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Chandrayaan 3: छोटे शहरों के इन वैज्ञानिकों का बड़ा कमाल, चंद्रयान-3 की कामयाबी में दिया अहम योगदान

23 अगस्त 2023 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर शाम छह बजकर चार मिनट पर भारत के चंद्रयान-3 की सॉफ्ट लैंडिंग हुई। इस लैंडिंग के साथ ही भारत ऐसा करने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है। वहीं भारत दुनिया का चौथा ऐसा देश बना जो चंद्रमा पर अपना मिशन उतारने में कामयाब रहा।

हालांकि, इसरो की इस ऐतिहासिक कामयाबी के पीछे देश के सैकड़ों वैज्ञानिकों का संयुक्त प्रयास रहा है। खासकर उन वैज्ञानिकों का जो छोटे शहरों से निकलकर बड़ा कमाल कर दिखाने में सफल रहे हैं। चंद्रयान 3 की कामयाबी के पीछे उनका योगदान बहुत अहम रहा है। चलिए, इस पूरे मिशन से जुड़े कुछ ऐसे ही चेहरों के बारे में आपको बताते हैं।

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डॉ. रितु कारीधाल
लखनऊ की रहने वाली डॉ. रितु कारीधाल चंद्रयान-3 मिशन की डायरेक्टर है। रितु कारिधाल को भारत की 'रॉकेट वुमन' भी कहा जाता है। इसके पहले डॉ. रितु कारीधाल मंगलयान की डिप्टी ऑपरेशन डायरेक्टर और चंद्रयान-2 में मिशन डायरेक्टर रह चुकी हैं। उन्होंने लखनऊ के नवयुग कन्या महाविद्यालय से 12वीं करने के बाद साल 1991 में लखनऊ व‍िश्‍वव‍िद्यालय में फिजिक्स से बीएससी की। इसके बाद फिजिक्स में ही एमएससी की डिग्री हासिल की। उनकी रुचि स्पेस फिजिक्स में थीं। उन्होंने पीएचडी के लिए भौतिक विज्ञान में प्रवेश लिया, लेकिन छह महीने के बाद ही साल 1997 में उनका चयन इसरो में हो गया। जिसकी वजह से वह पीएचडी पूरी नहीं कर पायी थी। हालांकि, साल 2019 में लखनऊ विश्वविद्यालय ने उन्हें डी-लिट की मानद उपाधि प्रदान की।

धर्मेंद्र प्रताप यादव
उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद के टिकरी गांव के रहने वाले धर्मेंद्र प्रताप यादव चंद्रयान 3 की लॉन्चिंग टीम में शामिल हैं। वह इसरो के एक सीनियर वैज्ञानिक हैं। धर्मेंद्र प्रताप का इस मिशन में मुख्य कार्य चंद्रयान से सिग्नल को प्राप्त करने का था। धर्मेंद्र प्रताप सिंह के पिता का नाम शंभूदयाल यादव और मां का नाम कमला है। उनके पिता पेशे से किसान हैं। धर्मेंद्र ने फिरोजाबाद के ही ब्रजराज सिंह इंटर कॉलेज से 12 तक पढ़ाई की। इसके बाद मथुरा के हिन्दुस्तान कॉलेज से बीटेक और फिर एमटेक की पढ़ाई जालंधर से की। इसके बाद से वह बेंगलुरु स्थित इसरो में साल 2011 से वैज्ञानिक के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

अमिताभ कुमार
बिहार के समस्तीपुर जिले के कुबौलीराम गांव के रहने वाले अमिताभ कुमार इस चंद्रयान-3 मिशन में ऑपरेशन डायरेक्टर हैं। अमिताभ और उनकी टीम की देखरेख में चंद्रयान-3 चंद्रमा की सतह पर सफल सॉफ्ट लैंडिंग संभव हो पायी है। वह चंद्रयान-2 में भी डिप्टी प्रोजेक्ट डायरेक्टर रहे थे और साथ ही चंद्रयान-1 में भी प्रोजेक्ट मैनेजर के रूप में काम किया था। अमिताभ गांव के ही सरकारी स्कूल में 10वीं तक पढ़े हैं। इसके बाद पटना के एएन कॉलेज से इलेक्ट्रॉनिक्स से एमएससी और फिर बीआईटी मेसरा से एमटेक किया। इसके बाद वो इसरो से जुड़ गये।

महेंद्र कुमार ठाकरे
मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के कैंडा टोला निवासी महेंद्र ठाकरे का भी इस मिशन में महत्वपूर्ण योगदान है। महेन्द्र ठाकरे इस मिशन में प्रोजेक्ट हेड के रूप में जुड़े थे। महेंद्र ठाकरे इसरो में 16 साल से काम कर रहे हैं। ठाकरे की शिक्षा शासकीय बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, बिरसा तहसील से पूरी हुई। इसके बाद आईआईटी दिल्ली से पास होकर उन्होंने इसरो में वैज्ञानिक की भूमिका के रूप में कार्य किया है।

आरुषि सेठ
हरियाणा के अंबाला शहर की बहू आरुषि सेठ इसरो में अंतरिक्ष वैज्ञानिक हैं। वह चंद्रयान-3 में विक्रम लैंडर कंट्रोल यूनिट में कार्यरत हैं। वह इतिहास रचने के उन पलों के दौरान विक्रम लैंडर कंट्रोल यूनिट की जिम्मेदारी संभाल रही थीं। 23 अगस्त को जब चंद्रयान-3 की लैंडिंग का काउंट डाउन शुरू हुआ तो देश को इसरो की तरफ से दुनियाभर हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी भी लाइव टेलीकास्ट किया गया। खास बात यह है कि इंगलिश में लैंडिंग की पल-पल की जानकारी देश-दुनिया को दे रही वैज्ञानिक कोई और नहीं, बल्कि हरियाणा के अंबाला की बहू आरुषि सेठ थी। आरुषि के अलावा हरियाणा के भिवानी के गांव बड़सी जाटान के देवेश ओला और हिसार के यश मलिक ने भी योगदान दिया है।

आलोक कुमार पांडेय
चंद्रयान-3 मिशन में मिर्जापुर के रहने वाले वैज्ञानिक आलोक कुमार पांडेय ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आलोक ने चंद्रयान-3 की लैंडिंग और कम्युनिकेशन की जिम्मेदारी संभाली थी। इसरो में वरिष्ठ वैज्ञानिक के पद पर काम कर रहे आलोक पांडेय मार्स मिशन 2014 में महत्वपूर्ण भूमिका के लिए उत्कृष्ट वैज्ञानिक पुरस्कार पा चुके हैं। वहीं आलोक चंद्रयान-2 की लांचिंग में भी महत्वपूर्ण निभा चुके है।

वैज्ञानिक दंपती मेघ और गौतमी
मुरादाबाद के कांशीरामनगर ई-ब्लॉक के रहने वाले मेघ भटनागर और उनकी पत्नी गौतमी दोनों ही इसरो में वैज्ञानिक हैं। ये दोनों चंद्रयान-3 मिशन में ऑन बोर्ड सॉफ्टवेयर साइंटिस्ट के रूप में जुड़े हैं। वहीं मेघ भटनागर चंद्रयान-2 का भी हिस्सा रह चुके हैं। वह चंद्रयान-2 को कक्षा में स्थापित करने वाले रॉकेट जीएसएलवी मार्क-3 से मिशन डिजाइन क्वालिटी कंट्रोल साइंटिस्ट के रूप में थे।

रवि कुमार
बिहार के सीतामढ़ी जिले के पुपरी गांव के रहने वाले रवि कुमार इसरो में सैटेलाइट वैज्ञानिक हैं। रवि की शुरुआती पढ़ाई सीतामढ़ी से ही हुई। 2012 में भारतीय अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौधोगिकी संस्था (आईआईएसटी) त्रिवेंद्रम से एवियोनिक्स में बीटेक करने के बाद वे इसरो से जुड़े। चंद्रयान 3 की लॉन्चिंग में रवि नेटवर्क सिक्योरिटी हैंडल कर रहे थे। वहीं 2019 में रवि चंद्रयान-2 का भी हिस्सा रह चुके हैं।

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