AIDS Day: एड्स के प्रति जागरुकता से ही संभव है इसकी रोकथाम
प्रत्येक वर्ष 1 दिसम्बर को विश्व एड्स दिवस मनाया जाता है। इस दिन विश्वभर के लोग एड्स विरोधी अभियान में अपनी एकजुटता दिखाते हैं। आइये समझते हैं एड्स के प्रसार और रोकथाम की वर्तमान स्थिति क्या है?
AIDS Day: भारत एचआईवी के साथ जीवन जी रहे लोगों की तीसरी सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। एचआईवी एक ऐसा वायरल संक्रमण है, जो एड्स नामक जानलेवा बीमारी की ओर ले जाता है। देश में एचआईवी से पीड़ित 23.5 लाख लोगों में से केवल 17.8 लाख लोगों को पता है कि वे संक्रमित हैं। जिस कारण इसके प्रसार पर नियंत्रण करने में कठिनाई हो रही है।

UNAIDS के अनुसार, भारत में एचआईवी के साथ रहने वाले 24 लाख लोग हैं और इनमें से 70,000 बच्चे हैं। इसका मतलब है कि दवाओं के बावजूद हमारे पास अभी भी माता-पिता से बच्चों में संक्रमण पहुँच रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण जागरुकता की कमी के कारण गर्भावस्था के दौरान एचआईवी जाँच का नहीं कराया जाना है।
राष्ट्रीय स्तर पर, अनुमानित व्यस्क (15-49 वर्ष) एचआईवी प्रसार में पिछले 21 वर्षों में काफी कमी आई है। 2000 में इस महामारी का चरम दर्ज किया गया था। वर्ष 2000 में एड्स प्रसार का अनुमान 0.55%, 2010 में 0.32% और 2021 में 0.21% था।
एचआईवी संक्रमण का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति एड्स से भी पीड़ित हो। एड्स की पुष्टि इसकी जाँच के बाद ही की जा सकती है। एचआईवी संक्रमित व्यक्ति में आवश्यक नहीं कि किसी गंभीर बीमारी से ग्रसित हो। ऐसे में एड्स के लक्षणों की विशेष रक्त जाँच (cd4+ कोशिका गणना) के आधार पर की जाती है।
एड्स के लक्षण दिखने में 8 से 10 वर्ष तक का समय लग सकता है। यह संक्रमण खुद में कोई बीमारी नहीं है, बल्कि यह शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बेहद कम कर देता है। इस कारण व्यक्ति का शरीर अन्य संक्रमणों से लड़ पाने में अक्षम हो जाता है।
एड्स का पूर्ण रूप से उपचार अभी तक संभव नहीं हो सका है। इस स्थिति में प्रबंधन से जीवन प्रत्याशा को बेहतर बनाने के उपाय किए जा सकते हैं। एचआईवी और एड्स से संबंधित कुछ महत्वपूर्ण तथ्य हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को जानने चाहिए।
-एचआईवी (ह्यूमन इम्यूनो डेफिशियेंसी वायरस) शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली की कोशिकाओं को संक्रमित कर देता है।
-एचआईवी दुनिया की प्रमुख संक्रामक एवं जानलेवा संक्रमण है।
-पूरे विश्व में लगभग 3.53 करोड़ लोग एचआईवी से प्रभावित हैं।
-एंटीरेट्रोवाइरल थेरेपी (एआरटी) शरीर में एचआईवी वायरस को फैलने से रोकता है।
- एचआईवी उपचार (एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी या एआरटी) रोगी के शरीर में एचआईवी की मात्रा को कम करता है। और स्वस्थ रहने में मदद करता है।
- भारत में एआरटी अब उन सभी के लिए निःशुल्क उपलब्ध है जिन्हें इसकी आवश्यकता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं को यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि एचआईवी/एड्स (पीएलएचए) से पीड़ित लोगों को एआरटी प्रदान किया जाए।
-विश्व के लगभग 33.4 लाख बच्चे एचआईवी से प्रभावित हैं।
-मां से बच्चे में एचआईवी के संक्रमण को रोका जा सकता है।
-एचआईवी प्रभावित लोगों में सामान्य लोगों की अपेक्षा क्षय रोग (टी.बी) होने का खतरा अधिक होता है।
एचआईवी का पता चलने के बाद डॉक्टर के पास नियमित रूप से चेकअप कराने जाना चाहिए। कोई भी दवा लेने से पहले डॉक्टर से परामर्श लें। क्योंकि अपने आप किसी दवा के सेवन से साइड इफेक्ट का खतरा हो सकता है। एचआईवी पीड़ित की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो जाती है, ऐसे में किसी तरह का नशा उनके लिए खतरनाक हो सकता है।
एआरटी एचआईवी संक्रमण के प्रबंधन के लिए भारत में उपयोगी सिद्ध हो रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद और नाको ने संयुक्त रूप से इस विषय पर अध्ययन में पाया है कि एआरटी के जरिये रोगियों में मौत की आशंका में 50% तक कि कमी पाई है। साथ ही थेरपी लेने वाले एचआईवी संक्रमित लोगों में टीबी होने की संभावना में भी काफी कमी आई है। जिससे रोगियों के जीवन में सुधार आया है।
एचआईवी/एड्स से निपटने का एकमात्र उपाय है - इसकी रोकथाम। भारत की 99 प्रतिशत जनसंख्या अभी एड्स से मुक्त है। एक प्रतिशत जनसंख्या में इसके प्रसार की प्रवृति के आधार पर कई नीतियाँ बनाई जा रही हैं, जिससे इस महामारी की रोकथाम एवं इस पर नियंत्रण करने में सफ़लता पाई जा सके।
एड्स के प्रति जागरुकता से साथ ही यह भी जरूरी है कि एड्स रोगियों से किसी प्रकार का सामाजिक भेदभाव न किया जाए। यह एक संक्रामक बीमारी जरूर है लेकिन एड्स पीड़ित के साथ बात करने, उसके करीब जाने से यह संक्रमण नहीं फैलता है। इसलिए एड्स के प्रति सजगता के साथ साथ एड्स रोगियों को सामाजिक सहानुभूति भी जरूरी है।
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