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Unrest in PoK: पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में पाकिस्तान से मुक्ति की मांग

पिछले कई महीनों से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान में पाकिस्तान सरकार के खिलाफ लगातार हिंसक प्रदर्शन सामने आ रहे हैं।

Unrest in PoK Demand for liberation from Pakistan in Pakistan occupied Kashmir

पाकिस्तान जहां राजनैतिक अस्थिरता और आर्थिक बदहाली से जूझ रहा है, वहीं उसके सामने अब उसके अनाधिकृत कब्जे वाले कश्मीर में विकराल समस्या पैदा होने लगी है। पिछले कई महीनों से वहां के स्थानीय नागरिक पाकिस्तान सरकार के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। हालात यह बन गए हैं कि पाकिस्तान सरकार ने देशभर में आतंकी हमलों की संभावना जताई हैं। दरअसल, पाकिस्तान सरकार को लगता है कि इन प्रदर्शनों की आड़ में गिलगित-बाल्टिस्तान में चीनी इंजीनियरों सहित पूरे पाकिस्तान में आतंकवादी हमलों को अंजाम दिया जा सकता हैं।

कहां से शुरू हुआ विरोध

26 अक्टूबर 1947 को जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने इस इलाके सहित पूरे जम्मू और कश्मीर का अधिमिलन भारत के साथ अधिकारिक तौर पर किया था। जिसे भारत के तत्कालीन वायसराय एवं गवर्नर जनरल माउंटबेटन ने भी स्वीकृति दी थी। मगर उसी दौरान पाकिस्तान की तरफ से हुए कबायली हमले में यह इलाका पाकिस्तान के कब्जे में चला गया और बाद में युद्ध विराम की घोषणा के कारण यह मसला वही रुक गया। चूँकि, पाकिस्तान का इस क्षेत्र पर कोई अधिकारिक दावा नहीं है, इसलिए इस कब्जे वाले कश्मीर को वहां आजाद कश्मीर कहकर संबोधित किया जाता हैं। आजतक यह पाकिस्तान का अधिकृत राज्य भी नहीं बन सका है। फिर भी पाकिस्तान ने इस क्षेत्र को अपने साथ शामिल करने के लिए विगत वर्षों में कई संवैधानिक प्रयास किये हैं।

वास्तव में, अभी तक यह एक स्वशासित राज्य है, जिसका अपना अलग राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और आधिकारिक ध्वज होता है। इस्लामाबाद स्थित कश्मीर मामलों का मंत्रालय इस क्षेत्र को नियंत्रित करता है, जिसकी अध्यक्षता पाकिस्तान के प्रधानमंत्री करते है।

पिछले कुछ सालों से चीन यहां भारी मात्रा में कंस्ट्रक्शन कर रहा है और पाकिस्तानी ने चीन को उसकी पूरी छूट दे रखी है। वहीं चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर भी इसी इलाके से गुजरने वाला है। चूंकि यह दो देशों - भारत और पाकिस्तान के बीच एक विवादित इलाका है इसलिए चीन चाहता है कि इकोनॉमिक कॉरिडोर के तैयार होने के पहले पाकिस्तान इस इलाके को कानूनी अमलीजामा पहना दें ताकि अंतरराष्ट्रीय पटल पर कोई मुद्दा न बनें। इसलिए पाकिस्तान सरकार इस इलाकें को अपने पांचवें प्रान्त के रूप में दर्जा देने के लिए 15वां संवैधानिक संशोधन लेकर आई थी।

इससे पहले, जून 2018 में 13वें संवैधानिक संशोधन के माध्यम से पाकिस्तान अधिकृत जम्मू और कश्मीर की विधानसभा को कानून बनाने और कॉरपोरेट टैक्स को छोड़कर अन्य टैक्स एकत्र करने की शक्तियां दी गई थी। हालांकि, वहां उच्च अदालत के न्यायाधीशों सहित चुनाव आयुक्त को नियुक्त करने का अधिकार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री के पास ही रहने दिया गया था। 15वां संशोधन स्वीकृत होने की स्थिति में 13वें संशोधन के नियमों को वापस ले लिया जाएगा। जिससे वहां की सभी वित्तीय व प्रशासकीय स्वायत्त शक्तियां छीन जाएगी। हालाँकि, स्थानीय विरोध के बाद 15वां संविधान संशोधन इस्लामाबाद ने वापस ले लिया है।

किस तरह पाकिस्तान लगातार कर रहा उल्लंघन

इस इलाके में पाकिस्तान, चीन के साथ मिलकर लगातार कंस्ट्रक्शन कर रहा है। जो दरअसल स्वायत्तशासी क्षेत्र में है और साथ ही नियमों का उल्लंघन कर इसे बनाया जा रहा है। इस इलाके में चीन के 24 हजार सैनिकों की तैनाती भी बड़ी हिंसा का कारण है। जिसकी वजह स्थानीय लोग गुस्से में हैं कि हमारे इलाके में चीनी सैनिकों का क्या काम।

'पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर' में कब-कब हुआ विरोध प्रदर्शन

साल 2018 में पीओके के रावलकोट में बढ़ती आतंकवादी गतिविधियों को लेकर लोगों ने पाकिस्तान सरकार और फौज के खिलाफ प्रदर्शन किया। साथ ही सरकार पर आतंकियों को समर्थन और आर्थिक मदद देने का आरोप लगाते हुए कहा कि इस्लामाबाद सरकार लश्कर ए तैय्यबा और जैश ए मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों को मदद करती है।

साल 2019 में पीओके के लोगों ने अपने क्षेत्र में हुए पाकिस्तानी कब्जे का विरोध करते हुए पूरे क्षेत्र में प्रदर्शन किया। मुजफ्फराबाद शहर में, यूनाइटेड कश्मीर पीपुल्स नेशनल पार्टी ने 75 साल पहले जम्मू कश्मीर पर हुए सैन्य हमले के खिलाफ एक रैली का आयोजन किया। साथ ही प्रदर्शनकारियों ने आजादी के नारे लगाए और पाकिस्तानी सेना और सरकार के कब्जे वाले क्षेत्र को आजाद करने की मांग की। इसी साल पीओके नीलम-झेलम जलविद्युत परियोजना के तहत नदियों पर बांधों को लेकर भी मुजफ्फराबाद में जबरदस्त विरोध प्रदर्शन हुआ था।

2022 के दिसंबर महीने के पहले सप्ताह में ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के पीओके के पीएम सरदार तनवीर इलियास का कथित तौर पर अपमान करने के विरोध में मुजफ्फराबाद में लोग सड़कों पर उतर आए। बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों ने पाक पीएम शहबाज शरीफ के खिलाफ नारे लगाए और आजादी-आजादी के नारे लगाते हुए प्रदर्शनकारियों ने सड़क को जाम कर दिया और शहबाज शरीफ से माफी की मांग की।

पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर के स्कार्दू शहर के लोगों ने बिजली और गेहूं की कमी को लेकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने लालटेन लेकर मार्च निकाला। शहर के हुसैनी चौक में प्रदर्शनकारियों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी की। बाल्टिस्तान अवामी एक्शन कमेटी के आह्वान पर कई राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विरोध-प्रदर्शन में हिस्सा लिया।

गौर करने वाली बात ये है कि पीओके में पाकिस्तान सेना के जुल्मों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन पहले भी होते रहे हैं। लेकिन, जब-जब वहां प्रदर्शन होते हैं प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए पाकिस्तानी सेना उन पर गोलियां चलाने और आंसू गैस के गोले दागने से परहेज नहीं करती। इससे स्थानीय लोगों में सेना के प्रति भी गुस्सा है।

भारत का स्टैंड?

यहां एक बात ये भी है कि आखिर इस पूरे मसले पर भारत का क्या स्टैंड है? क्योंकि पूरे दुनिया और कई बार यूएन (यूनाइटेड नेशन) में भारत को घेरने के लिए पाकिस्तान, हमेशा भारत के कश्मीर वाले हिस्से पर सवाल उठाता है और मानवाधिकार की दुहाई देता है। हालांकि, बार-बार भारत ने उसको इन मुद्दों पर दुनिया के सामने कई बार लताड़ लगाई है। वहीं पीओके को लेकर भारत की मंशा पूरी तरह से साफ है कि वो भारत का अभिन्न हिस्सा है और उसे वापस लेकर रहेंगे।

पीएम मोदी ने जब उठाया था गिलगित का मुद्दा

साल 2016 में 15 अगस्त के दिन लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गिलगित और बाल्टिस्तान का मुद्दा उठाया था। वहां मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए पाकिस्तान को फटकार भी लगाई थी। जबकि कई बार रक्षामंत्री राजनाथ सिंह और गृहमंत्री अमित शाह खुले मंच से पीओके को भारत का हिस्सा मानते हुए वापस लेने की बात कर चुके हैं।

इस साल के नवंबर महीने में राजनाथ सिंह जम्मू-कश्मीर के दौरे पर गए थे। जहां उन्होंने कहा था कि पीओके में पाकिस्तान ने जो किया है, उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। वह 'अत्याचार' कर रहा है। उन्होंने आगे कहा कि हमने कश्मीर का विकास कार्य शुरू कर दिया है, लेकिन हम तब तक नहीं रुकेंगे जब तक हम गिलगित-बाल्टिस्तान नहीं पहुंच जाते।

भारतीय सेना के उत्तरी कमान अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के बयान के बाद कहा था कि सरकार का जो भी निर्देश रहेगा, उसका पालन किया जाएगा। हमारी सेना पूरी तरह से तैयार है। जैसे ही सरकार का निर्देश मिलेगा, हम उसी हिसाब से काम करेंगे।

भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है ये इलाका?

यह पूरा इलाका भौगोलिक स्थिति की वजह से भारत के लिए सामरिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर में चीन और अफगानिस्तान, पश्चिम में पाकिस्तान का खैबर पख्तूनख्वा प्रांत। वहीं इसकी सीमाएं उत्तर-पूर्व में चीन के शिन्जियांग प्रांत से जुड़ती हैं। साथ ही सबसे ज्यादा पाकिस्तान की ओर से यहीं आतंकी कैंपों को संरक्षण दिया जाता है। इसलिए अगर ये इलाका पाकिस्तान का नहीं होगा तो उसके पास आतंक की फैक्ट्री चलाने के लिए कोई खास जगह नहीं बचेगी। इससे भारत को आतंकी घटनाओं से काफी हद तक निजात मिलेगी, और पूरे कश्मीर का शांतिपूर्ण विकास हो सकेगा।

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