गुजरात: पुलिस कस्टडी में मरे 180 लोग, संजीव भट्ट को उम्रकैद हुई तो उठे सवाल- अन्य केसों में सिपाहियों को क्यों बख्शा?

गांधीनगर। गुजरात में पुलिस हिरासत में बीते 16 सालों में 180 मौतें हो चुकी हैं। ​किंतु इन मामलों में यहां सिपाहियों को वैसी सजा नहीं हुई, जो बर्खास्त आईपीएस अफसर संजीव भट्ट को हुई है। संजीव भट्ट को आजीवन कारावास की सजा दी गई है। 2002 के दंगों के बाद वह मोदी सरकार के सामने आए थे, तब मोदी ही राज्य के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने दंगों में सरकार की कथित भूमिका को लेकर जांच कार्य शुरू किए थे। ऐसे में जब उन्हें एक मामले में उम्रकैद दी गई है तो कई लोग सरकार से कई तरह के सवाल कर रहे हैं।

NCRB की रिपोर्ट से हुआ खुलासा

NCRB की रिपोर्ट से हुआ खुलासा

नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो से प्राप्त जानकारी के अनुसार, पुलिस कस्टडी में हुई मौतों के लिए किसी पुलिसकर्मी को दंडित नहीं किया गया है। देश में 1557 लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हुईं। किंतु, महज 26 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया गया। जिनमें अधिकांश उत्तर प्रदेश के हैं। गुजरात पुलिस बल में जवाबदेही की सख्त आवश्यकता के बावजूद आंकड़े उस संदर्भ की ओऱ ध्यान आकर्षित करते हैं, जिसमें संजीव भट्ट औऱ अन्य पुलिस कर्मचारी प्रवीणसिंह झाला 30 साल पुराने मामले में दोषी बताए गए हैं।

यह है संजीव भट्ट का मामला

यह है संजीव भट्ट का मामला

संजीव भट्ट का मामला नवंबर 1990 का है। जब उन्होंने भारत बंद के दौरान जामनगर में हुए दंगों के दौरान 150 लोगों को पूछताछ के लिये बुलाया था, जिसमें कुछ राजनीतिक पार्टी के भी थे। भाजपा के लालकृष्ण अडवानी की रथयात्रा के दौरान संजीव भट्ट जामनगर जिले के अतिरिक्त पुलिस अधिक्षक थे। हिरासत में लिए गए लोगों में एक प्रभुदास वैष्णनी था, जिसे नौ दिनों के बाद जमानत पर रिहा कर दिया गया था। उसकी रिहाई के दस दिन बाद अस्पताल में इलाज के दौरान कथित तौर पर मौत हो गई थी। उनके भाई अमृतलाल ने तब भट्ट और आठ अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ हिरासत में अत्याचार का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई थी।

 केवल 32 की जांच की गई

केवल 32 की जांच की गई

अमृतलाल ने कहा कि प्रभुदास एक किसान था और दंगों के लिए बिल्कुल भी जिम्मेदार नहीं था। मामले का संज्ञान 1995 में एक मजिस्ट्रेट द्वारा लिया गया था, लेकिन इसका मुकदमा गुजरात उच्च न्यायालय ने 2011 तक रोक दिया था। एक हफ्ते पहले कोर्ट ने भट्ट की याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया था। पूर्व पुलिसकर्मी ने शीर्ष अदालत में दावा किया था कि मामले में अभियोजन पक्ष द्वारा लगभग 300 गवाहों को सूचीबद्ध किया गया था, जबकि वास्तव में केवल 32 की जांच की गई थी। कई महत्वपूर्ण गवाहों, जिनमें तीन पुलिसकर्मी शामिल थे, जो अपराध की जांच करने वाली टीम का हिस्सा थे। गुजरात सरकार ने भट्ट के इस कदम को "मुकदमे में देरी के लिए रणनीति" करार दिया था।

सरकार के खिलाफ मोर्चे खोल रहे थे संजीव

सरकार के खिलाफ मोर्चे खोल रहे थे संजीव

कहा जाता है कि, गुजरात सरकार संजीव भट्ट के सामने उठाए गये किस्सों को लाभ उठाना चाहती थी। क्योंकि संजीव भट्ट बतौर पुलिस अफसर सरकार के खिलाफ मोर्चे खोल रहे थे। ​जिसके चलते उनकी पुलिस की शक्तियों को छीन लिया गया। नरेंद्र मोदी के खिलाफ मुहिम चलाने वाले संजीव भट्ट को सरकार ने कटघरे में खडा कर दिया गया।

बाकी केसों में कोई सजा नहीं हुई

बाकी केसों में कोई सजा नहीं हुई

राज्य में पुलिस हिरासत में मौत होने जो किस्से सामने आये हैं, उनमें से केवल संजीव भट्ट का ही किस्सा खुला है औऱ उनको सजा हुई है। बाकी केसों में कोई छानबीन नहीं हुई है औऱ किसी को सजा नहीं मिली है।

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