इतिहास के पन्नों से- पानीपत में मराठा वीर जाड़े से हारे
नई दिल्ली(विवेक शुक्ला) दिल्ली से करीब पानीपत शहर में प्रवेश करते ही आपके सामने इतिहास के पन्ने खुलने लगते हैं। इसी शहर में तीन बड़े युद्ध हुए। पहला, 1526 में मुगल बादशाह बाबर और दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोधी के बीच।

दूसरा, 5 नवंबर, 1556 को हुआ हेमू और अकबर की सेना के बीच। अकबर की सेना का नेतृत्व बैरम खान कर रहे थे। तीसरा और शायद सबसे अहम युद्ध पानीपत में लड़ा गया अहमद शाह अब्दाली और मराठों के बीच। ये शुरू हुआ 14 जनवरी,1761 को। ये बेहद खूनी जंग थी। मराठे उत्तर भारत में मुस्लिम शासकों को सत्ता से बेदखल करना चाहते थे।
जंग में दोनों तरफ से हजारों सैनिकों का खून बहा। हां, फतेह तो अब्दाली को मिली थी। जाबांज मऱाठा सैनिक क्यों हारे ? इस सवाल का जवाब अब भी तलाश रहे हैं इतिहासकार। पर कुछेक दावा करते है कि पानीपत के बेहद ठंडे मौसम ने मराठों को हराया था न कि अब्दाली की फौजों ने। उधर, अफगान ठंडी जलवायु से परिचित थे। इसलिए वे जंग के मैदान में बेहतर तरीके से लड़ सके।
खाने-पीने की सप्लाई
इसके अलावा पानीपत में मराठों को खाने-पीने की सप्लाई भी सही तरह से नहीं हो रही थी। जिसका उन्हें नुकसान हुआ। कुछ इतिहासकार कहते हैं कि मराठा युद्ध की रणनीति पर एक राय नहीं थे। होल्कर और सिंधिया गुरिल्ला अंदाज में युद्ध करना चाहते थे। जबकि मराठों के कुछ सरदार जैसे भाऊ जी और इब्राहीम खान गरदी युद्ध में आर्टिलरी के खासे इस्तेमाल के पक्ष में थे। पानीपत से पहले दोनों के बीच करनाल के पास कुंजपुरा में भी युद्ध हुआ। ये बात 17 अक्तूबर ,1760 की है।
कहां हुआ था युद्ध
पानीपत की किस जगह पर भिड़े थे मराठा और अब्दाली? युद्ध के मैदान को लेकर भी विवाद हैं। पर कहा जाता है कि पानीपत के काला अंब और शोनाली रोड़ में युद्ध हुआ था।
युद्ध कई दिनों तक चला था। कहते हैं कि अबदाली ने जंग में फतेह के बाद 40 हजार मराठों का कत्ल करवा दिया था। पर युद्ध में पराजय के चलते मराठा देश के उत्तर भारत में पैर नहीं जमा सके थे।












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