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स्टालिन की शोक सभा में थे करुणानिधि, तब MK के पैदा होने की मिली खबर

चेन्नई। आज तमिलनाडु की राजनीति में बहुत बड़ा बदलाव देखने को मिला है क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री करुणानिधि के निधन के बाद आज उनके बेटे एमके स्टालिन को पार्टी की कमान औपचारिक रुप से सौंप दी गई है आपको बता दें कि पूरे 49 वर्ष बाद पार्टी की कमान किसी और के हाथ में आई है, इस पार्टी का नेतृत्व 49 सालों तक एमके करूणानिधि ने ही किया है और अब उनके जाने के बाद पार्टी की सत्ता स्टालिन को सौंपी गई है।

शोकसभा में थे करुणानिधि, तब MK के पैदा होने की मिली खबर

आज पार्टी हेडक्वार्टर में आयोजित डीएमके की महापरिषद में 65 साल के स्टालिन को सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया जबकि दुरैई मुरुगन को पार्टी के नए कोषाध्यक्ष बने हैं। पार्टी में अध्यक्ष पद के लिए सिर्फ स्टालिन ने ही नामांकन किया था। मालूम हो कि स्टालिन कई सालों से बतौर कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर पार्टी को संभाल रहे थे।

कैसे पड़ा स्टालिन नाम?

कैसे पड़ा स्टालिन नाम?

आपको बता दें कि एमके स्टालिन करूणानिधि की दूसरी पत्नी दयालु अम्मल के बेटे हैं। इनका जन्म 1 मार्च 1953 को हुआ यानी सोवियत कम्यूनिस्ट जोसेफ स्टालिन की मौत के महज चार दिन बाद हुआ था। जब स्टालिन का जन्म हुआ तो करूणानिधि उस वक्त जोसेफ स्टालिन के लिए आयोजित एक शोक सभा में थे तभी उन्हें इस बात की जानकारी दी गई कि उनके घर बेटे का जन्म हुआ है, उन्होंने इस नेता के नाम पर ही अपने बेटे का नाम स्टालिन रख दिया था।

स्टालिन ने यूथ विंग की शुरुआत की थी

स्टालिन ने यूथ विंग की शुरुआत की थी

राजनीति को विरासत में पाए एमके स्टालिन जनवरी साल 2017 में पार्टी के पहले कार्यकारी अध्यक्ष बने थे, इन्हें काफी तेज-तर्रार नेता कहा जाता है। अपने स्कूली दिनों से ही स्टालिन का झुकाव राजनीति की ओर था, साल 1970 से ये अपने पिता संग डीएमके पार्टी की बैठकों में भाग लेने लगे। इन्होंने चेन्नई के गोपालपुरम में पार्टी की यूथ विंग की शुरुआत की थी। इसके कुछ वक्त बाद ही ये पार्टी के उप महासचिव बने और इसके बाद साल 2008 में कोषाध्यक्ष के तौर पर भी काम करने लगे।

आसान नहीं है स्टालिन का सफर

आसान नहीं है स्टालिन का सफर

पार्टी की सत्ता हाथ में आने के बाद स्टालिन अपने ही बड़े लेकिन सौतेले भाई एम. के. अलागिरि से चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। दरअसल करुणानिधि के दोनों बेटे एम के स्टालिन और अलागिरी दोनों एक-दूसरे के विरोधी हैं। इसलिए ही करुणानिधि ने 2016 में वारिस घोषित किया था, उन्होंने उस वक्त कहा था कि इस घोषणा का मतलब ये नहीं कि वह खुद संन्यास ले रहे हैं, यह कार्यकर्ताओं को संदेश है कि पार्टी का उत्तराधिकारी मौजूद है, इसके घोषणा से उन्होंने स्टालिन और अलागिरी के बीच चल रहे सत्ता संघर्ष पर विराम लगाने की कोशिश की थी लेकिन ये दरार वक्त के साथ-साथ बढ़ती ही गई और अब खुलकर सामने आ गई है।

 अलागिरी ने 5 सितंबर को एक बड़ी रैली बुलाई है

अलागिरी ने 5 सितंबर को एक बड़ी रैली बुलाई है

मालूम हो कि अलागिरी ने 5 सितंबर को एक बड़ी रैली बुलाई है, इस रैली के साथ ही वह अपनी भविष्य की रणनीति का ऐलान कर सकते हैं। उन्हें साल 2014 में पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप के कारण पार्टी से बाहर कर दिया गया था। बता दें कि इस महीने की सात तारीख को 94 वर्षीय एम करुणानिधि का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया था जिसके बाद अब उनके बेटे को उनके उत्तराधिकारी के तौर चुना गया है।

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