गिराया-

संघ-शाह से तालमेल

संघ-शाह से तालमेल

आज भाजपा पीएम मोदी, अमित शाह व संघ की छाया के नीचे आगे बढ़ रही है। 2009 के बाद आडवाणी और आरएसएस के बीच रिश्ते काफ़ी ख़राब हुए पर आडवाणी ने पारी संभालने के लिए 'लाभदायक' कदम नहीं उठाए। उन्हें अमित शाह व संघ के बीच तालमेल बैठाने की जरूरत थी।

मान-मनौव्वल से नुकसान

मान-मनौव्वल से नुकसान

लोकसभा चुनावों के दौरान चाहे मोदी को पीएम उम्मीदवार चुनने का मौका हो या चुनावी उम्मीदवार पर चयन की तैयारी, वे अपनी नाराजगी के लिए चर्चा में रहे। हरिन पाठक जैसे वरिषठ नेता को 6 बार सांसद रहने के बावजूद इस बार टिकट नहीं मिला पर उन्होंने संयम बरता।

बिना मैच जिताए बनना चाहते थे कप्तान

बिना मैच जिताए बनना चाहते थे कप्तान

यदि आडवाणी के दौर की याद करें तो 2004 की चुनावी हार के बाद जब उन्होंने 2009 में खुद को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में पेश किया था तब से वे बैकफुट पर रहे। अब क्रिकेट का ख‍िलाड़ी हो या राजनीति का, उसे सर्वाइव करने के लिए मैच जिताने ही पड़ते हैं।

वाजपेयी की ना सुनी

वाजपेयी की ना सुनी

जब 2002 में मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री पद से हटाना चाहते थे तब आडवाणी ही उनके बचाव में उतरे थे। यदि किसी रणनीतिवश नरेंद्र मोदी को तब साइडलाइन किया जाता तो आडवाणी का कद आज भी शीर्ष पर ही रहता।

वैसा ही करते आडवाणी

वैसा ही करते आडवाणी

दरअसल वक्त और हालात के साथ ही कई पहलुओं से समझौत कर लेना चाहिए। आडवाणी के कुछ समर्थकों ने पहले से मोदी की मंशा भांप ली थी और उन्होंने समय रहते अपना पाला बदल लिया। अरुण जेटली और वैंकेया नायडू जैसे नेता मोदी के समर्थन में खुलकर आ गए और अनंत कुमार, बलबीर पुंज, उमा भारती, वसुंधरा राजे, यशवंत सिन्हा और शत्रुघन सिन्हा जैसे नेता भी 'लहर' का लोहा मानने लगे थे।

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