Turkey on Kashmir: भारत के आतंरिक मामलों पर तुर्किये क्यों बयानबाजी करता है?

बीते कई सालों में तुर्किये ने जम्मू और कश्मीर पर भारत-विरोधी बयान दिए हैं। क्या यह बयानबाजी इसलिए होती है क्योंकि तुर्किये के वर्तमान राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगान को अपनी सत्ता बचानी है?

Why does Turkey make statements on Indias internal matters kashmir

Turkey on Kashmir: तुर्किये के विदेश मामलों के उप-मंत्री मेहमत केमल बोजे ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद (UNHRC) में फिर से जम्मू और कश्मीर का मामला उठाया है। बोजे ने कहा कि तुर्किये, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद प्रस्तावों के आधार पर जम्मू और कश्मीर में शांतिपूर्ण समाधान चाहता है। इस पर यूएनएचआरसी में भारतीय प्रतिनिधि सीमा पुजानी ने तुर्किये को लताड़ लगाई और कहा कि वह भारत के आंतरिक मामलों में अनावश्यक बयान देने से बचे।

हालांकि, तुर्किये ने पहले भी कई दफा जम्मू और कश्मीर सहित भारत के मुसलमानों की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय मंचों के माध्यम से चिंता जताई है। भारत ने हर बार उसके आरोपों का खंडन किया है। गौर करने वाली बात है कि साल 2014 में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बने उसी वक्त तुर्किये के राष्ट्रपति रजब तैयब एर्दोगान चुने गए। इन बीते सालों में भारत और तुर्किये के बीच कूटनीतिक रिश्तों में कई बार उतार-चढ़ाव देखें गए हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने खुद को किया दूर

राष्ट्रपति एर्दोगान दो बार भारत की यात्रा कर चुके हैं। वे साल 2017 और फिर 2018 में भारत आये थे। जबकि, प्रधानमंत्री मोदी एकबार भी तुर्किये की यात्रा पर नहीं गये हैं। साल 2019 में प्रधानमंत्री मोदी का तुर्किये का दौरा प्रस्तावित था लेकिन राष्ट्रपति एर्दोगान ने संयुक्त राष्ट्र संघ में जम्मू और कश्मीर को लेकर एक भारत-विरोधी बयान दे दिया, जिसके कारण वह दौरा टल गया।

राष्ट्रपति एर्दोगान के एजेंडे में कश्मीर क्यों?

भारत और तुर्किये के रिश्तों में तल्खी साल 2016 में आनी शुरू हुई। तब तुर्किये की कमान राष्ट्रपति एर्दोगान के हाथों में थी। उनके खिलाफ धार्मिक नेता फ़तहुल्लाह गुलेन ने तख्तापलट की कोशिश की। गुलेन तुर्किये के ही रहने वाले हैं लेकिन फिलहाल अमेरिका में निर्वासित जीवन जी रहे है। इसलिए राष्ट्रपति एर्दोगान को इस तख्तापलट में अमेरिका का हाथ नजर आता है।

फ़तहुल्लाह गुलेन, गुलेन आन्दोलन के प्रवर्तक है जोकि शिक्षा, नागरिक कल्याण, मीडिया और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्रों में काम करता है। इसके समर्थकों की संख्या करीब 2 लाख और लगभग 40 लाख लोग इसके विचारों से प्रभावित हैं। गुलेन आंदोलन भारत सहित दुनियाभर के 160 देशों में मौजूद है।

यह तख्तापलट पूरी तरह से नाकाम रहा और जुलाई 2016 में राष्ट्रपति एर्दोगान ने गुलेन संगठन का समर्थन करने वाले करीब 10 हजार तुर्किये के सैनिकों को हिरासत में लिया। साथ ही इस आंदोलन से जुड़े 10 हजार टीचिंग स्टाफ सहित निजी शिक्षण संस्थानों के करीब 20 हजार शिक्षकों का भी लाइसेंस रद्द कर दिया। फिलहाल, राष्ट्रपति एर्दोगान ने गुलेन आन्दोलन को फ़तहुल्लाह गुलेन टेररिस्ट ऑर्गेनाइजेशन (FETO) के नाम से प्रतिबंधित किया हुआ है।

राष्ट्रपति एर्दोगान अपनी सत्ता को बचाने के लिए अब दुनियाभर में गुलेन आंदोलन से जुड़े संस्थानों पर रोक लगवाना चाहते है। इसलिए भारत के दौरे पर आ चुके तुर्किये के विदेश मंत्री मेवलुत काउसोगलू ने भारत को गुलेन आन्दोलन से जुड़े शैक्षिक संस्थानों को बंद करवाने को कहा लेकिन भारत ने इस ओर जादा ध्यान नहीं दिया।

फिर साल 2017 और 2018 में राष्ट्रपति एर्दोगान बड़े लाव-लश्कर के साथ दिल्ली आये। इन दौरों का असल मकसद भारत से परमाणु बिजली बनाने की तकनीकी सहायता मांगना था। तुर्किये ने भारत से थोरियम और उससे बनने वाली बिजली की तकनीक मांगी लेकिन भारत ने मना कर दिया। तुर्किये इस समय भारी ऊर्जा संकट से गुजर रहा है और इसका सीधा असर राष्ट्रपति एर्दोगान की सत्ता पर पड़ रहा है।

इसी बीच भारत की नजदीकी इजरायल, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका से बढ़ गयी। जबकि इन देशों के साथ राष्ट्रपति एर्दोगान के सम्बन्ध हमेशा तल्ख़भरे रहे है। इन सब वजहों से राष्ट्रपति एर्दोगान अपनी सत्ता बचाने सहित भारत पर दवाब बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जम्मू और कश्मीर को लेकर भारत-विरोधी बयानबाजी करते रहे हैं।

जम्मू और कश्मीर पर तुर्किये ने कब क्या कहा

राष्ट्रपति एर्दोगान ने जब 2017 में भारत की यात्रा पर थे तब भी उन्होंने जम्मू और कश्मीर को लेकर बयान दिया था। इस पर काफी ज्यादा विवाद पैदा हुआ था।

साल 2019 में राष्ट्रपति एर्दोगान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने जम्मू और कश्मीर से अनुच्छेद 370 समाप्त करने की जमकर आलोचना की। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर जम्मू और कश्मीर के लोगों की आजादी छिनने का भी आरोप लगाया। फरवरी 2020 में जब राष्ट्रपति एर्दोगान पाकिस्तान की यात्रा पर थे तब उन्होंने पाकिस्तानी संसद में कहा कि कश्मीर जितना अहम पाकिस्तान के लिए है उतना ही तुर्किये के लिए भी है।

1 जून 2022 को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ तुर्किये की राजधानी अंकारा पहुंचे। इस द्विपक्षीय मुलाकात के दौरान संयुक्त प्रेसवार्ता में राष्ट्रपति एर्दोगान ने कहा कि वे चाहते है दशकों पुराने कश्मीर मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के अनुरूप सुलझाया जाये। 20 सितंबर 2022 को राष्ट्रपति एर्दोगान ने एकबार फिर संयुक्त राष्ट्र संघ की 77वीं आमसभा को संबोधित करते हुए कश्मीर का राग अलापा। उन्होंने कहा कि 75 सालों में भारत और पाकिस्तान के बीच शांति एवं एकता स्थापित नहीं हो पाई। इसलिए जम्मू और कश्मीर में उचित एवं स्थायी शांति स्थापित हो।

जब भी पाकिस्तान और तुर्किये के नेता आपस में मिलते हैं तो एकमात्र एजेंडा जम्मू और कश्मीर सहित भारत के खिलाफ होता है। जनवरी 2019 में प्रधानमंत्री इमरान खान ने तुर्किये का दौरा किया तो उस समय भी जम्मू और कश्मीर का मुद्दा उछाला गया। नवबंर 2022 में पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी अपनी बातचीत में जम्मू और कश्मीर को शामिल किया।

भारत ने हमेशा की तुर्किये की मदद

भारत की नीति दुनियाभर के लिए स्पष्ट रही है। चाहे दोस्त हो या दुश्मन मुश्किल समय में हमेशा मदद को तैयार होता है। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि हाल ही में जब तुर्किये में भयंकर भूकंप आया तो सबसे पहले सहायताकर्मी, भोजन, मेडिसिन, बचाव दल व अन्य जरूरी सामानों के साथ कई कार्गों जहाज भारत सरकार ने तुर्किये भेजे।

बीते साल भी तुर्किये में भोजन की कमी हो गयी थी। तब भारत सरकार ने 56,877 टन गेहूं वहां भेजा। हालांकि, अपने गुरूर में राष्ट्रपति एर्दोगान ने वह भारतीय गेहूं लेने से इनकार कर दिया। इसके पीछे तर्क दिया गया कि गेंहू में रूबेला वायरस (Rubella Disease) पाया गया है। जबकि बाद में उसी गेहूं को इजिप्ट ने खरीद लिया।

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