आसमान की भीड़-भाड़ में मिले पांच लाख नए सितारे

यूरोपियन स्पेस एजेंसी (ईएसए) ने करीब एक दशक पहले गाया अंतरिक्ष अभियान शुरू किया था. मकसद था, हमारी आकाशगंगाका एक थ्रीडी मानचित्र बनाना. करीब 180 करोड़ तारों की निगरानी और कमोबेश समूचे मिल्की वे का मानचित्र तैयार करने के बाद वैज्ञानिकों ने महसूस किया कि एक बड़ी कमी रह गई है. उनके पास अब भी आकाश के उन हिस्सों का स्पष्ट खाका नहीं है, जो सितारों से भरे पड़े हैं.

ऐसे में गाया अंतरिक्ष ऑब्जरवेट्री चलाने वाले वैज्ञानिकों ने ग्लोब्यूलर क्लस्टर्स कहे जाने वाले तारों के बेहद विशाल समूह को अच्छी तरह देखने-समझने का फैसला किया. इस शोध में पहले जमा किए जा चुके डेटा की फिर से पड़ताल की गई. ईएसए ने और भी खगोलशास्त्रियों से मदद मांगी. उन्होंने "ओमेगा सेंटोरी क्लस्टर" पर ध्यान लगाया, जो कि हमारी पृथ्वी से करीब 17,090 प्रकाश वर्ष की दूरी पर है.

इस शोध से पता चला कि बस इस एक गुच्छे में पांच लाख से ज्यादा नए तारे शामिल हो चुके हैं. ऐसे भी खगोलीय पिंडों का पता चला जो इतने भारी हैं कि प्रकाश को मोड़ देते हैं.

मिल्की वे के अब तक के सबसे विस्तृत सर्वेक्षण में गाया ने कई अजूबे सितारे देखे.

क्या हैं ग्लोब्यूलर क्लस्टर?

यह लाखों सितारों का बेहद घना झुंड है. ये हमारे इस ब्रह्मांड के सबसे पुराने सदस्यों में से एक हैं. इन क्लस्टरों से वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिली कि मिल्की वे गैलेक्सी के केंद्र में सूर्य नहीं है. आकाशगंगा के ज्यादा ग्लोब्यूलर क्लस्टर, मिल्की वे के केंद्र में स्थित हैं. उनकी स्थिति का इस्तेमाल कर वैज्ञानिकों को पता चला कि सूर्य और धरती "सेजिटेरियस आर्म" के ओपन क्लस्टर्स में हैं. ये सेजिटेरियस आर्म, गैलेक्सी के स्पाइरल आर्म्स में से एक है.

खगोलशास्त्री सदियों से मिल्की वे का नक्शा खींचने की कोशिश करते आए हैं. इसमें एक बड़ी चुनौती है तारों की बेपनाह संख्या. इसकी वजह से कई बार टेलिस्कोप भी भौंचक्के रह जाते हैं और आकाशगंगा को पढ़ने की हमारी क्षमता प्रभावित होती है.

क्लस्टरों में मौजूद चमकीले सितारों की रोशनी अकसर अपने पड़ोसियों पर भारी पड़ जाती है और वो धुंधला जाते हैं. वहीं कुछ तारे एक-दूसरे से इतने नजदीक हैं कि उनके अस्तित्व को अलग-अलग नहीं बताया जा सकता. इन चुनौतियों के आगे गाया अभियान काफी मददगार साबित हुआ है. गाया ने इन क्लस्टरों की अपेक्षाकृत कहीं ज्यादा स्पष्ट तस्वीर दिखाई है.

गाया ने ओमेगा सेंटोरी को ही क्यों चुना?

ओमेगा सेंटोरी, हमारी अब तक की जानकारी में मिल्की का सबसे बड़ा ग्लोब्यूलर क्लस्टर है, जिसे पृथ्वी से देखा जा सकता है. यहां से देखने पर यह आकार में पूर्णिमा के चांद जैसा ही बड़ा दिखता है. अनुमान है कि यह सूरज से 40 लाख गुना भारी है और लगभग एक करोड़ तारों के विस्तार में फैला है.

यह क्लस्टर जब भी नजर आता, तब गाया पर काम करने वाले वैज्ञानिक इसके भीतरी भाग की निगरानी करते. इस तरह वो इस क्लस्टर का खाका खींच पाए. ये आंकड़े मिल्की वे में तारों के वितरण को समझने में हमारी मदद कर सकते हैं. साथ ही, यह जानने में भी मदद मिल सकती है कि ब्रह्मांड के कुछ हिस्सों में बाकियों के मुकाबले ज्यादा द्रव्यमान क्यों होता है.

इस शोध में हमारे सौर मंडल के भीतर 120,000 नए एस्टेरॉइडों का भी पता चला.

ग्रैविटेशनल लेंस का कमाल

गैलेक्सी जितनी दूर होगी, उतनी ज्यादा धुंधली दिखेगी. बेहद दूरी पर स्थित गैलेक्सियों को देखना ताकतवर टेलिस्कोपोंके लिए भी बहुत मुश्किल होता है. ऐसे में एक प्राकृतिक मैग्निफाइंग ग्लास मदद करता है.

आइंस्टाइन के मुताबिक, किसी विशाल खगोलीय पिंड का गुरुत्वाकर्षण इतना घना हो सकता है कि वो स्पेस के फैब्रिक को भी तोड़-मरोड़ सकता है. अंतरिक्ष में गैलेक्सियों के झुंड (क्लस्टर), सबसे ज्यादा गुरुत्वाकर्षणवाली खगोलीय संरचनाओं में हैं. जब बहुत दूरी पर स्थित गैलेक्सी से निकली रोशनी, क्लस्टर से होकर गुजरती है, तो क्लस्टर मैग्निफाइंग ग्लास का काम करता है और रोशनी को बढ़ाता है.

सामान्य स्थिति में रोशनी अपनी सामान्य राह पर आगे बढ़ती है, लेकिन क्लस्टर के कारण वह डिस्टॉर्ट हो जाती है और टेलिस्कोप उसे देख पाते हैं. इस तरह हम बेहद दूर स्थित गैलेक्सी को ज्यादा अच्छी तरह देख पाते हैं. इसी इफेक्ट को ग्रैविटेशनल लेंसिंग कहा जाता है.

गाया ने हाल ही में 381 ऐसे मामलों का पता लगाया, जहां ग्रैविटेशनल लेंसिंग के साक्ष्य पाए गए. ईएसए के वैज्ञानिकों के मुताबिक, इसका मतलब है कि ओमेगा सेंटोरी क्लस्टर का गुरुत्वाकर्षण, "क्वेजार्स" कहलाने वाले दूरस्थ स्रोतों से आने वाली रोशनी को मोड़ देता है. ये क्वेजार्स, बहुत दूरी पर स्थित चमकीली रोशनी के स्रोत हैं. संभावना है कि इन्हें ब्लैक होल्ससे पावर मिलती हो.

गाया द्वारा की गई निगरानियों से जुड़े अगले आंकड़े 2025 में जारी होंगे. इसके अंतर्गत ओमेगा सेंटोरी की ही तरह आकाश के और आठ सितारों से भरे हिस्सों के बारे में ज्यादा जानकारी मिलेगी. वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इससे हमारी आकाशगंगाकी पुख्ता उम्र जानने में मदद मिलेगा. साथ ही, इसके केंद्र का भी पता लगाया जा सकेगा. अपनी जिंदगी के अलग-अलग पड़ावों पर तारों में कैसे बदलाव होते हैं, इसकी भी पुष्टि होने की उम्मीद है. मुमकिन है कि हमारे ब्रह्मांड की संभावित उम्र की भी ठोस जानकारी मिल पाएगी.

Source: DW

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