हिमाचल में एक अनोखा 'खेल', खून बहने पर ही होता है बंद, जानिए क्या है खास
होली मनाने के कई अंदाज तो सुने होंगे लेकिन दीपावली पूरे देश में लगभग एक ही अंदाज में जश्न मनाया जाता है। लेकिन हिमाचल के एक गांव में दिवाली के दिन होने वाला जश्न कुछ अलग ही कहानी करता है। दावा किया जाता है कि एक ऐतिहासिक घटना के चलते यहां दिवाली के दिन दो समुदाय एक दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं। ये पत्थरबाजी तब रूकती है, जब दोनों पक्षों में से किसी एक को खून ना निकल आए। दिवाली के दिन निभाई जाने वाली ये प्रथा अजीब लगती है। आइए जानते हैं कि हिमाचल की धामी रियासत के इस तरह का 'खूनी खेल' क्यों किया जाता है?
हिमाचल प्रदेश की एक पूर्व रियासत धामी में वर्षों पुरानी परंपरा आज भी जीवित है। यहां दिवाली के मुख्य उत्सव के एक दिन बाद शाही राजवंश के उत्तराधिकारी कंवर जगदीप सिंह के नेतृत्व में शाही दरबार से धामी में मेला स्थल तक एक जुलूस निकाला जाता है। जिसके बाद कंवर जगदीप सिंह पूजा-अर्चना करने के लिए काली माता मंदिर जाते हैं। इस विशेष पूजा के बाद दो समुदायों - धमेड़ और जमोगी के बीच ऐतिहासिक पथराव का खेल शुरू होता है।

खून बहने तक जारी रहता है 'खेल'
इस ऐतिहासिक 'पत्थरबाजी' उत्सव को हर साल दिवाली के एक दिन बाद मनाने की परंपरा है। जिसमें लोग एक-दूसरे पर पत्थर फेंकते हैं और तब तक नहीं रुकते जब तक दोनों समूहों धमेड़ और जमोगी में से किसी व्यक्ति को खून न बहने लगे।
हिमाचल प्रदेश में दिवाली के दूसरे दिन सदियों पुराने वार्षिक पत्थरों के मेले का आयोजन किया गया। शिमला से लगभग 30 किलोमीटर दूर धामी इस कार्यक्रम का आयोजन हुआ। गांवों के दो समूहों में पथराव के साथ इस उत्सव की शुरुआत धामी के पूर्व शासक हलोग की उपस्थिति में की गई। लगभग 50 मिनट कर ये आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम का अंत तब हुआ जब पथराव कर रहे समूह में शामिल जमोग गांव के दलीप ठाकुर को पत्थर से चोट लगी, जिससे उनका खून भी बहने लगा।
क्या है मान्यता?
माना जाता है कि धामी में प्राचीन काल में मां भीमा काली मंदिर में मानव बलि दी जाती थी। लेकिन धामी की राणा परिवार की रानी इस प्रथा को रोकना चाहती थीं। लेकिन उनकी बात जब नहीं मानी गई तो वे चौराहे पर सती हो गईं और क्षेत्र में एक नई परंपरा को जन्म दिया। जिसके बाद से बलि के स्थान पर पत्थरबाजी करके खून बहाने की प्रथा शुरू हुई। जहां राणा राजपरिवार की रानी सती हुईं उस स्थल पर मेला लगता है और पत्थरबाजी की जाती है। वर्षों पुरानी इस परंपरा को धामी का शाही परिवार आज भी संरक्षित कर रहा है। पूर्व शाही परिवार की देखरेख में पत्थर मेले की हर वर्ष शुरुआत की जाती है।












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