No Tobacco Day: तंबाकू से कैंसर के सबसे ज्यादा मरीज भारत में, हैरान कर देंगे आंकड़े
भारत में तंबाकू सेवन की समस्या बहुत जटिल है। हालांकि, भारत सरकार ने तंबाकू सेवन की रोकथाम के लिए कई कार्यक्रम चलाए हैं, फिर भी यह समस्या ज्यों की त्यों बनी हुई है।

तंबाकू का नशा बेहद खतरनाक होता है। सरकार तंबाकू का सेवन न करने के लिए जागरूक अभियान चलाती रहती है। वर्ष 1987 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के सदस्य राष्ट्रों द्वारा विश्व तंबाकू निषेध दिवस की घोषणा की गई थी। ताकि तंबाकू महामारी से होने वाली मृत्यु तथा इससे होने वाली बीमारियों पर वैश्विक ध्यान आकर्षित किया जा सके। इसके बाद से इसे मनाया जा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन प्रत्येक वर्ष तंबाकू के उपयोग को रोकने के लिये सरकारों, संगठनों और व्यक्तियों द्वारा किये गए प्रयासों और योगदान के लिये उन्हें सम्मानित करता है। पहला विश्व तंबाकू निषेध दिवस 31 में 1988 को मनाया गया था। उस वर्ष इसका ध्येय था, तंबाकू या स्वास्थ्य - स्वास्थ्य चुनें।
क्या है इस वर्ष 2023 की थीम
तंबाकू एक ऐसी चीज है जिसकी इंसान को लत लगते देर नहीं लगती। कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी होने की एक सबसे बड़ी वजह तंबाकू सेवन होती है। इसके अलावा भी ऐसी तमाम जानलेवा बीमारियां हैं, जो तंबाकू के सेवन से होती हैं। हर साल लोगों को इसके नुकसानों के बारे में जागरुक किया जाता है। इस साल की थीम की बात करें तो यह 'हमें भोजन की जरूरत होती है, तंबाकू की नहीं' है। अंग्रेजी में यह थीम We need food, not tobacco है।
भारत और दुनिया में तंबाकू का कहर
ग्लोबल एडल्ट टोबैको सर्वे इंडिया के 2016-17 के आंकड़ों पर नजर डालें तो भारत में लगभग 27 करोड़ वयस्क तंबाकू का उपयोग करते हैं। यहां तंबाकू का इस्तेमाल सिर्फ जर्दे या पान मसाले के तौर पर ही नहीं किया जाता है, बल्कि भारत में लोग सिगरेट, हुक्के और सिगार के रूप में भी इसका सेवन करते हैं। दुनिया की बात करें तो तंबाकू के सेवन से हर साल करीब साठ लाख लोगों की मौत होती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुमान के अनुसार, 20वीं शताब्दी में वैश्विक स्तर पर तंबाकू के कारण समय से पहले होने वाली मौतों की संख्या 10 करोड़ थी।
नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन ने अपनी वेबसाइट ncbi.nlm.nih.gov पर मुंबई में पुरुषों और महिलाओं में तम्बाकू के कारण होने वाली मौतों का एक अनुमान लगाया है। इसके आधार पर यह पता चला कि मुंबई जैसे बड़े शहरों में पुरुषों में लगभग 23.7 प्रतिशत और 35-69 वर्ष की महिलाओं में 5.7 प्रतिशत मौतें तम्बाकू से पैदा होने वाली बीमारियों के कारण होती हैं।
भारत में धूम्रपान का सबसे व्यापक तरीका बीड़ी पीना है जोकि कैंसर जनक होता है। भारत में फैले तपेदिक रोग यानी टीबी होने में चालीस प्रतिशत योगदान धूम्रपान का होता है। आपको बता दें कि दुनिया में मुंह के कैंसर के सबसे ज्यादा मरीज भारत में हैं। जिसमें 50 प्रतिशत से अधिक मुंह के कैंसर का कारण धूम्रपान रहित तंबाकू का उपयोग है।
भारत सरकार ने क्या कदम उठाए?
अब यह भी जानना जरूरी है कि आखिर भारत सरकार ने अबतक तंबाकू के विरुद्ध क्या कदम उठाए हैं? तो आपको बता दें कि सरकार ने सिगरेट एंड अदर टोबेको प्रोडक्ट अधिनियम (कोटपा) 2003 लागू किया था। इसके अंतर्गत सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान निषेध है। धूम्रपान करने पर 200 रुपये तक का जुर्माना हो सकता है। तंबाकू उत्पादों के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष विज्ञापन पर प्रतिबंध जारी है। साथ ही तंबाकू उत्पाद बेचने वाली दुकानों को एक बोर्ड लगाना होगा जिसमें 'तंबाकू के कारण कैंसर होता है' लिखना अनिवार्य है। ऐसा नहीं करने पर दंड का प्रावधान किया गया है।
शैक्षिक संस्थानों के 100 यार्ड के भीतर तंबाकू उत्पादों की बिक्री दंडनीय है। इसके साथ ही 18 वर्ष से कम आयु के नाबालिगों को तंबाकू उत्पादों की बिक्री से प्रतिबंधित किया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की बात करें तो भारत ने इसके साथ Framework Convention on Tobacco Control (FCTC) संधि की है। यह तंबाकू की रोकथाम के नाते पहली अंतरराष्ट्रीय संधि है। इसे 27 फरवरी 2005 को लागू किया गया था। भारत सरकार ने राष्ट्रीय तंबाकू नियंत्रण कार्यक्रम की 2007 में शुरूआत की थी। इसमें तंबाकू उत्पादों के उत्पादन और आपूर्ति को कम करना, लोगों को तंबाकू के प्रति जागरूक करना शामिल है।
काला बाजारी की समस्या
भारत में तंबाकू एवं पान मसाला गुटखा का बाजार ₹40 हजार करोड़ से अधिक का है। ऐसे में गुटखा निर्माता कंपनियां बाजार पर पकड़ बनाए रखने के लिए कई तरीके अपनाती हैं। यदि गुटखे पर प्रतिबंध लगा भी दिया जाता है तो इसकी काला बाजारी बढ़ जाती है जिससे गुटखा निर्माता कंपनियों के लाभ कम होने की बजाय और अधिक बढ़ जाते हैं। भारत की जनता को गुटखा निर्माता कंपनियों ने आकर्षक विज्ञापनों द्वारा भी मनोवैज्ञानिक रूप से गुलाम बना रखा है।
विज्ञापनों के माध्यम से प्रचार
'दाने दाने में केसर का स्वाद' और 'कुछ कर ऐसा दुनिया बनना चाहे तेरे जैसा' ऐसे कई डॉयलोग आपने टीवी पर अभिनेताओं को बोलते हुए सुना होगा। जबकि तंबाकू के प्रचार पर बैन है, तो वे ऐसा कैसे कर सकते हैं, यह समझना बेहद जरूरी है। दरअसल, साल 2003 में सीओटीपीए एक्ट के बाद गुटखे के विज्ञापनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। इस पर गुटखा निर्माता कंपनियों ने अधिनियम की ही कुछ बातों का लाभ लेते हुए गुटखे के विज्ञापन को इलायची अथवा पान मसाला के नाम के साथ प्रोमोट करना शुरू कर दिया।
वास्तव में, इन विज्ञापनों के माध्यम से कम्पनियां अपने मुख्य प्रोडक्ट यानी तम्बाकू का ही प्रचार करने का प्रयास करती हैं। इसके लिए वे भारी-भरकम फीस पर लोगों के चहेते अभिनेताओं को विज्ञापनों में शामिल करती है। ऐसे विज्ञापनों में काम करने वालों में अजय देवगन (विमल पान मसाला), अक्षय कुमार (विमल पान मसाला) टाइगर श्राफ (पान बहार), महेश बाबू (पान बहार), शाहरुख खान (विमल पान मसाला), मनोज वाजपेयी (पान विलास), सनी देओल (संतूर पान मसाला), अमिताभ बच्चन (कमला पसंद), रणवीर सिंह (कमला पसंद), सुनील गावस्कर (कमला पसंद) वीरेंद्र सहवाग (कमला पसंद), कपिल देव (कमला पसंद) और क्रिस गेल (कमला पसंद) शामिल हैं।
सरोगेट विज्ञापन की आड़ में प्रचार
आपकी जानकारी के लिए बता दें कि सरोगेट विज्ञापन का मतलब ऐसे विज्ञापनों से होता है जिसकी आड़ में प्रतिबंधित प्रोडक्ट का प्रचार किया जाता है। जैसे इलायची अथवा पान मसाला की आड़ में तंबाकू के ब्रांड्स को प्रमोट करना। इस बात का खुलासा स्वास्थ्य संगठन वाइटल स्ट्रैटेजिज ने अपनी ताजा रिपोर्ट हिडन इन प्लेन साइट में किया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में तंबाकू के विज्ञापन के प्रचार और स्पॉन्सरशिप पर प्रबंध वाली कड़ी नीतियां हैं। पर फिर भी मीडिया चैनल अप्रत्यक्ष रूप से तंबाकू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरोगेट मार्केटिंग का उपयोग करते हैं। सरोगेट मार्केटिंग का तीन चौथाई यानी लगभग 75 प्रतिशत विज्ञापन मेटा प्लेटफार्म जिसमें फेसबुक और इंस्टाग्राम शामिल हैं, पर देखा जाता हैं। वहीं सभी सरोगेट मार्केटिंग में माउथ फ्रेशनर और पान मसाला उत्पादों को ठीक उसी विजुअल ब्रांड के साथ दिखाया गया, जो स्मोकलेस तंबाकू उत्पादों में होता है।
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