Uniform Civil Code: देश में कब से हो रही है समान नागरिक संहिता की मांग, मजहब क्यों नहीं है मुद्दा

देश के सीमावर्ती और पर्वतीय राज्य उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता विधेयक पर पूरे देश और दुनिया की निगाह है। यूनिफॉर्म सिविल कोड के नाम से इस कानून को लागू करने वाला उत्तराखंड देश का पहला होगा।

हालांकि, गोवा में इस तरह का एक कानून है जो लगभग 150 साल पहले 1867 में पुर्तगालियों के समय लाया गया था, जो वर्ष 1966 में नए संस्करण के साथ बदल दिया गया। इसके बाद गोवा में सभी धर्मों के लोगों के लिए विवाह, तलाक, विरासत वगैरह के संबंध में समान कानून हैं। जानते हैं कि देश में यूनिफॉर्म सिविल कोड की मांग कब से उठ रही है और क्या हैं इसके सामाजिक पहलू।

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संविधान सभा में भी उठी थी समान नागरिक संहिता की मांग
देश की आजादी के बाद संविधान सभा की बैठकों में कई सदस्यों ने समान नागरिक कानून लागू करने की मांग की थी। संविधान सभा में मौलिक अधिकारों की उप-समिति के एम.आर. मसानी, हंसा मेहता और राजकुमारी अमृत कौर समेत अधिकतर सदस्यों ने समान नागरिक कानून को जल्द से जल्द लागू करने का प्रस्ताव रखा था। राजकुमारी अमृत कौर ने संविधान सभा की एडवाइजरी कमेटी को पत्र लिखकर यह भी प्रस्ताव रखा कि समान नागरिक कानून को मौलिक अधिकारों में सम्मिलित किया जाए।

संविधान सभा में 9 अप्रैल 1948 को हिन्दू संहिता को प्रस्तावित करते समय रोहिणी कुमार चौधरी ने कहा था, "उत्तराधिकार के लिये और विवाह के कानूनों का सांप्रदायिक विधान नहीं, बल्कि एक समान नागरिक संहिता होनी चाहिए, जो सभी समुदायों, सभी वर्गों के प्रत्येक व्यक्ति पर लागू हो। वास्तव में धर्म, पंथ, जाति के अनुसार विभेद किये बिना यदि यह सभी नागरिकों पर एक ही संहिता लागू होगी तो मैं इसका समर्थन करता हूँ"। हरि विनायक पाटस्कर ने 12 दिसंबर 1948 को हिन्दू कोड पर चर्चा के दौरान सभी के लिए समान नागरिक कानून का पक्ष रखा था।

डॉ. अंबेडकर ने लिया था समान नागरिक कानून का पक्ष
संविधान सभा की बैठकों में अनुच्छेद 44 पर चर्चा करते समय डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने भी समान नागरिक कानून के पक्ष में बोला था। संविधान सभा ने विधायिका में सांप्रदायिक निर्वाचन या धर्म के आधार पर सीटों के आरक्षण या पृथक निर्वाचन समाप्त किया। उस समय सी. सुब्रमणियम, जसपत राय कपूर और हंसा मेहता ने समान नागरिक कानून के पक्ष में अपने वक्तव्य दिये थे। 22 नवंबर 1949 को हंसा मेहता ने स्पष्ट रूप से कहा था, "यह बहुत महत्वपूर्ण है कि यदि एक राष्ट्र का निर्माण करना चाहते हैं तो हमारी एक नागरिक संहिता हो"। 24 नवंबर 1949 को ए. थानु पिल्लई ने भी संविधान सभा में ऐसा ही कहा।

संविधान सभा (लेजिसलेटिव) में 14 दिसंबर 1949 को हिन्दू कोड पर चर्चा करते हुए वी.आई. मुनिस्वामी पिल्लई ने भी इस पर जोर दिया। प्रोविजनल पार्लियामेंट में जब हिन्दू कोड पर चर्चा हुई, तब भी 5 फरवरी 1951 को कई सदस्यों ने समान नागरिक कानून के पक्ष में अपने मत दिये थे। इसमें विनायक सीतारमण सरवटे, इंद्र विद्यावाचस्पति और जेआर कपूर जैसे नाम प्रमुख थे। फिर इसी हिन्दू कोड पर 7 फरवरी 1951 को को चर्चा के दौरान सेठ गोविन्द दास ने भी समान नागरिक सहिंता का समर्थन किया। इनके अलावा के. एम. मुंशी और अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर ने भी समान नागरिक कानून के पक्ष में अपने स्पष्ट और ठोस विचार रखे।

संसद और राजनीति में समान नागरिक संहिता पर क्या-क्या हुआ
मौजूदा समय में देश में भले ही प्रचारित किया जाता हो कि समान नागरिक संहिता की मांग राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जनसंघ (बाद में भाजपा) या उसके विचारों से जुड़े संगठनों की ओर से की जा रही है, लेकिन सच यह है कि संविधान सभा की बैठकों के बाद भी सड़क से लेकर संसद तक में विभिन्न राजनीतिक दलों की ओर से समय-समय पर इसकी मांग की गई।

कांग्रेस की राज्यसभा सांसद श्रीमती सीता परमानन्द ने 11 मई 1962 को "यूनिफार्म सिविल कोड फॉर द कंट्री" शीर्षक से एक निजी विधेयक पेश किया। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि सरकार को अनुच्छेद 44 के तहत देश के सभी नागरिकों की सुरक्षा के लिए पूरे देश में सामान नागरिक सहिंता को लागू करने के प्रयास करने चाहिए।"

इसके बाद भारतीय जनसंघ ने 1967 में पहली बार अपने मैनीफेस्टो में वादा किया था कि अगर वह सत्ता में आते हैं, तो वह समान नागरिक कानून पारित करेंगे। जनसंघ ने यह कानून विवाह, दत्तकग्रहण उत्तराधिकार जैसे मुद्दों पर बनाने की बात कही गई थी।

केन्द्रीय विधि मंत्री एच.आर. भारद्वाज ने 29 जुलाई 1986 को वादा किया था कि समान नागरिक कानून के प्रस्ताव को बढ़ाने के लिए सरकार तेजी से प्रयास कर रही है। इसके बाद 6 अगस्त 1993 को भाजपा सांसद सुमित्रा महाजन ने लोकसभा में समान नागरिक कानून के पक्ष में एक बिल पेश किया। भाजपा के सांसद और अनुसूचित जनजाति के नेता डॉ. किरोड़ीलाल मीणा भी साल 2022 में राज्यसभा में समान नागरिक संहिता के पक्ष में एक निजी विधेयक पेश कर चुके हैं।

समान नागरिक संहिता पर कम्यूनिस्ट और संघ की मिलती-जुलती सोच
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शरद पवार (तब कांग्रेस में) ने 14 मई 1993 को केन्द्रीय गृह मंत्री, एस.बी. चह्वान को पत्र लिखकर कहा कि राज्य की विधानपरिषद समान नागरिक कानून के पक्ष में है। वहीं, 4 अगस्त 1995 को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (एम) के महासचिव, हरकिशन सिंह सुरजीत ने कहा कि उनका राजनैतिक दल समान नागरिक संहिता का समर्थन करता है।

साल 1995 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मण्डल ने समान नागरिक संहिता के पक्ष में प्रस्ताव पारित किया था। इसके बाद 10 जनवरी 2000 को अहमदाबाद में आयोजित संकल्प शिविर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह (जनरल सेक्रेटरी) एच.वी. शेषाद्रि ने कहा था कि समान नागरिक संहिता के संदर्भ में उच्चतम न्यायालयों के फैसलों को लागू करना चाहिए। भाजपा के 1996, 1998, 2004, और 2009 में मैनीफेस्टो में भी समान नागरिक कानून के बारे में एकराय बनाने और उसे लागू करने के वादे किए जा चुके हैं।

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