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Rajkumari Amrit Kaur: कौन थीं देश की पहली स्वास्थ्य मंत्री राजकुमारी अमृत कौर, जिन्होंने एम्स की नींव रखी

राजकुमारी अमृत कौर (Rajkumari Amrit Kaur) महात्मा गांधी के साथ देश के स्वतंत्रता आंदोलन में जुड़ी थीं। देश के आजाद होने पर अमृत कौर देश की पहली महिला कैबिनेट मंत्री थीं और उन्हें स्वास्थ्य मंत्रालय दिया गया था।

Rajkumari Amrit Kaur Birth Anniversary indias first health minister who build AIIMS

Rajkumari Amrit Kaur: राजकुमारी अमृत कौर का जन्म 2 फरवरी 1887 को उत्तर प्रदेश के लखनऊ में हुआ था। उनके पिता राजा हरनाम सिंह अहलूवालिया कपूरथला के राजा रणधीर सिंह के बेटे थे। पिता की गद्दी संभालने को लेकर छिड़े विवाद के बाद वे कपूरथला छोड़कर लखनऊ आ गए थे। यहां उन्होंने अवध रियासत में अंग्रेजों के मैनेजर की भूमिका निभाई। इसी दौरान एक बंगाली मिशनरी गोलखनाथ चटर्जी से मुलाकात के बाद उन्होंने ईसाई धर्म अपना लिया। कुछ समय बाद उन्होंने चटर्जी की बेटी प्रिसिला से शादी कर ली। उनके 10 बच्चे हुए, जिनमें अमृत कौर सबसे छोटी और इकलौती बेटी थीं।

ईसाई की तरह बीता बचपन

राजकुमारी अमृत कौर के पिता भले ही सिख राजा रहे हों, लेकिन ईसाई धर्म अपनाने के बाद उनके बच्चों की परवरिश एक प्रोटेस्टेंट ईसाई की तरह ही हुई। अंग्रेजों के करीबी होने का फायदा उनके बच्चों को भी मिला। राजकुमारी अमृत कौर की शुरुआती पढ़ाई इंग्लैंड में हुई। इसके बाद उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी की।

पिता के जरिये स्वतंत्रता आंदोलन में रखा कदम

1916 में राजकुमारी अमृत कौर इंग्लैंड से वापस भारत आ गईं और देश के स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनने में दिलचस्पी दिखाई। अमृत कौर के पिता हरनाम सिंह की भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं से अच्छी जान-पहचान थी। इसी दौरान 1919 में उनकी मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। वो उनके विचारों से बहुत प्रभावित हुईं। उसी साल अमृत कौर कांग्रेस में शामिल हो गईं और समाज सुधार के लिए काम करने लगीं। कौर ने महात्मा गांधी की सचिव के तौर पर 16 सालों तक काम किया। उन्होंने 1927 में ऑल इंडिया वूमेन्स कॉन्फ्रेंस की सह-स्थापना की और 1930 में इसकी अध्यक्ष बन गईं। दांडी मार्च में हिस्सा लेने के लिए उन्हें अंग्रेजों ने जेल में भी डाल दिया था। 1934 में वो गांधी जी के आश्रम में रहने चली गईं।

पिता की तरह ही अंग्रेजों की करीबी बनी रहीं अमृत कौर

अमृत कौर अपने पिता की तरह ही अंग्रेजों की करीबी रहीं। ब्रिटिश सरकार की ओर से उन्हें शिक्षा को लेकर बनाए गए एडवाइजरी बोर्ड का अध्यक्ष बना दिया गया। हालांकि, 1942 में उन्होंने पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने ऑल इंडिया वूमेन्स एजुकेशन फंड एसोसिएशन की चेयरपर्सन का पद संभाला। साथ ही दिल्ली के लेडी इरविन कॉलेज में एग्जीक्यूटिव कमेटी की सदस्य भी रहीं। उन्हें 1945 और 1946 में यूएन की कई कॉन्फ्रेंस में भारत के प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर लंदन और पेरिस भेजा गया।

गांधी जी की सिफारिश पर नेहरू की कैबिनेट में की गईं शामिल

आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की कैबिनेट में राजकुमारी अमृत कौर के शामिल होने का किस्सा भी बड़ा दिलचस्प है। नेहरू की जीवनी लिखने वाले शंकर घोष के अनुसार अमृत कौर का नाम कैबिनेट में था ही नहीं। उनके नाम को कैबिनेट में महात्मा गांधी के कहने पर शामिल किया गया था। गांधी जी के कहने पर ही कौर को स्वास्थ्य मंत्री का पद मिला था।

एम्स की स्थापना के लिए लोकसभा में रखा विधेयक

एम्स की वेबसाइट के मुताबिक, भारतीय सिविल सेवक सर जोसेफ भोरे की अध्यक्षता में राष्ट्रीय स्वास्थ्य सर्वेक्षण किए जाने के बाद की गई सिफारिश पर राजकुमारी अमृत कौर ने 1956 में एम्स की स्थापना के लिए लोकसभा में एक विधेयक पेश किया था। हालांकि, यह बजट की वजह से रुक गया था। जिसके बाद कौर ने एम्स की स्थापना के लिए आर्थिक मदद के जरिये विदेशों से धन हासिल करने में अहम किरदार निभाया। 6 फरवरी 1964 को दिल्ली में उनकी मौत हो गई थी। अपने पूरे जीवन में वो एक प्रोटेस्टेंट कैथोलिक की तरह रहीं, लेकिन उनके निधन के बाद कौर का अंतिम संस्कार सिख परंपरा के तहत किया गया।

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