Mother Language Day: पूर्वी पाकिस्तान का बंगाली हेतु संघर्ष अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का कारण बना
विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा देने के लिए अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की शुरुआत की गई थी। इस वर्ष मातृभाषा दिवस की थीम ‘बहुभाषी शिक्षा - शिक्षा को बदलने की आवश्यकता’ रखी गयी है।

Mother Language Day: 21 फरवरी को पूरे विश्व में अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के रूप में मनाया जाता है। दुनिया में भाषाई और सांस्कृतिक विविधता एवं बहुभाषिता को बढ़ावा देने और मातृभाषाओं से जुड़ी जागरूकता फैलाने के उद्देश्य से यह दिन मनाया जाता है। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रसिद्ध कविता निज भाषा का एक दोहा मातृभाषा के महत्व को दर्शाता है। उन्होंने लिखा था "निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल।" मतलब मातृभाषा की उन्नति बिना किसी भी समाज की तरक्की संभव नहीं है तथा अपनी भाषा के ज्ञान के बिना मन की पीड़ा को दूर करना भी मुश्किल है।
इस दिवस की घोषणा कब हुई
यूनेस्को ने 17 नवंबर 1999 को अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाए जाने की घोषणा की थी। इस दिवस को मनाने का उद्देश्य था कि विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा मिले। 2008 को अंतरराष्ट्रीय भाषा वर्ष घोषित करते हुए संयुक्त राष्ट्र की आम सभा ने अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के महत्व को फिर महत्व दिया था। यूनेस्को द्वारा अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस की घोषणा से ही बांग्लादेश के भाषा आंदोलन दिवस को वैश्विक स्वीकृति मिली।
यूनेस्को के मुताबिक दुनियाभर में 6000 भाषाएं बोली जाती हैं। भारत की बात करें तो साल 1961 की जनगणना के मुताबिक यहां 1652 भाषाएं एवं बोलियां बोली जाती हैं। इनमें से 52.8 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिंदी है।
बांग्लादेश के भाषा आंदोलन से शुरुआत
क्या आप जानते हैं कि इस दिन की शुरूआत की वजह बांग्लादेश बना था। दरअसल, 1948 में पाकिस्तान सरकार ने उर्दू को एकमात्र राष्ट्रीय भाषा घोषित कर दिया। भले ही पूर्वी पाकिस्तान में अधिकांश लोग बंगाली या बांग्ला बोलते थे। तब पूर्वी पाकिस्तान ने बांग्ला को भी राष्ट्रीय भाषा का दर्जा देने की मांग की थी। 21 फरवरी 1952 को इस सन्दर्भ में विरोध तीव्र प्रदर्शन हुए। कई लोग मारे गए। मातृभाषा के इस संघर्ष ने यूनेस्को द्वारा मातृभाषा दिवस मनाने के विचार को प्रेरित किया।
तबके पूर्वी पाकिस्तान और आज के बांग्लादेश के भाषा आंदोलन की शुरुआत वास्तव में 1948 में हुई थी। इस आन्दोलन के दौरान पाकिस्तान सरकार के दमन के चलते कई लोगों की जान चली गई थी। इस आन्दोलन का नेतृत्व बांग्लादेश के राष्ट्रपिता बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान ने किया। बांग्लादेश में बांग्ला भाषा आंदोलन में जान गवाने वालों शहीदों की याद में 21 फरवरी को शहीद दिवस मनाया जाता है जिसे 'अमर एकुशे' के रूप में भी जाना जाता है।
मातृभाषा, राष्ट्रभाषा और राजभाषा में अंतर
मातृभाषा, राष्ट्रभाषा और राजभाषा तीनों अलग-अलग होती हैं। आइए जानते हैं राष्ट्रभाषा, राजभाषा और मातृभाषा में क्या अंतर है। मातृभाषा वह भाषा है जो हम जन्म के साथ सीखते हैं। जिस परिवार और समाज में हम पैदा होते हैं, वहां बोली जाने वाली भाषा खुद ही सीख जाते हैं। उदाहरण के तौर पर अगर कोई गुजराती परिवार में पैदा हुआ है तो गुजराती उसकी मातृभाषा होगी। वहीं राष्ट्रभाषा वह भाषा होती है जिसका किसी देश में सबसे अधिक प्रयोग होता है। यह देश की आधिकारिक भाषा होती है। जैसे अंग्रेजी अमेरिका की राष्ट्रभाषा है। इसके साथ ही राजभाषा वह भाषा है जिसका इस्तेमाल प्रशासनिक कार्यों और सरकारी कामकाज में होता है। भारत में हिंदी हमारी राजभाषा है। यहां सरकारी दफ्तरों और अन्य जगहों पर अधिकतर हिंदी में ही काम होते हैं। हिंदी को राजभाषा का दर्जा 14 सितंबर 1949 को मिला।
भारत में मातृभाषा पर ध्यान
हाल ही में घोषित राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 में मातृभाषाओं के विकास पर सबसे अधिक ध्यान दिया गया है। साथ ही वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग (सीएसटीटी) क्षेत्रीय भाषाओं में विश्वविद्यालय स्तर की पुस्तकों के प्रकाशन के लिए प्रकाशन अनुदान प्रदान कर रहा है। सरकार द्वारा संकटग्रस्त भाषाओं के संरक्षण के लिए संकटग्रस्त भाषाओं का संरक्षण और संरक्षण योजना चलाई जा रही है। इसके साथ ही गूगल का प्रोजेक्ट 'नवलेखा' मातृभाषा की रक्षा के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग करता है। इस परियोजना का उद्देश्य भारत की स्थानीय भाषाओं में ऑनलाइन सामग्री को बढ़ाना है। साथ ही शिक्षा का अधिकार (आरटीई) अधिनियम, 2009 कहता है कि शिक्षा का माध्यम, जहां तक संभव हो, बच्चे की मातृभाषा में होना चाहिए।
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