क्या है freebies, या रेवड़ी बांटना? क्या अंतर है Subsidy से?
राजनैतिक दलों में फ्रीबिज के माध्यम से चुनावों में सफलता पाने की मानसिकता बढ़ने लगी है। क्या फ्रीबीज जनमत को प्रभावित करने वाला एक प्रमुख अस्त्र बन गया है?

स्वतंत्रता के पश्चात, अलग-अलग समय पर सरकारों ने देश के विकास के लिए एक रोडमैप तैयार किया, जिसके अंतर्गत गरीबी हटाने सहित बेहतर सामाजिक सेवा, पानी, सड़क, रेल इत्यादि के निर्माण का विस्तार किया गया। हालांकि लोकतंत्र में अपनी सत्ता को बचाने के लिए राजनैतिक दलों ने मुफ्त में सेवायें देने का क्रम स्थापित किया है, जिसके चलते मुफ्तखोरी की समस्या विकराल रूप धारण करने लगी हैं। हालत यह है कि राज्यों की आर्थिक स्थिति कमज़ोर होती दिख रही हैं।
सब्सिडी और फ्रीबिज में अंतर
आगे बढ़ने से पहले सब्सिडी और फ्रीबिज में अंतर जान लेना जरुरी है। दरअसल, दोनों के शाब्दिक और मौलिक व्यवहार में बहुत अंतर हैं। सब्सिडी को राजसहायता के नाम से भी जाना जता है जोकि सामान्यतः केंद्र अथवा राज्य सरकारों द्वारा नागरिकों, सामाजिक भलाई से जुड़े व्यापार, शैक्षिक अथवा स्वास्थ्य संस्थानों को दिया जाने वाला लाभ है। आमतौर पर यह नकदी में भुगतान अथवा टैक्स में कमी करके दिया जाता हैं।
सरल शब्दों में समझे तो किसी भी नागरिक अथवा संस्थान से सरकार पैसा लेगी लेकिन उसमें सरकारी लाभांश नहीं रहेगा जिससे उस वस्तु की कीमत देश के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग भी वहन कर सके। आजकल यह वैकल्पिक भी है यानि अगर आप आर्थिक रूप से संपन्न है और आप सब्सिडी वाली वस्तु को उसके वास्तविक मूल्य पर खरीद सकते हैं तो आप उसकी पूरी कीमत चुका सकते है।
जबकि फ्रीबिज इसके एकदम विपरीत है। इसके अंतर्गत किसी भी सरकारी सेवा को सत्ता में बैठे राजनैतिक दल अपने नागरिकों को मुफ्त में बांट देते है। सरल शब्दों में समझे तो आपको किसी भी सेवा अथवा वस्तु के लिए कोई पैसा किसी को नहीं देना पड़ेगा और उसका लाभ आप भरपूर ले सकते हैं। इससे सरकारी राजस्व पर तो नकारात्मक असर पड़ता ही है बल्कि नागरिकों में भी अराजकता की भावना पैदा हो सकती है।
आरबीआई ने दी सरकारों को चेतावनी
भारतीय रिजर्व बैंक ने बिहार, पंजाब, राजस्थान, केरल, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और हरियाणा के बारे में जानकारी देते हुए बताया है कि इन राज्यों पर कर्ज और ब्याज अदायगी का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। कोविड़-19 के बाद राज्यों की वित्तीय स्थिति का अध्ययन करने वाले आरबीआई के डिप्टी गवर्नर माइकल देवव्रत पात्रा की अगुवाई में अर्थशास्त्रियों ने बताया कि देश के सभी राज्यों का जितना कुल बजट है, उसका आधा हिस्सा दस राज्यों पर कर्ज है। मुफ्त और सब्सिडी वाली योजनाओं के कारण कर्ज और ब्याज अदायगी का बोझ बढ़ रहा हैं। कई राज्य बिजली कंपनियों का बकाया नहीं चुका पा रहे, जिसके कारण सब्सिडी पर उनकी देनदारी और बढ़ रही है।
भारत का संविधान क्या कहता है
संविधान में फ्रीबिज के लिए कोई प्रत्यक्ष परिभाषा नहीं दी गयी है और न ही इससे जुड़ा कोई कानून भारत की संसद में पारित किया गया है। हाँ, इतना जरुर है कि केंद्र अथवा राज्य सरकारें सामाजिक भलाई के लिए कल्याणकारी योजनाओं को लागू कर सकती हैं। दरअसल, भारतीय संविधान के अध्याय 4 में अनुच्छेद 36 से 51 के अनुसार सरकारें अपने कर्तव्यों की सीमा के अंतर्गत रहते हुए समाज के लिए कल्याणकारी नियम बनाने में सक्षम हैं।
वहीं, अनुच्छेद 282 के अनुसार भारतीय संघ व राज्य की विधानसभाओं को किसी भी सामाजिक उद्देश्य के लिए कोई अनुदान देने की अनुमति है। मगर इसमें अनुदान के तहत फ्रीबिज को परिभाषित नहीं किया है। फिर भी अनुच्छेद 282 की आड़ में अथवा इसे आधार बनाकर सरकारों द्वारा अपने निजी चुनावी फायदे के लिए इसका गलत इस्तेमाल किया जाता है।हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट में फ्रीबिज अथवा मुफ्तखोरी को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने का एक मामला लंबित है।
मुफ्तखोरी देने वाले राज्यों की आर्थिक स्थिति
तेलंगाना सरकार ने 2018-19 में रायथू बंधु योजना के लिये 12,000 करोड़ रुपए आवंटित किये, किसानों को 24×7 मुफ्त बिजली आपूर्ति के लिये 1000 करोड़ रुपए खर्च किया है। तेलंगाना सरकार ने आरबीआई से अक्टूबर महीने के लिए 3,500 करोड़ रुपये का कर्ज देने का अनुरोध किया। वहीं, राजस्थान सरकार पर कुल कर्ज 4 लाख 34 हजार करोड़ से ज्यादा हो चुका है। राज्य के प्रत्येक नागरिक पर करीब 52 हजार रुपए का कर्ज हो चुका है।
पंजाब पर पहले से ही 2.75 लाख करोड़ का कर्ज है, लेकिन वहां की राज्य सरकार ने अपने वादे पूरे करने के लिए वहां 600 बिजली यूनिट फ्री देने की घोषणा की है तथा केंद्र से 56 हज़ार करोड कर्ज लेने की बात चल रही है। राज्य के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 45 प्रतिशत कर्ज में है। दिल्ली सरकार पर 31 मार्च 2018 तक 26269 करोड रुपए बिजली कंपनियों की देनदारी है। वहीं पिछले 5 वर्षों में दिल्ली जल बोर्ड ने दिल्ली सरकार से 41000 करोड़ रुपए का ऋण लिया है।
मुफ्तखोरी से बर्बाद हुए विश्व के अनेक देश
फ्रीबिज की समस्या भारत ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों में अपने पैर पसारने लगी है, जिसके कारण अनेक देशों की अर्थव्यवस्था भी बर्बाद हो रही है अथवा बर्बादी की कगार पर है। इसमें प्रमुख रूप से श्रीलंका और अर्जेंटीना का नाम सामने आता है।
श्रीलंका को 10.9 बिलियन डॉलर का द्विपक्षीय कर्ज (दो देशों के बीच लेनदेन), 9.3 बिलियन डॉलर बहुपक्षीय कर्ज (वैश्विक संस्थाओं या बैंकों द्वारा दिया गया कर्ज, जैसे आईएमएफ, वर्ल्ड बैंक आदि) और 14.8 बिलियन डॉलर व्यापारिक ऋण (आयात कर्ज) चुकाना है। श्रीलंका की अर्थव्यवस्था 84.5 बिलियन डॉलर की है। जबकि, अर्जेंटीना ने अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष से इतिहास का सबसे बड़ा कर्ज 57 अरब डॉलर (करीब 4.13 लाख करोड़ रुपए) का लिया है।












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