US Military Bases: चीन की घेराबंदी के लिए फिलीपींस में अमेरिकी फौज, और कहां हैं अमेरिकी सैन्य अड्डे
चीन को घेरने के लिए अमेरिका ने फिलीपींस में और नये सैन्य अड्डे बनाने की घोषणा की है। गौरतलब है कि अमेरिकी सेनायें किसी न किसी रूप में दुनिया के हर हिस्से में मौजूद हैं।

चीन को घेरने के लिए अमेरिका ने फिलीपींस में अपने चार और सैन्य अड्डे बनाने पर समझौता किया है। यह सैन्य अड्डे फिलीपींस के इसाबेल, जामबेल्स, पालावान और कागायेन डे ओरो क्षेत्र में बनाये जायेंगे। हालांकि, फिलीपींस के लिए यह कोई नयी बात नहीं है क्योंकि इससे पहले भी चीन को घेरने के लिए अमेरिका ने वहां सैन्य अड्डे बनाये हुए हैं। दरअसल, जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति बने तो उन्होंने फिलीपींस के साथ एनहैंस्ड डिफेंस कोऑपरेशन एग्रीमेंट (EDCA) नाम से एक समझौता किया था। इसी समझौते के अंतर्गत अमेरिका ने वहां पहले से पांच सैन्य अड्डे बना रखे हैं।
इससे पहले, 50 के दशक में वियतनाम और शीत युद्ध (Cold War) के दौरान अमेरिका के फिलीपींस में क्लार्क फील्ड और सूबिक बे के पास दो बड़े मिलिट्री बेस थे। तब यहां 15 हजार से ज्यादा अमेरिकी सैनिक तैनात थे। फिर, साल 1992 में अमेरिका ने फिलीपींस से अपनी सेना को वापस बुला लिया था।
दुनियाभर में अमेरिका के सैंकड़ों बेस कैंप
दुनिया की सैन्य शक्ति का आंकलन करने वाली वेबसाइट 'ग्लोबल फायर पॉवर इंडेक्स' के अनुसार अमेरिका के दुनिया के कई देशों में 800 सैन्य ठिकाने हैं। इनमें 100 से ज्यादा खाड़ी देशों में हैं, जहां तब 60-70 हजार जवान तैनात थे। वेबसाइट ने यह आकड़ें कथित तौर पर अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के हवाले से दिए थे। इसके अलावा, अमेरिकी सैन्य अड्डों पर नजर रखने वाली एक वेबसाइट overseasbases.net के अनुसार अमेरिका के 80 से अधिक देशों में लगभग 750 सैन्य अड्डे हैं। वेबसाइट का कहना है कि अमेरिका के सबसे ज्यादा सैन्य अड्डे जर्मनी में 119, जापान में 119, दक्षिण कोरिया में 73 और इटली में 44 हैं।
अमेरिकी सरकार का क्या कहना है
जबकि साल 2018 में अमेरिकी डिपार्टमेंट ऑफ डिफेन्स की बेस स्ट्रक्चर रिपोर्ट के अनुसार 45 देशों में 514 अधिकारिक सैन्य संपत्तियां हैं। खास बात यह है कि अमेरिका ने इस रिपोर्ट में सीरिया, अफगानिस्तान और ईराक में अपनी सैन्य मौजूदगी का कोई जिक्र नहीं किया। हालांकि, अमेरिकी सरकार ने इस रिपोर्ट में सीधे तौर पर सैन्य अड्डों का जिक्र न कर 'वर्ल्डवाइड रियल प्रॉपर्टी पोर्टफोलियो' शब्दों का प्रयोग किया हैं। यानि वास्तव में, अमेरिका के दुनियाभर में कितने सैन्य अड्डे हैं, यह जानकारी पूरी तरह से गोपनीय रखी जाती है।
दुनिया के हर कोने में मौजूद हैं अमेरिकी सैनिक
फेडरेशन ऑफ अमेरिकन साइंटिस्ट्स, इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के आंकड़ों के अनुसार ईरान के इर्द-गिर्द अमेरिकी सेना के लगभग 68 हजार जवानों की तैनाती की गई है। वहीं तुर्की में अमेरिका के हजार से ज्यादा सैनिक तैनात बताये जाते हैं। सऊदी अरब में भी गोपनीयता के साथ अमरीकी फौजों की अच्छी-खासी तैनाती हैं।
इसके अलावा कुवैत, जॉर्डन, बहरीन, कतर, जिबूती, यूएई, ओमान, कजाकिस्तान, फिलीपींस, ऑस्ट्रेलिया, बोत्सवाना, सोमालिया, कांगो, केन्या, इथोपिया, लेबनान, ट्यूनिशिया, माली, नाइजर, चाड, युगांडा, कैमरून, घाना, बुर्किना फासो, सेनेगल, स्पेन, बेल्जियम, इटली, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, ग्रीस, साइप्रस, ब्रिटेन, आयरलैंड, क्यूबा, सिंगापुर, थाइलैंड, मालदीव में अमेरिकी सैन्य अड्डों की मौजूदगी हैं।
पाकिस्तान में भी अमेरिकी बेस कैंप
जून 2021 में अमेरिकी टीवी चैनल HBO Axios को दिए एक इंटरव्यू में तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान ने कहा था कि वह पाकिस्तान में कोई भी अमेरिकी सैन्य अड्डा नहीं बनाएंगे। इसके लिए उन्होंने "बिल्कुल नहीं" शब्द का इस्तेमाल किया था। हालांकि, अमेरिकी रक्षा विषयों पर शोध करने वाली वेबसाइट और जानकारों के अनुसार पाकिस्तान में अमेरिकी सैन्य अड्डे मौजूद हैं लेकिन उनकी जानकारी कभी सार्वजनिक नहीं की जाती। इसमें सबसे प्रमुख नाम पाकिस्तान का जैकोबाबाद शहर है, जहां अमेरिकी सैनिकों की मौजूदगी है। वैसे पाकिस्तान के बलूचिस्तान में शम्सी एयर स्ट्रिप्स पर भी कई सालों तक अमेरिकी विमानों की मौजूदगी रही थी।
गौरतलब है कि अगस्त 2022 में अलकायदा का टॉप लीडर अयमान अल-जवाहिरी को अमेरिका ने काबुल में एक ड्रोन हमलें में मार गिराया था। तब तालिबान ने पाकिस्तान पर आरोप लगाये थे कि अमेरिकी ड्रोन पाकिस्तानी एयर स्पेस की तरफ से ही अफगानिस्तान में दाखिल हुए थे। यानि अगर तालिबान की बातों में सच्चाई है तो इसका मतलब है कि अमेरिकी ड्रोन भी पाकिस्तान में तैनात हैं।
साल 2021 में सोशल मीडिया में पाकिस्तानी जमीन पर अमेरिकी सैनिकों की कुछ तस्वीरें और वीडियो वायरल हो गए थे। जब इस मामले पर स्पष्टीकरण मांगा गया तो पकिस्तान के इंटीरियर मिनिस्टर को बयान देना पड़ा कि पाकिस्तान में अमेरिकी फौजें अस्थाई रूप से मौजूद हैं।
भारत के दूसरे पड़ोसी देशों पर भी अमेरिका की नजर
सितम्बर 2017 में अमेरिका ने नेपाल के साथ मिलेनियम चैलेंज कोऑपरेशन (MCC) नाम से एक द्विपक्षीय समझौता किया था। इसके अंतर्गत नेपाल को अमेरिका 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर की आर्थिक सहायता प्रदान करेगा। इसके अलावा, 30 जनवरी 2023 को अमेरिकी राजनैतिक मामलों की अंडर सेक्रेटरी ऑफ स्टेट विक्टोरिया नौलैंड ने नेपाल का दौरा किया। इस दौरे के बाद अमेरिका अब MCC के माध्यम से नेपाल में एक बिलियन अमेरिकी डॉलर का निवेश करेगा। गौरतलब है कि नेपाल में इस समझौते का भारी विरोध है क्योंकि नेपाली जनता को लगता है कि इस आर्थिक सहायता के बहाने अमेरिका अपनी सैन्य शक्तियों का नेपाल में दुरप्रयोग कर सकता है।
दरअसल, नेपाल में अमेरिकी दूतावास की वेबसाइट के अनुसार एमसीसी एक गैर-सैन्य समझौता है। यह अमेरिका द्वारा नेपाल को दी गयी एक आर्थिक सहायता है न कि कर्जा। इस दरियादिली ने नेपाली सरकार को अमेरिका के एकदम करीब ला दिया है। अब इसका नतीजा यह हुआ है कि नेपाल ने अमेरिका के साथ स्टेट पार्टनरशिप प्रोग्राम नाम से एक सैन्य समझौता किया है।
खास बात यह है कि इस समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देऊबा और चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ जनरल प्रभुराम शर्मा ने अमेरिका का दौरा किया था। इसके अलावा अमेरिकी सैन्य अधिकारी भी इस समझौते के लिए कई बार नेपाल आ चुके है। इस समझौते के अनुसार अब अमेरिका किसी न किसी रूप में अपनी सेना को नेपाल में तैनात कर सकता है। इसी प्रकार एक समझौता अमेरिका ने बांग्लादेश के साथ भी किया हुआ है।
इसके अलावा, अमेरिका ने श्रीलंका में भी अपनी सैन्य मौजूदगी के रास्ते तलाशने शुरू कर दिए हैं। रायटर्स की साल 2019 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका स्टेटस ऑफ फोर्सेज एग्रीमेंट (SoFA) नाम का एक समझौता श्रीलंका के साथ करना चाहता था। इसके अंतर्गत अमेरिका को श्रीलंका में अपनी सेना तैनात करने की छूट मिल जाती लेकिन श्रीलंका में इसका भारी विरोध हो गया। इसके बाद अमेरिका ने श्रीलंका को विजिटिंग फोर्सेज एग्रीमेंट (VFA) नाम से दूसरा प्रस्ताव दिया। इसके अनुसार अमेरिकी फौजें श्रीलंका में आती-जाती रहेंगी। व्यावहारिक रूप से देखने पर VFA और SoFA से कोई ज्यादा खास अंतर नहीं है क्योंकि दोनों ही स्थितियों में अमेरिकी जवान श्रीलंका में तैनात रहते। फिलहाल श्रीलंका ने दोनों अमेरिकी प्रस्तावों को मंजूरी नहीं दी है।
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