ये बंदिनी: जीवन जेल की सलाखों के पीछे..कुछ गुमनाम, कुछ उदास
लखनऊ। इस देश की आधी आबादी औऱतों की है और आपको जानकर हैरत होगी कि इस आबादी का करीब साढ़े चार फीसदी हिस्सा भारतीय जेलों में कैद है। जिनमें कुछ गुमनाम, कुछ हमनाम, कुछ उदास, तो कुछ की आंखों में सवाल, औऱ दिल में हालात की कुलबुलाहट लि्ए जी रही हैं।
#महिला दिवस: जानिए अपने अधिकारों की हर बात..
यूँ हुआ कि लखनऊ के नारी बंदी निकेतन में मुझे जाने का अवसर मिला। दिल में बड़ी उत्सुकता थी की कैसा होता होगा कैदियों का जीवन ? जेल, ये शब्द ही डराता है, सलाखें, काली कोठरियां औऱ कैदियों को घूरती दीवारें, जेल तो ऐसी ही होती है।
जेल वैसी नहीं जैसी कि दिखती है..
मैंने अंदर जाने की सभी औपचारिकताएं पूरी की और अंदर जाकर देखा एक खुला आंगन, बागीचा जिसमे कई तरह के औषधियों वाले पौधे और फलदायक पेड़ लगे थे , एक ओर एक तबेला था जहाँ कुछ मवेशी बंधे थे। इन महिला कैदियों को जिन्हें मैं बंदिनी कहूँगी उन्हें वहां घूमने की आज़ादी थी जेल की चहारदीवारी ऊंची थी लेकिन जेल के भीतर धूप आती थी।
कैदियों का भी जीवन होता है जिन्हें जंजीरों में ही जीना होता है..
हमारा मकसद इन्हें कैद कर के रखने का नही, अपने गुनाहों को ये समझती है, खुद को व्यस्त रखें काम करें ताकि मन बहला रहे। इनमें से कई ऐसी भी थी जिनका जुर्म विचाराधीन है और इसके बावजूद वो सज़ा काट रही हैं ।
जेल में बंद हर तीन में से दो कैदियों का केस अदालतों की तारीखों में गुम
भारत की जेलें ऐसे विचाराधीन कैदियों से पटी पड़ी हैं। आंकड़ों के मुताबिक, जेल में बंद हर तीन में से दो कैदियों का केस अदालतों की तारीखों में गुम है। करीब 3 हजार बंदिनियां तो अपना फैसला होने के इंतजार में पांच साल से भी ज्यादा वक्त जेल में काट चुकी हैं।
लेकिन यहाँ सभी महिलाओं की मूल जरूरतों का ध्यान रखा जाता है। आईये इन पर एक नजर डालते हैं नीचे की स्लाइडों के जरिये..

सैनिटरी नैपकिन
महिला बंदियों के लिये सैनिटरी नैपकिन की व्यवस्था समस्त कारागारों में की गयी है।

भोजन प्रबन्धन
महिला बंदियों द्वारा स्वयं भोजन प्रबन्धन की व्यवस्था चरणबद्ध रूप से की जा रही है।

क्रच भी है
जेल मैनुअल में विहित प्राविधानानुरूप महिला बंदी अपने साथ 06 वर्ष तक की आयु के बच्चों को साथ में रख सकती है। बच्चों के लिये प्रदेश की 10 कारागारों में क्रच भी स्थापित है।

शिक्षण की भी व्यवस्था
नारी बंदी निकेतन, लखनऊ की महिला-बंदियों के बच्चों के लिये पब्लिक स्कूलों में शिक्षण की भी व्यवस्था की जा रही है।

रोजगारपरक उद्यमों में प्रशिक्षण
बंदियों को फल संरक्षण, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई, क्रोशिया आधारित बुनाई, अचार व चटनी बनाने की विधि आदि रोजगारपरक उद्यमों में प्रशिक्षण दिलाया जाता है।

टीकाकरण कार्यक्रमों का आयोजन
बंदियों के चिकित्सा परीक्षण व उपचार के सम्बन्ध में स्वास्थ्य परीक्षण शिविर, नेत्र परीक्षण शिविर तथा उनके बच्चों के लिये पोलियो कैम्प व टीकाकरण कार्यक्रमों का आयोजन समय-समय पर किया जाता है।

बच्चों के लिए कपड़े
विभिन्न स्वयं सेवी संस्थाओं द्वारा महिला बंदियों के लिये शाल आदि तथा बच्चों के लिये गर्म वस्त्र, जूते व मोजे आदि की व्यवस्था की जाती है।

मेडिकल सुविधा
प्रत्येक सोमवार को स्वयं सेवा संस्था द्वारा मेडिकल तथा स्वास्थ्य सम्बन्धी व्याख्यान दिलाये जाने तथा एड्स एवं गम्भीर बीमारियों के बारे में जानकारी दिये जाने की व्यवस्था की गयी है।

साक्षर बनाये जाने की व्यवस्था
विभिन्न स्वयं सेवी संगठनों के तत्वाधान में साक्षरता शिविरों का आयोजन किये जाने और प्रत्येक निरक्षर महिला बंदियों को कार्यरत महिला अध्यापिका द्वारा साक्षर बनाये जाने की व्यवस्था भी समय-समय पर की जाती है।

बंदिनी की एक कहानी और मानसिक यातना
1963 में बिमल रॉय की फिल्म बन्दिनी में एक ऐसी ही कैदी का किरदार नूतन ने निभाया था जिसे कत्ल के दोष में उम्रकैद की सज़ा हुई थी। आज भी भारत की जेलों में ऐसी अनगिनत बंदिनी हैं, हर बंदिनी की एक कहानी और मानसिक यातना है। ये औरतें भी किसी परिवार का हिस्सा हैं जिन्हें भी महिला दिवस पर याद करना बनता है।












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