My Voice: जयाललिता के घर पाया गया धन क्या पड़ोसी का था?

[My Voice] बिहार के अंशु मिश्रा, देश की कानून व्यवस्था के ऊपर सवाल उठा रहे हैं। अपनी बात रखते हुए उन्होंने पूछा है कि न्यायपालिका जब फैसला करती है, तब सबूतों को क्यों भूल जाती है।

माई व्यॉयस में अंशु मिन कहते हैं- जब से समझ आयी है तब से यह सूनता हा रहा हूं कि कानून के हाथ बहुत लम्बे होते हैं। कोई भी गुनहगार इससे बच नहीं सकता। पर बीते कुछ वर्षों में जिस तरह कानून यानि न्यायपालिका औऱ इसकी रखवाली करने वाले चन्द बड़े ठीकेदारों के बीच आंख मिचौली का खेल शुरू हुआ है, तब से मैं एक आम आदमी कंफ्यूज हो गया हूं।

हाल ही में न्यायपालिका ने जो फैसले दिये वे फैसले शायद कुछ रसूखदार लोगों के लिए खुशी लेकर आये हों पर मेरे हिसाब से लोगों की कानून तोड़ने की हिम्मत लगातार बढ़ रही है। मेरा यह कहना नहीं है की फैसला गलत है, न ही मैं फैसले के विरुद्ध कोई टिप्पणी करना चाहता हूं, पर क्या आज सलमान खान और जयललिता और फिर रामलिंगा राजू वाकई में निर्दोष हैं?

क्या कानून इनको दोषी नहीं मानता? यह ठीक है की अब सजा हो भी जाय तो किसी को फर्क नहीं पड़ता पर क्या न्याय के रक्षक आम लोगों के साथ यही न्याय करेंगे, जिसके घर के एक सदस्य की मौत हो गई।

क्या न्यायपालिका उन सभी जीजों को भूल गई, जो जयललिता के घर से बरामद हुई थीं। क्या वो सैंडल, वो साड़‍ियां, वो हीरों के सेट, नकद कैश, जयाललिता के पड़ोसियों का था। क्या रामलिंगा राजू ने आम लोगों के पैसे के साथ गलत नहीं किया?

शायद आज हमारे देश के आम लोगों को मान लेना चाहिए की न्याय उन्हें ही मिल सकता जो पैसा लगाना जानते हैं। जो लोग बिना पैसे के या खाली जेब के साथ न्याय की आस लगाये बैठे हैं, उन्हें शायद ही पूरा न्याय मिल सकेगा। देश के न्यायालयों में सालों से मामले लटके पड़े हैं, कि गुहार लगाने वाले की केस का फैसला आते-आते जिंदगी निकल जाती है।

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