'होलिका दहन' में गाय के गोबर से बनी लकड़ी का इस्तेमाल, जानिए कैसे निकला गौशाला से समस्या का समाधान

इस साल होली के मौके पर होलिका दहन में पेड़ों से काटी गई लकड़ी का नहीं बल्कि गाय के गोबर से बनी लकड़ियों का प्रयोग किया जाएगा। सासनी पराग डेयरी में बनाई गई गौशाला से गाय का गोबर लेकर महिलाएं लकड़ियों का निर्माण कर रही हैं।

Hathras Use of wood made from cow dung in Holika Dahan know how the wood is madi in cowshed

भारत में गाय को माता का दर्जा दिया गया है। आज से कुछ साल पहले के चलन पर अगर नजर डाली जाए, तो लगभग हर घर में गाय पालन किया जाता था। गाय का सिर्फ दूध ही नहीं बल्कि गाय का गोबर भी अनेकों कार्य में लिया जाता था। जैसे जब घरों में गैस सिलेंडर और इंडक्शन हीटर नहीं हुआ करते थे, तब लोग गाय के गोबर के ही उपले बनाकर खाना पकाया करते थे। जिससे पेड़ों का कटान भी नहीं होता था।
होलिका दहन में गाय के बनी लकड़ी
वहीं आज के इस आधुनिक दौर में पेड़ों के कटान से होने वाला क्लाइमेट चेंज एक गंभीर समस्या बनकर दुनिया के सामने खड़ी हो गई है। होली पर भी होने वाली पवित्र 'होलिका दहन' की परंपरा में हजारों पेड़ों का कटान किया जाता है। लेकिन यूपी के हाथरस में एक गौशाला सिर्फ सेवा का ही नहीं महिलाओं लिए रोजगार का साधन बन गई है। गाय के गोबर से गैस, उपले, खेतों के लिए खाद ही नहीं, पर्यावरण सुरक्षा और पेड़ों के बचाव के लिए लकड़ियां भी बनाई जा रही हैं।

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पर्यावरण के लिए भी लाभदायक
दरअसल, इस साल होली के मौके पर होलिका दहन में पेड़ों से काटी गई लकड़ी का नहीं बल्कि गाय के गोबर से बनी लकड़ियों का प्रयोग किया जाएगा। सासनी पराग डेयरी में बनाई गई अस्थायी गौशाला से गाय का गोबर लेकर महिलाएं लकड़ियों का निर्माण कर रही हैं। जिलाधिकारी अर्चना वर्मा की पहल पर स्वयं समूह की महिलाओं के माध्यम से पराग डेयरी में गाय के गोबर से लकड़ी तैयार की जा रहीं हैं। इस पहल से पेड़ों के कटान कम होने के साथ-साथ काम धुआं होने से पर्यावरण के लिए भी लाभदायक साबित होगा। स्वयं समूह के जरिए महिलाओं के लिए रोजगार की नजर से देखा जा रहा है। बता दें अभी तक करीब 6 टन से भी ज्यादा लकड़ी को तैयार कर लिया गया है।
कैसे बनती है गोबर से लकड़ी
जानकारी के मुताबिक इस बार होलिका स्थल पर सरकारी होली में इन लकड़ियों का ही इस्तेमाल किया जाएगा। लकड़ी को तैयार करने के लिए लगभग 2 दिन तक गोबर को सुखाया जाता है। गोबर का गीलापन कम होने के बाद उसे मशीन में अच्छे से घुमाया जाता है। लकड़ी बनने के बाद नमी कम करने और अच्छे से सुखाने के लिए धूप में रखा जाता है। वहीं जिला प्रबंधक ने बताया कि इस इकाई के संचालन से महिलाओं को रोजगार मिल रहा है। निर्माण इकाई से मिलने वाली आमदनी की 80 फीसदी धनराशि स्वयं सहायता समूहों की महिलाओं को दी जाएगी।

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    समस्या से समाधान
    इस समय बाजार में गाय के गोबर से बनी लकड़ियों की बेहद मांग है। आपको बता दें कि यूपी में गौवंश किसानों के खेतों को अपना निशाना बना रहे थे। फसलों की हानि से आक्रोशित किसानों ने आंदोलन शुरू कर दिया था। किसानों की समस्या को खत्म करने के लिए सरकार ने प्रदेश की प्रत्येक ग्राम पंचायत में गौशाला बनवा कर आवारा गौवंश को उसमे रखने के आदेश जारी कर दिए थे। इन गौशालाओं में पल रही गाय महिलाओं के रोजगार का साधन बन रही हैं।
    जिलाधिकारी अर्चना वर्मा की अनूठी पहल
    इसको लेकर जिलाधिकारी अर्चना वर्मा ने बताया कि शासन की इच्छा अनुरूप काम किया जा रहा है। हमारी कोशिश यही है कि गौशालाओं को आत्मनिर्भर बनाया जाए। इसके साथ ही महिलाओं की सहायता समूह को भी कुछ रोजगार से जोड़ा जाए। उसी क्रम में हमने यह प्रोजेक्ट शुरू किया है। यह एक पायलट प्रोजेक्ट है, इसके साथ ही ग्राम पंचायत में बड़ी गौशाला बनी है। वहां भी इसी तरह से प्रोजेक्ट लगाए जाएंगे ताकि गौशाला आत्मनिर्भर बने और महिलाओं को भी रोजगार मिल सके। साथ ही भविष्य में होली, हवन, अंत्योष्टि में गाय के गोबर से बनी लकड़ियों के इस्तेमाल पर जोर दिया जाएगा।

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