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हिमाचल भाजपा में धूमल कैसे बने इतने ताकतवर कि CM तय नहीं कर पा रही पार्टी

शिमला। हिमाचल भाजपा में एक समय प्रेम कुमार धूमल का सिक्का चलता था। नरेन्द्र मोदी हिमाचल के प्रभारी बने तो धूमल युग का उदय हुआ जिसकी चकाचौंध में शांता कुमार से लेकर जगत प्रकाश नड्डा तक हाशिये पर चले गये। आज वक्त बदला तो धूमल पार्टी में अकेले पड़ते जा रहे हैं। सुजानपुर में मिली हार को सहर्ष स्वीकार करने की बजाय धूमल अब अपने विरोधियों से आर-पार की लड़ाई के मूड में आ गये हैं। मामला स्पष्ट है कि मैं नहीं तो नड्डा व जय राम भी नहीं, किसी और को अगला सीएम बनाओ। दवाब की राजनिति का आलम यह है कि हिमाचल आये केन्द्रीय पर्यवेक्षक विधायक दल की बैठक के बगैर ही दिल्ली लौटने को मजबूर हुये। चूंकि धूमल के साथ अब 44 जीते हुये विधायकों में से 26 सरेआम कदमताल कर रहे हैं। लिहाजा धूमल की ताकत के सामने केन्द्र अब सोचने को मजबूर हुआ है। लड़ाई अब वर्चस्व की है। इस बात को जे पी नड्डा पहले ही भांप गये थे, इसी के चलते उन्होंने अपनी दावेदारी छोड़ जय राम ठाकुर के नाम को आगे बढ़ाया। जय राम ठाकुर को विरोध तो कोई नहीं है लेकिन धूमल को यह कतई मंजूर नहीं कि अगली सरकार जे पी नड्डा के प्रभाव में बने।

विरासत में नहीं मिली राजनीति

विरासत में नहीं मिली राजनीति

धूमल को राजनीति विरासत में नहीं मिली। वह पंजाब के जालंधर में दोआबा कॉलेज में अंग्रेजी पढ़ाते थे। कभी नहीं सोचा होगा कि राजनीति में आएंगे लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सपंर्क में आने के बाद हमीरपुर के गांवों में संगठन का झंडा उठाने लग गए। ठाकुर जगदेव चंद के निधन के बाद भाजपा में मजबूत राजपूत चेहरा बने तो 1998 में भाजपा की सरकार बनने पर पहली बार मुख्यमंत्री बने । उस समय धूमल सांसद थे। प्रदेश में वीरभद्र की कांग्रेस सरकार थी और केंद्र में भाजपा की सरकार बननी तय थी। ऐसे में वीरभद्र सिंह ने 6 महीने पहले ही चुनाव करा दिये। भाजपा को हार का सामना करना तय था लेकिन उस समय नरेंद्र मोदी भाजपा के प्रभारी थे। प्रदेश में भाजपा का मुख्यमंत्री चेहरा बनने को कोई भी तैयार नहीं था। भाजपा के नेताओं को लग रहा था कि हारने से अच्छा है कि चेहरा बनने से इनकार कर दो। उस समय ने धूमल ने आगे बढ़कर हामी भर दी। चुनाव से 3 दिन पूर्व धूमल के नाम की घोषणा की गई। चुनाव परिणाम में सरकार बनाने के लिए सुखराम की हिमाचल विकास कांग्रेस का सहयोग लेना पड़ा ओर धूमल पहली बार मुख्यंमत्री बने। हिविकां गठबंधन में भाजपा की सरकार पूरे पांच वर्ष चलाई।

धूमल ने किया संगठन को मजबूत

धूमल ने किया संगठन को मजबूत

2003 में भाजपा को सत्ता से बाहर होना पड़ा। उस वर्ष 2007 में भाजपा सांसद सुरेश चंदेल पर संसद में सवाल पूछने को लेकर रिश्वत लेने का मामला सामने आया। देश में भाजपा बैकफुट पर आ गयी थी। हमीरपुर संसदीय सीट पर चुनाव हुआ कोई भी नेता भाजपा प्रत्याशी बनने को तैयार नहीं था। उस समय धूमल ने संगठन को मजबूत करने के लिए चुनौती को स्वीकार किया। धूमल ने कांग्रेस प्रत्याशी राम लाल ठाकुर को हरा दिया था। कोई भी इस बात को मानने को तैयार नहीं था कि हमीरपुर की सीट जीती जा सकती थी।

बने भाजपा का सीएम चेहरा

बने भाजपा का सीएम चेहरा

वर्ष 2007 में ही विधानसभा चुनावों में धूमल को अंत समय में सांसद से मुख्यमंत्री का चेहरा बनाने का फैसला लिया। धूमल के नेतृव में सरकार बनी और दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। प्रदेश में भाजपा को आगे लेकर चलने का काम सिर्फ धूमल के कंधों पर ही था। 2012 तक सफल भाजपा की सरकार चली लेकिन जैसे ही चुनाव आए भाजपा के अन्य नेताओं ने धूमल को सत्ता से हटाने का प्लान बनाया ताकि भविष्य में खुद को स्थापित कर सके। भाजपा की हार हुई लेकिन धूमल विपक्ष के नेता बने। पांच सालों तक लगातार कांग्रेस का सदन के भीतर और बाहर विरोध कर भूमिका निभाते रहे। 2014 में संसदीय चुनावों में स्थानीय स्टार प्रचारक के तौर पर प्रदेशभर में प्रचार किया।

धूमल का हारना सदमे से कम नहीं

धूमल का हारना सदमे से कम नहीं

हाल ही के विधानसभा चुनावों के दौरान धूमल ने संगठन के हर फैसले को स्वीकार किया। संगठन ने सुजानपुर से मैदान उतारने का फैसला लिया। ये सीट 2012 में भाजपा हज़ारों वोटों के मार्जिन से हारी थी। वहीं पूर्व विधायक नरेंद्र ठाकुर के खिलाफ भारी विरोध में जनता थी लेकिन धूमल ने अपनी सीट हमीरपुर छोड़ संगठन के साथ सुजानपुर से चुनाव लड़ा। दरअसल संगठन के आंतरिक सर्वे में भी सुजानपुर सीट हारती नजर आयी थी। जब 18 दिसम्बर को चुनाव परिणाम आया तो सीट 1919 मतों से धूमल हार गए। धूमल को सीएम बनाने की घोषणा संगठन कर चुका था तो धूमल ने प्रदेशभर में रैलियां में अपनी सीट के बजाय संगठन के लिए भाजपा के पक्ष में वोट मांगे जिससे धूमल सुजानपुर में ध्यान नहीं दे पाये। धूमल की हार हिमाचल भाजपा के एक बड़े तबके के लिये किसी सदमे से कम नहीं है। यही वजह है कि बहुमत के बावजूद भाजपा नेतृत्व स्पष्ट तौर पर नेता घोषित कर नहीं पा रही है। लिहाजा अब तय है कि अगला सीएम वही बनेगा, जिसके पास प्रदेश के विधायकों का समर्थन नहीं बल्कि पीएम मोदी व अमित शाह का आशीर्वाद होगा।

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