भारत और चीन की तनातनी का केंद्र बना अरुणाचल प्रदेश

अरुणाचल में चीनी सीमा पर तैनात भारतीय सैनिक

जून, 2020 में लद्दाख के गलवान में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के बीच शुरू हुई तनातनी लगातार बढ़ती नजर आ रही है. अब इसके केंद्र में पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश है. एक ओर चीन कभी इस राज्य के कई इलाकों के नाम बदलता है तो कभी केंद्रीय नेताओं के दौरे और जी 20 की बैठक पर आपत्ति जताता रहा है. अरुणाचल प्रदेश की 1,126 किमी लंबी सीमा चीन से लगी है.

ताजा मामला अरुणाचल प्रदेश से सटे चीनी तिब्बत के निंगची में तीसरे ट्रांस-हिमालयन फोरम फॉर इंटरनेशनल कोऑपरेशन की बैठक का है. 4 और 5 अक्तूबर को होने वाली इस बैठक में इसमें पाकिस्तान के कार्यवाहक विदेश मंत्री जलील अब्बास जिलानी भी हिस्सा लेंगे. इससे पहले चीन ने एशियाई खेलों के लिए अरुणाचल के खिलाड़ियों को वीजा देने से इंकार कर दिया था. कुछ वक्त पहले उसकी ओर से सीमावर्ती इलाकों में बड़े पैमाने पर रिहायशी बस्तियों और आधारभूत ढांचे के निर्माण की खबरें और सेटेलाइट तस्वीरें भी सामने आई थी.

अरुणाचल प्रदेश में 32 स्थानों के नाम बदल चुका है चीन

दूसरी ओर, भारत ने भी अब इलाके में चीन की बढ़ती गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए अरुणाचल में आधारभूत ढांचे और सीमा सुरक्षा को मजबूत करने की दशा में ठोस कदम उठाए हैं. चीन की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए भारत सरकार ने राज्य में हजारों करोड़ की नई परियोजनाएं तो शुरू की ही हैं, यूरेनियम के भंडार का पता लगाने की कवायद भी शुरू की है. इसके साथ ही राष्ट्रीय स्तर के कई आयोजन भी हाल के दिनों में यहां हुए हैं.

चीन से सटे सीमावर्ती इलाकों में ऑल वेदर सड़कें बनाता भारत

सीमा पर खुफिया अधिकारियों की तैनाती

अब चीनी सेना की बढ़ती गतिविधियों पर निगाह रखने के लिए लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक वास्तविक नियंत्रण रेखा पर खुफिया विभाग के अधिकारियों की एक टीम तैनात करने का भी फैसला किया गया है. इसके तहत लद्दाख से अरुणाचल तक वास्तविक नियंत्रण रेखा पर आईटीबीपी की चौकियों पर इस टीम को तैनात किया जाएगा. यह लोग इलाके में चीनी गतिविधियों की रिपोर्ट केंद्र को देंगे. ऐसी हर टीम में चार से पांच अधिकारी शामिल होंगे.

अमित शाह के अरुणाचल दौरे से गुस्साया चीन

इसकी शुरुआत अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले में चीन की सीमा से सटे पहले भारतीय गांव मागो से होगी. इस गांव में वर्ष 2020 में ही एक ऑल टेरेन रोड बनाई गई थी. इसके जरिए हर मौसम में आवाजाही की जा सकती है.

इस दुर्गम राज्य में सीमावर्ती इलाकों तक सेना और सैन्य साजो-सामान की पहुंच आसान बनाने के लिए ऑल टेरेन रोड, सुरंगें और कई नए ब्रिज भी बनाए जा चुके हैं और कइयों पर काम चल रहा है.

अरुणाचल में चीन की सीमा से सटा एक भारतीय गांव

ताजा मामला

गलवान की हिंसक झड़प के बाद ही केंद्र सरकार ने पूर्वोत्तर में अरुणाचल प्रदेश पर अपना ध्यान केंद्रित किया था. इसकी एक वजह यह भी थी कि चीन भी सीमा से सटे इलाकों में बांध बना कर ब्रह्मपुत्र के पानी पर कब्जा करने की पहल कर रहा था. उस बांध के टूटने की हालत में अरुणाचल प्रदेश ही नहीं बल्कि असम का बड़ा हिस्सा भी जलमग्न हो सकता है.

केंद्र सरकार ने जवाबी कार्रवाई के तहत एक ओर जहां राज्य में पहले से जारी आधारभूत परियोजनाओं का काम तेज करने का फैसला किया वहीं रेल और सड़क संपर्क बेहतर बनाने के लिए हजारों करोड़ की नई परियोजनाओं का भी एलान किया. इसके अलावा राज्य में होने वाले राष्ट्रीय आयोजनों की संख्या भी बढ़ा दी गई.

अरुणाचल प्रदेश में सड़क से फिर गुलजार होते दिबांग घाटी के गांव

इस राज्य को प्रमुखता देने की कवायद के तहत ही बीते महीने अरुणाचल रंग महोत्सव का आयोजन किया. अभी इसी पहली अक्तूबर को सीमा से लगे तवांग में पहली बार मैराथन का भी आयोजन किया गया. चीन की निगाहें शुरू से ही तवांग पर रही हैं. सामरिक लिहाज से यह इलाका बेहद अहम है. बीते साल नौ दिसंबर को इस इलाके में दोनों देशों के सैनिक आमने-सामने आ गए थे. उस झड़प में कई जवान घायल हो गए थे. तवांग वास्तविक नियंत्रण रेखा से महज 25 किमी की दूरी पर है.

इससे पहले बीते मार्च में जी 20 के प्रतिनिधियों ने अरुणाचल में बैठक में बैठक की थू. चीन ने हालांकि इस पर आपत्ति जताई थी और उसके किसी प्रतिनिधि ने इस बैठक में हिस्सा नहीं लिया था. इसके बाद अब वाइब्रेंट विलेज योजना के तहत राज्य के करीब दो सौ गांवों को विकसित किया जा रहा है. यह तमाम गांव सीमा से सटे दुर्गम इलाकों में हैं.

चायंग ताजो सब-डिवीजन के सहायक उपायुक्त बीरो सोरम बताते हैं, "इस कार्यक्रम के तहत हम आधारभूत ढांचे को मजबूत कर यहां एडवेंचर स्पोर्ट्स और पर्यटन को बढ़ावा देना चाहते हैं. हमारा मकसद इस सीमावर्ती इलाके में रहने वाले लोगों को आत्मनिर्भर बनाना है ताकि विस्थापन रोका जा सके."

अरुणाचल की दिबांग घाटी

हर वक्त कनेक्टिविटी की कोशिश

केंद्र सरकार ने अरुणाचल से लगी सीमा पर तैनात जवानों को चीन की अधिकृत मंडारिन भाषा का प्रशिक्षण देने के लिए असम के तेजपुर विश्वविद्यालय के साथ इसी साल अप्रैल में एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किया था. इस प्रशिक्षण की अवधि चार महीने की है और इसका मकसद चीनी सेना की गतिविधियों की जमीनी जानकारी हासिल करना है.

पूर्वोत्तर में लगातार दबाव क्यों बढ़ा रहा है चीन ?

करीब ढाई साल पहले चीन ने इलाके में यूरेनियम की खदानों की खोज की भारत की कवायद को गैर-कानूनी बताते हुए अपना विरोध जताया था. परमाणु खनिज अन्वेषण एवं अनुसंधान निदेशालय (एएमडी) के नेतृत्व में जिस जगह यह काम चल रहा है वह वास्तविक नियंत्रण रेखा से महज तीन किमी भीतर भारतीय सीमा में है.

राजनीतिक पर्यवेक्षक केसी अपांग कहते हैं, "हाल के वर्षों में खासकर गलवान की झड़प के बाद भारत सरकार ने अरुणाचल से लगे सीमावर्ती इलाकों में चीन की बढ़ती गतिविधियों की काट के लिए कई ठोस कदम उठाए हैं. राज्य में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय आयोजन इसी रणनीति का हिस्सा हैं. अब तमाम दुर्गम इलाकों को सड़क से जोड़ने पर खास ध्यान दिया जा रहा है. इससे सेना व सैन्य साजो-सामान को कम समय में सीमा पर पहुंचाया जा सकेगा."

वह बताते हैं कि फिलहाल ज्यादातर इलाकों में जाने के लिए हेलीकॉप्टर सेवाओं पर निर्भर रहना पड़ता है. मौसम खराब होने की स्थिति में यह सेवा बंद हो जाती है. लेकिन ऑल टेरेन रोड के जरिए ऐसे दुर्गम इलाके बारहों महीने मुख्य शहरों से जुड़े रहेंगे.

Source: DW

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