Suryakant Tripathi ‘Nirala’: जब निराला ने गांधी से पूछ लिया, ‘आपको हिंदी पर बोलने का अधिकार किसने दिया?’
‘महाप्राण’ नाम से विख्यात सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ छायावादी दौर के चार स्तंभों में से एक है। उनकी कीर्ति का आधार सरोज-स्मृति, राम की शक्ति-पूजा और कुकुरमुत्ता सरीखी लंबी कविताएं हैं।

Suryakant Tripathi 'Nirala': पश्चिम बंगाल के मेदिनीपुर में 21 फरवरी 1896 को जन्मे सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की मातृभाषा बांग्ला थी। 20 वर्ष की आयु में निराला ने हिन्दी सीखनी शुरू की थी। जिसके बाद उन्होंने हिंदी भाषा को अपने लेखन का माध्यम बनाया। सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने न केवल हिंदी में महारत हासिल की, बल्कि हिंदी साहित्य के अग्रणी भी रहे। निराला के बचपन में उनका नाम सुर्जकुमार रखा गया। उनके पिता पंडित रामसहाय तिवारी उन्नाव (बैसवाड़ा) जिले के गढ़ाकोला गांव के रहने वाले थे। वह महिषादल में सिपाही की नौकरी करते थे। निराला की शिक्षा हाई स्कूल तक हुई थी।
भाई नेहरू बुलाए तो जाउंगा, प्रधानमंत्री से मिलने नहीं
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ उनके वैचारिक मतभेद थे। वे प्रधानमंत्री नेहरू के पश्चिमी पालन-पोषण के बेहद आलोचक थे। एक बार प्रधानमंत्री नेहरू जब इलाहाबाद आए तो उन्होंने निराला से मुलाकात का संदेश भिजवाया। हालांकि, निराला उनसे मिलने नहीं गए। निराला ने उस समय कहा कि भाई जवाहर बुलाए तो वे नंगे पांव मिलने जा सकते है पर प्रधानमंत्री नेहरू से मिलने नहीं जाएंगे। बात जब जवाहरलाल नेहरू तक पहुंची तो वे खुद ही उनसे मिलने के लिए दारागंज स्थित उनके आवास पर पहुंचे थे।
महात्मा गांधी से निराला का टकराव
1936 में एक साहित्य समारोह के दौरान महात्मा गांधी ने कह दिया था कि "हिंदी साहित्य में एक भी रविंद्रनाथ टैगोर नहीं हुआ है।" इस बात पर निराला ने आगे बढ़कर महात्मा गांधी से पूछा कि क्या उन्होंने पर्याप्त हिंदी साहित्य पढ़ा है या नहीं? उनके पूछने पर गांधी ने स्वीकार किया कि उन्होंने हिंदी साहित्य का अधिक अध्ययन नहीं किया है। जिस पर निराला ने कहा, "आपको मेरी भाषा हिंदी के बारे में बात करने का अधिकार किसने दिया?" निराला ने यह भी कहा कि मैं आपको अपनी कुछ रचनाएं भेजूंगा ताकि आपको हिंदी साहित्य के बारे में बेहतर जानकारी मिल सके।
महादेवी वर्मा के पास करवाते थे पैसे जमा
निराला ने हिंदी साहित्य को जितना मजबूत किया, उससे ज्यादा हिंदी को बल्कि कहें कि पूरे मानव समाज को सार्थक बनाने का प्रयास किया। अपने लिए उनके पास कुछ भी नहीं था। वे हिंदी के बड़े कवि और साहित्यकार थे लेकिन रॉयलटी का पैसा भी उनके पास नहीं रहता था। एक बार महादेवी वर्मा ने उनसे कहा कि आपका सारा रूपया पैसा मैं रखूंगी ताकि कुछ तो बच सके जो आपके लिए भविष्य में काम आएगा।
निराला के लिए महादेवी छोटी बहन थी। इसलिए निराला अपना सारा पैसा महादेवी को दे देते थे लेकिन जब भी कोई निराला के सामने हाथ पसारता, वो महादेवी के पास जाते और मांगकर ले आते थे। महादेवी वर्मा को समझ में आ गया कि उनका भाई साहित्यकार और कवि से कहीं ज्यादा बड़ा इंसान है, जिसके लिए इंसान का दर्द उसकी भौतिक जरूरतों से कहीं ज्यादा बड़ा है।
फिराक गोरखपुरी और निराला की दोस्ती
फिराक गोरखपुरी (असली नाम रघुपति सहाय) और निराला की दोस्ती के भी कई किस्से हैं। रमेश चंद्र द्विवेदी लिखते हैं कि फिराक और निराला में दोस्ती तो थी, लेकिन जमकर लड़ाई भी होती थी। वह नौकर से निराला के लिए रिक्शा मंगवाते और गेट तक उन्हें छोड़ने जाते। वे रिक्शेवाले को पैसा पहले ही दे दिया करते थे। फिराक खुद ही निराला से कविता सुनाने के लिए जिद करते और जब निराला कविता पढ़ना बंद कर देते तो वह उनकी कविता में खामियां बयान करते। निराला पहले तो सुनते और फिर जब उनसे न रहा जाता तो वो भी फिराक पर बरस पड़ते थे। कभी-कभी निराला अंग्रेजी में भी लड़ते मगर फिराक उनका जवाब हिंदी में देते थे। जब भी निराला आते तो फिराक नौकर को भेज कर एक बोतल महुए की शराब मंगवाते। निरालाजी के लिए कोरमा, कबाब, भुना हुआ गोश्त, पुलाव, मिठाइयां सब कुछ रहता। फिराक अंदर आकर बार-बार नौकर को कह जाते- ख़बरदार, कुछ कम न पड़ने पाए।
निराला का साहित्य में योगदान
अनामिका (1923), परिमल (1930), गीतिका (1936), तुलसीदास (1939), कुकुरमुत्ता (1942), अणिमा (1943), बेला (1946), नये पत्ते (1946), अर्चना (1950), आराधना (1953), गीत कुंज (1954), सांध्य काकली और अपरा निराला की प्रमुख काव्य-कृतियां हैं। लिली, सखी, सुकुल की बीवी उनके प्रमुख कहानी-संग्रह और कुल्ली भाट, बिल्लेसुर बकरिहा उनके चर्चित उपन्यास हैं। चाबुक शीर्षक से उनके निबंधों की एक पुस्तक भी प्रसिद्ध है।
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