GM Mustard: जीएम सरसों पर क्या है विवाद? क्यों विरोध होता रहा है जेनेटिकली मोडिफाइड बीजों का?
मालूम हो कि इससे पहले मई 2017 में भी इस कमेटी ने इसी किस्म को अपनी अनुमति दी थी। लेकिन उस समय कमेटी के इस फैसले का किसानों, पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों द्वारा भारी विरोध हुआ। जिस कारण सरकार ने जीईएसी की सिफारिशों को मना
भारत सरकार के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की एक समिति जैनेटिक इंजीनियरिंग अप्रैजल कमेटी (जीईएसी) ने अक्टूबर 18, 2022 को जीएम सरसों की एक किस्म डीएमएच-11 (बताया जा रहा है कि इसे प्रो. दीपक पेंटल द्वारा भारत में विकसित किया गया है) को एक बार फिर से खेतों में लगाने की सिफारिश की है।

मालूम हो कि इससे पहले मई 2017 में भी इस कमेटी ने इसी किस्म को अपनी अनुमति दी थी। लेकिन उस समय कमेटी के इस फैसले का किसानों, पर्यावरणविदों और वैज्ञानिकों द्वारा भारी विरोध हुआ। जिस कारण सरकार ने जीईएसी की सिफारिशों को मना कर दिया था।
लेकिन अब 18 अक्टूबर 2022 की बैठक में जीईएसी ने इसकी पुनः सिफारिश की है। दावा किया जा रहा है कि यह संकर किस्म (जीएम) सरसों 26 प्रतिशत अधिक उपज देगी और उपभोक्ताओं, किसानों और पर्यावरण के लिए सुरक्षित है।
क्या है जीएम सरसों?
जैनेटिक्ली मोडिफाइड (आनुवंशिक रूप से संशोधित) किस्म को दो अलग-अलग किस्मों से मिलाकर बनाया जाता है। ऐसी प्रथम पीढ़ी (जेनरेशन) संकर किस्म की उपज मूल किस्मों से ज्यादा होने का संयोग रहता है। लेकिन सरसों के साथ ऐसा करना आसान नहीं होता। इसकी वजह यह है कि इसके फूलों में नर और मादा, दोनों प्रजनन अंग (रीप्रोडक्टिव ऑर्गन) होते हैं और सरसों का पौधा काफी हद तक खुद ही परागण कर लेता है। किसी दूसरे पौधे से कीट-पतंगे पराग ले आएं, इसकी जरूरत नहीं होती। ऐसे में कपास, मक्का या टमाटर की तरह सरसों की संकर (हाइब्रिड) किस्म तैयार करने का संयोग काफी कम हो जाता है।
लेकिन दिल्ली यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर जेनेटिक मैनिपुलेशन ऑफ क्रॉप प्लांट्स के वैज्ञानिक प्रो. दीपक पेंटल व अन्य वैज्ञानिकों ने सरसों की भारतीय किस्म 'वरुणा' की क्रॉसिंग पूर्वी यूरोप की किस्म 'अर्ली हीरा-2' से कराकर यह किस्म तैयार की है।
जीएम सरसों का विरोध क्यों?
इसके विरोध में दो खेमे हैं। एक खेमा तो किसानों एवं पर्यावरण से जुड़े संगठनों का है तथा दूसरा खेमा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुवांशिक संगठक स्वदेशी जागरण मंच जैसे सामाजिक सगठनों का है।
जीएम सरसों में थर्ड 'बार' जीन की मौजूदगी इसके विरोध की पहली वजह है। जिसके चलते जीएम सरसों के पौधों पर खरपतवार नाशक ग्लूफोसिनेट अमोनियम का असर नहीं होता। जीएम बीज विरोधियों का कहना है कि इस केमिकल का इस्तेमाल होगा तो खरपतवार हटाने में इंसानों की जरूरत घट जाएगी, केमिकल हर्बिसाइड्स का इस्तेमाल बढ़ेगा और मजदूरों के लिए काम के मौके घट जाएंगे।
इसके विपरित इस किस्म को तैयार करने वालों का कहना है कि बड़े पैमाने पर बीज तैयार करने के लिए जीएम मस्टर्ड में थर्ड 'बार' जीन डालना जरूरी था क्योंकि इसके जरिए यह पहचान होती है कि कौन से पौधे जेनेटिकली मॉडिफाइड हैं। जो जीएम पौधे नहीं होंगे, वे खरपतवार नाशक केमिकल को बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे।
बताया यह भी जा रहा है कि जीईएसी ने हाइब्रिड बीज तैयार करने में हर्बिसाइड के इस्तेमाल की इजाजत दी है और उसने कहा है कि हाइब्रिड फसलों की खेती में किसी भी सूरत में इस हर्बिसाइड का इस्तेमाल न किया जाए। लेकिन सवाल फिर यह उठता है कि खेती के दौरान इस हर्बिसाइड का उपयोग नहीं होगा, इसकी गारंटी कौन लेगा? अगर इस हर्बिसाइड का अंधाधुंध उपयोग होने लगा तो पौधों की कई किस्मों को नुकसान हो सकता है।
दूसरी चिंता का कारण यह है कि जीएम मस्टर्ड के चलते मधुमक्खियों पर बुरा असर पड़ेगा, उनकी आबादी घट सकती है। मधुमक्खियों के शहद बनाने में सरसों के फूल बड़ा रोल निभाते हैं। ये फूल परागण में मदद करने वाले दूसरे कीट-पतंगों के लिए भी बड़े काम के होते हैं।
इस चिंता को दरकिनार करने के लिए जीईएसी ने बायोटेक्नॉलजी डिपार्टमेंट और इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिट्यूट के वैज्ञानिकों की एक रिपोर्ट का हवाला दिया है। उसमें कहा गया है कि दुनियाभर में जो जानकारी उपलब्ध है, उसके मुताबिक मधुमक्खियों और दूसरे कीट-पतंगों पर जीएम मस्टर्ड से बुरा असर पड़ने का संयोग बहुत कम है।
हालांकि जीईएसी ने यह भी कहा है कि इस बारे में कुछ और फील्ड ट्रायल किए जाने चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि भारतीय जलवायु में जीएम मस्टर्ड का कैसा असर दिखता है।
स्वदेशी जागरण मंच का कहना है कि जीईएसी ने मोदी सरकार के दौरान ही इससे पहले दूसरी फसलों के बारे में भी इसी तरह की सिफारिशें की थीं, लेकिन सरकार ने उन्हें मंजूरी नहीं दी था। इसलिए जीएम सरसों के बारे में की गई सिफारिश को भी खारिज किया जाना चाहिए, क्योंकि जीएम सरसों न तो स्वदेशी है और न ही सुरक्षित।
जीएम सरसों पर सरकार का फैसला
केंद्र सरकार ने अभी तक जीईएसी की सिफारिश पर कोई निर्णय नहीं किया है। किसान संगठनों और सामाजिक संस्थाओं का सरकार पर दवाब है कि खतरनाक प्रभाव वाले वैज्ञानिक प्रयोगों से भारत की कृषि को बचाए रखा जाए, अन्यथा खाद्य फसलों के दुष्प्रभाव से करोड़ों उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से जीएम सरसों को स्वीकृति देने के विषय पर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया है। कोर्ट ने यह आदेश एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया जिसमें जीएम सरसों पर रोक की अपील यह कहते हुए की गई कि जीएम सरसों की खेती से मानव स्वास्थ्य और सरसों के नैसर्गिक बीजों पर बुरा असर पड़ सकता है।












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