एंटीबॉडी लंबे समय तक कोरोना वायरस के खिलाफ इम्युनिटी नहीं बनाए रख सकती: स्टडी
नई दिल्ली। कोरोना वायरस को लेकर ये बात काफी चर्चा में है कि कोविड एंटीबॉडीज दोबारा संक्रमित होने से बचाती हैं और इम्युनिटी में वृद्धि करती हैं। लेकिन हाल ही में हुए एक अध्ययन में इस बात का खुलासा हुआ है कि ऐसा सभी लोगों के साथ हो ये संभव नहीं है। अध्ययन में पता चला है कि कोविड-19 संक्रमण के बाद एंटीबॉडी समय के साथ इम्युनीटी बढ़ाने के बाद इसमें कमी भी करती है। ऐसा बुजुर्गों में अधिक पाया गया है। ये रिसर्च लंदन के इम्पीरियल कॉलेज में 20 जून से लेकर 28 सितंबर तक 365,000 लोगों पर की गई। जिसमें पता चला कि टेस्ट के पहले दौर के ठीक 3 महीने बाद एंटीबॉडी में 26 फीसदी की गिरावट आई है।
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ऐसा युवा आबादी की तुलना में 65 वर्ष की आयु के लोगों में अधिक देखा गया। अध्ययन के लेखक प्रोफेसर पॉल एलिऑट कहते हैं, 'हमारे अध्ययन में पता चला है कि समय के साथ उन कोरोना पॉजिटिव हो चुके लोगों की संख्या में कमी आई है, जिनमें एंटीबॉडी है। यह स्पष्ट नहीं है कि एंटीबॉडी कितने स्तर तक इम्युनिटी प्रदान करती है या यह इम्युनिटी कितने समय तक बनी रहती है।' एंटीबॉडी शरीर को सुरक्षा प्रदान करती हैं, लेकिन टी कोशिकाएं इम्युनिटी में भी योगदान देती हैं।
वहीं कोरोना संक्रमित मरीज के दोबारा इस वायरस से संक्रमित होने की बात करें तो प्रमुख लेखकों ने रिपोर्ट में लिखा है, 'इस अध्ययन से पता चला है कि समय के साथ-साथ एंटीबॉडी वाले लोगों का अनुपात गिर रहा है। हमें अभी भी नहीं पता कि क्या इससे लोगों में दोबारा वायरस होने का खतरा बढ़ रहा है, लेकिन ये सभी के लिए जरूरी है कि वह खुद को इसके खतरे से बचाने के लिए निर्देशों का पालन करें।'
आसान भाषा में कहें तो मामूली जुखाम की तरह ही कोरोना वायरस संक्रमण के बाद तीन से चार हफ्ते तक एंटीबॉडी बढ़ती हैं लेकिन इसके बाद इनकी संख्या नीचे गिरने लगती है। जिससे इंसान के दोबारा संक्रमित होने का खतरा बढ़ जाता है। हालांकि इस तरह के मामले अभी बेहद कम ही सामने आए हैं। ऐसे में वैक्सीन को ही एक जरूरी उपाय माना जा रहा है लेकिन अध्ययन में इसे लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। इसमें वैक्सीन से मिलने वाली एंटीबॉडी की प्रभावशीलता को लेकर कहा गया है कि प्राकृतिक इन्फेक्शन के मुकाबले वैक्सीन अलग तरह से प्रतिक्रिया दे सकती है।
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