हिमाचल में बंदरों के आतंक पर गरमाई राजनीति,नौ लाख किसान पीड़ित

शिमला। हिमाचल में बंदरों की समस्या जस की तस है। सरकारें चाहे बदल जायें, लेकिन बंदरों का आतंक खत्म नहीं हो पाया है। हजारों किसान जहां खेती बाड़ी छोड़ चुके हैं। वहीं कई जगह तो बंदरों का खुलेआम आतंक है। आये दिन बंदरों की हाथापाई से अब आम आदमी भी लहूलुहान होने लगा है। पांच साल तक राजनैतिक दलों ने इस मुद्दे को खूब भुनाया, व अपनी राजनिति चमकाई। लेकिन प्रदेश के करीब नौ लाख किसान परिवारों की समस्या जस की तस रही है। कई स्थानों पर तो लोगों ने फसल बोना ही बंद कर दिया है। किसानों की पीड़ा को समझने की बात की जाए तो पांच साल में राजनीतिक दलों ने इस मुद्दे के आसरे महज सियासी रोटियां ही सेंकी हैं।

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अब एक बार फिर बंदर मौजूदा चुनाव के केन्द्र में आ गये हैं। नेताओं से लोग अब पूछ रहे हैं कि इन बंदरों का क्या होगा। यही वजह है कि अब दोनो ही दल एक बार फिर बंदरों की समस्या से निजात दिलाने का वायदा लोगों से कर रहे हैं। नेता प्रतिपक्ष व भाजपा के सीएम पद के केंडिडेट प्रेम कुमार धूमल ने कहा है कि बंदरों की समस्या का निदान मनरेगा के माध्यम से किया जायेगा। बंदर पूरे हिमाचल की समस्या है। इसका समाधान निकाला जाना जरूरी हे। उन्होंने कहा कि वह केन्द्र से इस मामले को उठायेंगे, ताकि बंदरों के लिये मनरेगा से भुगतान किया जा सके।

उधर कांग्रेस पार्टी ने फसल की बंदरों से सुरक्षा को 6 माह में नीति बनाने की बात की है। पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में नई वन और पर्यावरण नीति बनाने का भी वायदा किया है। इसके साथ ही पार्टी ने वन विभाग में गार्ड स्तर तक तत्काल रिपोर्टिंग तथा वन अपराधों की रोकथाम और वन अधिकारियों की सुरक्षा के लिए एक संचार प्रणाली प्रदान करने की बात कही है। वन अधिकार अधिनियम के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए एक नोडल एजैंसी बनाई जाएगी। सरकार 6 महीने के भीतर फसल की बंदरों से सुरक्षा के लिए एक निश्चित नीति बनाएगी और वन विभाग को ये स्पष्ट निर्देश दिए जाएंगे कि इस समस्या का समाधान एक वर्ष के भीतर किया जाएगा।

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कांग्रेस की वीरभद्र सिंह सरकार ने तो किसानों के हाथ में ही बंदूक थमा दी, बंदरों को उत्तर-पूर्व भेजने के दावे किए, लेकिन ये दावे हकीकत में नहीं बदल पाए। वन महकमे का जोर भी केवल नसबंदी पर ही केंद्रित रहा। यही नहीं, विपक्ष भी शिद्दत के साथ इस मसले को नहीं उठा पाया। किसान संगठनों की मानें तो बंदरों की तादाद पांच से छह लाख है। जबकि वन विभाग की नजर में इनकी संख्या बढ़ नहीं घट रही है। पीडि़त किसान विभाग के सर्वेक्षणों पर सवाल उठाते रहे हैं।

राज्य की 3223 पंचायतों में से अधिकांश में किसानों की फसलों को बंदर नुकसान पहुंचा रहे हैं। खेती बचाओ संघर्ष समिति के मुताबिक हर साल करीब पांच सौ करोड़ की फसल बर्बाद हो रही है। जबकि फसलों की रखवाली के लिए राखे के तौर करीब 1600 करोड़ सालाना खर्च होता है। इसकी एवज में किसानों को न तो मुआवजा मिलता है और न ही बंदरों की रखवाली के लिए मनरेगा के तहत राखे रखने की व्यवस्था हो पाई है। यहां किसानी लगातार घाटे का सौदा साबित हो रहा है। इससे पहले बंदरों को मारने पर हाईकोर्ट का स्टे था। यह कई वर्षों तक रहा।

किसान संगठन इसे हटाने की अपने स्तर पर पैरवी करते रहे। बाद में यह स्टे हट भी गया। हालांकि मामला देश की शीर्ष अदालत तक जा पहुंचा था। इसके बाद केंद्र ने हिमाचल के आग्रह पर सबसे पहले शिमला शहर को वर्मिन घोषित किया था। इसके बाद वर्मिन का दायरा राज्य की 38 तहसीलों तक बढ़ाया। इनमें बंदरों को मारा जा सकता था। राज्य सरकार ने किसानों के ही हाथों में बंदूक थमा दी। अन्नदाताओं ने मारने से मना किया। वन विभाग ने किसानों को प्रशिक्षण नहीं दिया और न टेंड कर्मियों को इस कार्य के लिए तैनात किया।

इसी साल 10 अप्रैल को शिमला में उच्च स्तरीय कमेटी की बैठक हुई थी। तय हुआ था कि इंसान की तर्ज पर बंदरों की भी फैमिली प्लानिंग होगी। मादा बंदरों को गर्भ निरोधक गोलियां खिलाई जाएंगी। बैठक में कई तरह के फैसले लिए गए थे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

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