100 टके का सुझाव, पर स्मृति ईरानी क्या मोदी भी नहीं मान सकते इसे
देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि अरबन इंफ्रास्ट्रक्चर के साथ-साथ, कृषि और शिक्षा को मजबूत बनाने की बात कही। उन्होंने एक वाक्य कहा, "हर कोई चाहता है कि मेरे बच्चे पढ़ लिख कर अच्छे बने, मेरे बच्चे को अच्छी शिक्षा मिले।" ये बातें उन्होंने इसलिये कही क्योंकि विकास की धुरी देश की शिक्षा व्यवस्था पर ही टिकी हुई है। इस व्यवस्था को कैसे मजबूत किया जाये, इसके लिये लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार व एराउंड द इंछिया मैगजीन के संपादक राजेश आनंद ने प्रधानमंत्री को एक सुझाव दिया है। इस सुझाव पर अगर अमल किया जाये, तो देश की शिक्षा व्यवस्था खुद-ब-खुद मजबूत हो जायेगी।
सुझाव इस प्रकार है
"पूरे भारत में यह नियम लागू किया जाना चाहिए कि जो भी व्यक्ति सरकारी नौकरी में है या विधायक, सांसद, मेयर, सभासद, ग्राम पंचायत अध्यक्ष, आदि किसी पद पर हैं, चाहे वो मंत्री हों, कलेक्टर हो या एसपी या कोई अन्य कर्मचारी। सभी के बच्चे सरकारी स्कूल में ही पढ़ेंगे, बड़े होने पर सरकारी महाविद्यालयों में और जिनके बच्चे सरकारी स्कूल में न पढ़ते हों उन्हें सरकारी नौकरियों से निकाल दिया जाए।"
सभी लोग समझ सकते हैं कि जब जिले के कलेक्टर और एसपी तथा अन्य अधिकारीयों के बच्चे सरकारी स्कूल में पढ़ना आरम्भ कर देंगे, तो उन स्कूल में शिक्षा का स्तर क्या होगा और शिक्षक किस तरह की पढ़ाई वहां करवाएंगे। यह सुझाव तो 100 टके का है, लेकिन इसे मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति इरानी क्या, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी लागू नहीं कर सकते हैं। कारण स्लाइडर की अंतिम स्लाइड में देख सकते हैं।
अगर यह सुझाव मान लिया जाये तो क्या-क्या बदलाव आयेंगे, देखें स्लाइडर में तस्वीरों के नीचे पढ़ें।

अगर मोदी मान लेते हैं यह सुझाव
मोदी और स्मृति अगर इस सुझाव को मान लें तो क्या-क्या हो सकता है, वो आगे की स्लाइड्स में देख सकते हैं।

ईमानदारी से पढ़ायेंगे टीचर, और आगे बढ़ेंगे बच्चे
सभी शिक्षक स्कूल समय पर आएंगे और अपना कार्य पूरी ईमानदारी से करेंगे।

कामचोर टीचर इस्तीफा दे देंगे
जो शिक्षक किसी जुगाड़ के चलते शिक्षक बने हैं और पढ़ाई को मजाक बना रखा है, वो इस्तीफा दे देंगे।

टीचर धनउगाही नहीं करेंगे
जो शिक्षक स्कूल के निर्माण के नाम पर धनउगाही करते हैं, वो सारा दिमाग पढ़ाने में लगायेंगे, क्योंकि निर्माण की फिक्र तो उस कलेक्टर की होगी, जिसके बच्चे वहां पढ़ रहे होंगे।

फटाफट शौचालय बन जायेंगे
जिन स्कूलों में शौचालयों की व्यवस्था नहीं है, कमरों की दीवारें टूटी पड़ी हैं, वो फटा-फट बन जायेंगी, क्योंकि जिले का आईएस अधिकारी कतई नहीं चाहेगा कि उसके बच्चे टूटे-फूटे स्कूल में पढ़े।

कंप्यूटर लग जायेंगे
जिन स्कूलों में कंप्यूटर तो हैं, लेकिन बिजली नहीं होने की वजह से चलते नहीं, वहां स्कूल टाइम पर नियमित रूप से बिजली आयेगी, क्योंकि उसकी फिक्र बिजली विभाग के कर्मचारियों की होगी।

बच्चों के साथ नहीं होगा दुर्व्यवहार
जिन स्कूलों में शिक्षक व अन्य स्टाफ बच्चों के साथ दुर्व्यवहार करते हैं, वे सब अच्छे से पेश आयेंगे, क्योंकि स्कूल में पुलिस अधिकारियों के भी बच्चे पढ़ रहे होंगे।

नहीं होगा स्वास्थ्य से खिलवाड़
जिन स्कूलों में मिड-डे-मील के नाम पर बच्चों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ किया जाता है, वहां हर हाल में अच्छा खाना पहुंचेगा। जिले का स्वास्थ्य अधिकारी खुद खड़े होकर मिड-डे-मील की जांच करेगा, वो नहीं पहुंचा तो उसके सहायक अधिकारी तो जरूर पहुंचेंगे।

खेल के उपकरण उपलब्ध होंगे
जिन स्कूलों में खेल के उपकरण नहीं हैं, उन स्कूलों में हॉकी स्टिक्स, बैट, बॉल, फुटबॉल, आदि की कतारें लग जायेंगी, क्योंकि जिले के क्रीड़ा अधिकारी को फिक्र होगी कि उसका बच्चा नहीं खेल पा रहा है।

झूलों की मरम्मत हो जायेगी
जिन स्कूलों में टूटे झूले लगे हुए हैं, जिनसे घायल होने पर सेप्टिक तक हो सकता है, वहां नये झूले लग जायेंगे, क्योंकि अधिकारी का बच्चा घर आकर जब अपनी चोट दिखायेगा तभी अधिकारी को दर्द होगा।

समय से पहले पहुंचेंगी किताबें
जिन स्कूलों में समय से पाठ्य पुस्तकें नहीं पहुंचती हैं, वहां सत्र शुरू होने से पहले ही पुस्तकें पहुंच जायेंगी, क्योंकि पाठ्य-पुस्तक वितरण अधिकारी तत्परता के साथ काम करेंगे।

स्मार्ट लीडर जैसे विषय पढ़ाये जायेंगे
जिन स्कूलों में सिर्फ हिन्दी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान, सामाजिक विज्ञान, नैतिकशास्त्र, आदि चंद विषयों तक सीमित रह जाती है, वहां पर स्मार्ट लीडर, कंप्यूटर आदि विषय तत्काल प्रभाव से शामिल कर लिये जायेंगे।

सरकारी स्कूलों में स्मार्ट क्लासेस होंगे
जिन स्कूलों के बच्चे स्मार्ट क्लास की कल्पना तक नहीं कर सकते हैं, वे बच्चे भी इंटरनेशनल स्कूलों की तर्ज पर स्मार्ट क्लास में पढ़ सकेंगे।

अगर ऐसा हुआ तो- बच्चे बनेंगे मिसाल
अगर ऐसा हुआ तो शिक्षा के स्तर में अचानक उछाल आ जाएगा और हमारे देश के बच्चे भी मिसाल कायम करेंगे।

क्योंकि इन्हें सिर्फ अपने बच्चों की फिक्र, आम जनता के बच्चों की नहीं
जो बातें हमने कहीं, वो संभव नहीं हैं, क्योंकि हमारा संविधान इसकी इजाजत नहीं देता है। हर किसी को अपना जीवन अपने तरीके से जीने का अधिकार है। लेकिन अफसोस, नेता, अधिकारी, ऐसा होने नहीं देंगे, क्योंकि उन्हें सिर्फ अपने बच्चों की फिक्र है, आम जनता के बच्चों की नहीं।












Click it and Unblock the Notifications