मनमोहन बनाम मोदी सरकार: नक्सली आतंक पर कितना नियंत्रण?
Naxal Samasya: छत्तीसगढ़ के कांकेर जिले में सुरक्षाकर्मियों के साथ मुठभेड़ में कम से कम 29 नक्सली मारे गए हैं। कुछ सुरक्षाकर्मी भी घायल हुएऔर बड़ी मात्रा में हथियार भी बरामद किए गए हैं। नक्सलवाद देश के लिए बड़ी चुनौती रहा है। कुछ साल पहले तक नक्सली हमलों की खबरें अक्सर आती रहती थीं। यद्यपि अब इसमें काफी हद तक कमी आई है, लेकिन नक्सली अब भी कई क्षेत्रों में सक्रिय हैं।
हाल ही में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार नक्सली हमलों या मुठभेड़ों में मनमोहन सिंह सरकार के 2004-14 के दस सालों के दरम्यान सुरक्षा बलों के जवानों की 1,750 मौतें हुई थीं, लेकिन मोदी सरकार के 2014-24 के 10 साल में इसमें 72 प्रतिशत कमी आई है और इस बीच सुरक्षा बलों के केवल 485 जवानों की जान गई। इसी अवधि में नागरिकों की मौत की संख्या भी 68 प्रतिशत घटकर 4,285 से 1,383 हो गई।

जीरो टॉलरेंस की नीति कितनी कारगर
मोदी सरकार का दावा है कि 2014 में जब वह सत्ता में आई थी तभी से ही हिंसक आंदोलन और उग्रवाद के खिलाफ जोरदार अभियान छेड़ दिया गया। सीमापार आतंकवाद का हो या फिर नक्सली वामपंथी उग्रवाद किसी भी तरह की रियायत नहीं दी गई है। 2015 में ही मोदी सरकार ने आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ 'राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना' शुरू की थी। जिसमें हिंसा के प्रति 'जीरो टॉलरेंस' की बात कही गई थी।
सरकार ने उसी समय से किसी भी तरह की हिंसा से निपटने के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों का आधुनिकीकरण करना शुरू कर दिया। प्रशिक्षण के लिए विशेष तौर पर फंड जारी किए गये। इसके साथ ही सरकार ने हिंसा प्रभावित राज्यों की सहायता के लिए विशेष बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की योजना पर काम शुरू किया।
सुरक्षा जरूरतों में आने वाले खर्चों के लिए अलग से धनराशि जारी की। इतना ही नहीं इस पूरे काम की निगरानी करने के लिए सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में अमित शाह के नेतृत्व में गृह मंत्रालय में एक अलग डिवीजन बना दिया है। इसे वामपंथी उग्रवाद प्रभाग का नाम दिया गया।
पुलिस और अर्धसैन्य बल की तैयारी
वामपंथी उग्रवादियों का मुकाबला करने और राज्य पुलिस बलों की क्षमता को बढ़ाने के लिए राज्यों में इंडिया रिजर्व बटालियन का भी गठन किया गया। लगातार ऑपरेशन से माओवादियों और नक्सलियों के पांव उखड़ गए हैं। हिंसा और अपराधों के आंकड़ों में लगातार कमी आ रही है। वर्ष 2014 से 2023 के बीच में वामपंथी उग्रवाद से संबंधित हिंसा में 52 फीसदी से अधिक की कमी आई है। इसी तरह कुल मौतों में भी 69 फीसदी की कमी आई है। सुरक्षा बलों के हताहतों की संख्या इस समय काफी कम है। यह एक बड़ी उपलब्धि रही है।
गैर बीजेपी राज्यों का भी सहयोग
नक्सली हिंसा पर नियंत्रण केवल बंदूक के बल पर नहीं हुआ है। बल्कि एक बहु-आयामी रणनीति के कारण ऐसा हुआ है और इसमें मोदी सरकार के अलावा गैर बीजेपी शासित राज्यों का भी उतना ही योगदान है। झारखंड, उड़ीसा, आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु की सरकारों ने भी माओवादी ताकतों की जड़ें हिलाने में बड़ी भूमिका निभाई है।
सुरक्षा-उपायों के साथ साथ, विकास योजनाओं का विस्तार और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की बहाली भी हिंसा कम करने में कम उपयोगी नहीं रही। हां, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने केंद्र और राज्यों के बीच एक सहयोगात्मक दृष्टिकोण का मार्ग प्रशस्त किया, जिसके कारण पिछले दस वर्षों में इसके सुखद परिणाम दिखे हैं।
आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरा बना माओवादी विद्रोह 1960 के दशक में शुरू हुआ और इसने कई पीढ़ियों को नष्ट कर दिया। लेकिन अब यह सुस्त पड़ता दिखाई दे रहा है। यह तो नहीं कहा जा सकता कि यह पूरी तरह से खत्म होने की कगार पर है, पर पिछले कुछ सालों से उग्रवादी गुटों के कई सदस्य सरकार के सामने आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्य धारा में शामिल होने के लिए आगे आ रहे हैं। जो अब भी हिंसा के रास्ते को छोड़ने के लिए तैयार नहीं हैं, उनके खिलाफ सुरक्षा बल लगातार ऑपरेशन चला रहे हैं। बस्तर में भी अभी 30 नक्सलियों को मार गिराया गया है।
नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में केंद्र की योजनाएं
हालांकि मोदी की सरकार ने वामपंथी उग्रवादियों को हिंसा छोड़ने और बातचीत के लिए आगे आने का अपनी ओर से प्रस्ताव दिया है। उनके लिए केंद्र ने कई विकास परियोजनाएं शुरू की हैं, जिनमें वामपंथी उग्रवाद से ग्रस्त क्षेत्रों में 17,600 किमी सड़कों को मंजूरी देना शामिल है। केंद्र ने राज्यों को नियमित निगरानी के लिए हेलीकॉप्टर और मानव रहित हवाई वाहन (यूएवी) भी उपलब्ध कराया है।
नक्सल हिंसा से प्रभावित राज्यों के अनुरोध पर सीएपीएफ बटालियनों को भी तैनात किया गया है। सुरक्षा इंफ्रास्ट्रक्चर को बढ़ाने के लिए स्पेशल फंड्स दिए गए हैं। इस मद में करीब 971 करोड़ रुपये की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। इन परियोजनाओं में 250 किलेबंद पुलिस स्टेशन स्थापित करने का भी काम है।
केंद्र सरकार ने आतंकवाद विरोधी बल बनाने के लिए 'पुलिस टेक्नोलॉजी मिशन' की स्थापना की है। आम तौर पर वामपंथ उग्रवाद के शिकार सबसे ज्यादा पिछड़े जनजातीय समुदाय के लोग ही होते हैं। हिंसा में मारे गये अधिकतर आदिवासी रहे हैं। नक्सली उन्हें बेरहमी से प्रताड़ित करते हैं। पुलिस मुखबिर होने के संदेह में उनकी हत्या भी कर देते है।
अब यह बात भी उजागर हो गई है कि वामपंथी उग्रवादी आदिवासियों को आर्थिक सहायता देने के नाम पर अपने राष्ट्रविरोधी और जनविरोधी कार्यों का मोहरा बनाकर शोषण करते रहे हैं। ऐसे पीड़ित परिवारों की मदद के लिए भी योजनाएं बनाई गई हैं।
वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित क्षेत्रों के लिए सड़क आवश्यकता योजना को मोदी सरकार ने आठ राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तर प्रदेश के 34 जिलों में लागू किया है। इस योजना में 5,362 किमी सड़कों का निर्माण किया गया है।
नक्सलवाद से प्रभावित क्षेत्रों में मोबाइल कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए, मोदी सरकार ने अगस्त 2014 में ही इन क्षेत्रों में मोबाइल टावरों की स्थापना को मंजूरी दे दी थी। अब तक 4885 मोबाइल टावर स्थापित किए गए है। दूसरे चरण में 2,542 मोबाइल टावर लगाए जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार ने वामपंथी उग्रवाद के पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे को 2017 में ₹5 लाख से बढ़ाकर ₹20 लाख कर दिया है, और अब इसे और बढ़ाकर ₹40 लाख कर दिया गया है।
वामपंथी उग्रवाद की फंडिंग पर प्रहार करने के लिए राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) राज्यों की सुरक्षा एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं। मोदी सरकार का मानना है कि व्यापक दृष्टिकोण के साथ विकास और सुरक्षा पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करके वामपंथी उग्रवाद की समस्या का सफलतापूर्वक समाधान किया जा सकता है।












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