Shani Jayanti: 30 साल बाद शोभन योग में शनि जयंती, जानें न्याय के देवता शनि को पूजने की विधि
नौ ग्रहों के न्यायाधीश शनिदेव की जयंती 19 मई को मनाई जाएगी। शनि के पिता सूर्यदेव और माता छाया है। यमराज और यमुनाजी इनके भाई-बहन हैं। शनि मकर और कुंभ राशि का स्वामी है। ज्योतिष में शनि को ग्रहों का न्यायाधीश माना जाता है।

पूरे 30 साल बाद 19 मई 2023 को शोभन योग में शनि जयंती मनाई जाएगी। इस दौरान शनि अपनी स्वराशि कुंभ में ही विराजमान रहेंगे। दरअसल धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक शनि देव का जन्म ज्येष्ठ या जेठ के महीने की कृष्ण पक्ष में आने वाली अमावस्या के दिन हुआ था। शनिदेव को दंडाधिकारी माना जाता है, क्योंकि शनिदेव व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। इसलिए कहा जाता है कि जिस व्यक्ति पर शनि की टेढ़ी नजर पड़ जाए वह राजा से रंक बन जाता है। वहीं जिस पर शनि देव की कृपा बरस जाए उसके जीवन का कल्याण हो जाता है।
जयंती पर शनि देव की पूजा विधि
सुबह शुद्ध होकर मंदिर जाकर शनि देव का तेल से अभिषेक करें। देव की प्रसन्नता के लिए गरीबों को दान दिया जा सकता है। शनि के तंत्रोक्त मंत्र - ओम प्रां प्रीं प्रौं स: शन्यै नम: या फिर ओम शं शनैश्चराय नम: - मंत्र की एक, पांच या ग्यारह माला के जाप जरूर करें। तिल का तेल, काले तिल, काले उड़द या लोहे की कोई वस्तु जरूर दान करें।
पूजा करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना जरूरी है, क्योंकि शनि देव अनुशासन और कठिन परिश्रम पसंद करते हैं। माना जाता है यदि शनि देव क्रोधित हो जाते हैं तो घर की सुख शांति भंग हो सकती है।
शनि जयंती के दिन प्रातः स्नान एवं नित्य क्रियाओं से निवृत होकर घर पर या मंदिर में उनकी आराधना करनी चाहिए। प्रभु की प्रतिमा के दोनों ओर शुद्ध तेल के दीपक जलाने चाहिए और धूप ध्यान करना चाहिए। नैवेद्य चढ़ाने से पहले उन पर अबीर, सिंदूर, कुंकुम और गुलाल चढ़ाकर उन्हें नीले फूल अर्पित करने चाहिए। इसके बाद उन्हे भोग लगाने के लिए मौसमी फल और श्रीफल अर्पित करना चाहिए।
आंखों में नहीं चरणों में देखने का विधान
धार्मिक मान्यता है कि इस दिन शनि अपने भक्तों पर विशेष कृपा करते हैं। शनि की साढ़े साती, ढैय्या या शनि की महादशा से गुजर रहे भक्तों के लिए यह दिन विशेष फल देने वाला है। शनि जंयती पर की जाने वाली विशेष पूजा तुरंत फलदायक होती है। लेकिन शनि के दर्शन उनकी मूर्ति के ठीक सामने खड़े होकर नहीं करना चाहिए। उनकी प्रतिमा की आंखों में नहीं देखना चाहिए, बल्कि उनके चरणों में देखने का विधान है।
पितरों के लिए धूप-ध्यान व गरीब की मदद करें
साथ ही पितरों के लिए भी धूप - ध्यान जरूर करें। घर-परिवार के मृत सदस्यों को पितर देव माना जाता है। अमावस्या की दोपहर में गाय के गोबर से बने कंडे जलाएं और जब कंडों से धुआं निकलना बंद हो जाए, तब अंगारों पर गुड़-घी अर्पित करें और पितरों का ध्यान करें। इसके बाद हथेली में जल लेकर अंगूठे की ओर से पितरों को जल चढ़ाएं। इस दिन धूप-ध्यान के बाद जरूरतमंद लोगों को अनाज, धन, कपड़े, जूते-चप्पल, छाते का दान करें।
शनि जयंती पूजा समय
अमावस्या तिथि प्रारंभ - 18 मई 2023 - रात 9:42
अमावस्या तिथि समाप्त: - 19 मई 2023- रात 9:22
इस दिन सुबह 7:11 बजे से 10:35 और दोपहर 12:18 बजे से दोपहर 2 तक की समय शनि पूजा के लिए एकदम उचित समय है।
ज्योतिष में शनि देव का महत्व
ज्योतिष में शनि देव का विशेष महत्व है। हालांकि ज्योतिष में शनि को अशुभ ग्रह की संज्ञा दी गई है। इनके पास तीसरी, सातवीं और दसवीं दृष्टि है। खास बात यह है कि शनि न्यायप्रिय देव हैं। वह किसी के साथ न तो अन्याय करते हैं और न ही अन्याय होने देते हैं। इसलिए अन्याय करने वालों को तुरंत दंड देते हैं।
कुछ स्थानों पर शनि को काले और कई जगह नीले रंग से वर्णित किया गया है। उनकी पूजा में नीले रंग के पुष्प ही चढ़ाना चाहिए। शनि एक राशि में ढाई वर्षों तक रहते हैं और कर्म के अनुसार धीरे-धीरे फल देने वाले हैं। शनि परम शिव भक्त हैं, इसलिए शनि को दोषों से दूर रहने के लिए हनुमानजी के साथ शिवजी की उपासना का भी महत्व है।
प्रतिदिन लें शनि के दस नाम
शनिदेव के दस नाम प्रतिदिन लेने से होती है सभी मनोकामना पूरी होती है। इसे श्लोक के रूप में जप सकते हैं। यदि ऐसा नहीं कर सकें, तो हर नाम के साथ ओम और नम: का उच्चारण जरूर करें। जैसे- ओम कोणस्थ नम:, कोणस्थ पिंगलो बभ्रु: कृष्णो रौद्रोन्तको यम:।
सौरि: शनैश्चरो मंद: पिप्पलादेन संस्तुत:।। अर्थात: 1- कोणस्थ, 2- पिंगल, 3- बभ्रु, 4- कृष्ण, 5- रौद्रान्तक, 6- यम, 7, सौरि, 8- शनैश्चर, 9- मंद व 10- पिप्पलाद। इन 10 नामों से शनिदेव का स्मरण करने से सभी शनि दोष दूर हो जाते हैं।
शनि देव की कथा
स्कंदपुराण के काशीखंड के अनुसार शनि देव भगवान सूर्य के पुत्र हैं। कथा के अनुसार सूर्य का विवाह प्रजापति की पुत्री संज्ञा से हुआ। संज्ञा अपने पति से बेहद स्नेह करती थी और अज्ञानता के कारण सदैव उनके तेज अर्थात अग्नि को कम करने के लिए प्रयासरत रहती थी। समय बीतने के साथ संज्ञा को तीन संतानों की प्राप्ति हुई। जिन्हें हम वैवस्वत मनु, यमराज और यमुना के नाम से जानते है। इन सब के बावजूद भी संज्ञा के मन में सूर्य की अग्नि को कम करने की तीव्र इच्छा थी। एक दिन उन्होंने तप कर सूर्य देव की अग्नि को कम करने का निश्चय कर लिया। उनके सामने पत्नी धर्म और बच्चों के पालन पोषण का सवाल था, इसलिए संज्ञा ने अपने तप से अपनी एक हमशक्ल को पैदा किया जिसका नाम संवर्णा रखा।
माता संज्ञा ने अपने बच्चों और सूर्यदेव की जिम्मेदारी अपनी छाया संवर्णा को सौंप कर कहा कि अब मेरी जगह तुम सूर्यदेव की सेवा और बच्चों का पालन पोषण करते हुए नारीधर्म का पालन करो, लेकिन यह राज सिर्फ मेरे और तुम्हारे बीच ही रहना चाहिए। जिसके बाद संज्ञा वहां से अपने पिता के घर पहुंची और अपनी परेशानी बताई, लेकिन पिता ने उन्हें समझाकर वापस अपने पति के पास जाने को कहा।
संज्ञा ने वहां से वन में जाकर कठोर तप करने का निश्चय किया। संज्ञा ने वन में एक घोड़ी का रूप धारण कर तपस्या प्रारंभ कर दी। वहीं सूर्यदेव को इस बात का जरा भी आभास नहीं हुआ कि उनके साथ संज्ञा नहीं अपितु छाया संवर्णा रह रही है। संवर्णा पति धर्म का पालन करते हुए गर्भवती हुई और उन्होंने तीन संतानों मनु, शनिदेव और भद्रा को जन्म दिया। इस प्रकार शनि देव का जन्म सूर्य और छाया संवर्णा की दूसरी संतान के रूप में हुआ।
राशि के अनुसार मनाएं शनिदेव को
मेष - सुंदरकांड या हनुमान चालीसा का पाठ करें।
वृषभ - शनि देव के नामों का जप करें।
मिथुन - शनि देव को काली उड़द चढ़ाएं।
कर्क - राजा दशरथ द्वारा रचित शनि स्त्रोत्र का पाठ करें।
सिंह - सिंदूर और चमेली के तेल से हनुमान जी को चोला चढ़ाएं।
कन्या - उपवास रखें और शनि देव के मंत्रों का जप करें।
तुला - शनि देव का अभिषेक सरसों के तेल से करें।
वृश्चिक - हनुमान चालीसा का पाठ करें, चींटियों को चीनी और आटा डालें।
धनु - पीपल के नीचे दीपक जलाएं।
मकर - शनि देव के मंत्रों का जप करें।
कुंभ - हनुमान जी की उपासना करें और नीलम रत्न धारण करें।
मीन - बजरंग बाण का पाठ करें और गरीबों की मदद करें ।
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