Man vs Elephant: केरल में ‘हाथी बनाम आदमी’ संघर्ष की बढ़ती घटनाएं
Man vs Elephant: 10 फरवरी को केरल के वायनाड जिले के मननथावाडी में एक जंगली हाथी ने 42 वर्षीय किसान अजीश जोसेफ को कुचल कर मार दिया। जिले में तीन माह के भीतर इस तरह की यह दूसरी मौत थी।
स्थानीय लोगों ने शहर में विरोध प्रदर्शन किया और जब तक जोसेफ के परिवार के लिए सरकार ने 10 लाख रुपये और उनकी विधवा के लिए नौकरी की घोषणा नहीं कर दी, मामला शांत नहीं हुआ। चूंकि हाथी कर्नाटक के जंगल से आया था तो कर्नाटक सरकार ने भी 15 लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा की।

राजनेताओं और धार्मिक नेताओं का हस्तक्षेप
कुछ दिन पहले इको-पर्यटन परियोजना के 50 वर्षीय कर्मचारी पक्कम वेल्लाचलिल पॉल को भी एक जंगली हाथी ने मार डाला था। जंगली जानवरों के हमलों से नागरिकों की रक्षा करने में विफल रहने के लिए लोग अब अधिकारियों को ही दोषी ठहरा रहे है और इसमें स्थानीय राजनेताओं और धार्मिक नेताओं का भी हस्तक्षेप बढ़ गया है।
केरल सरकार ने एक सर्वदलीय बैठक की और ऐसे हमलों से प्रभावित लोगों के चिकित्सा खर्च को वहन करने के लिए वादा भी कर दिया। वन विभाग ने कहा है कि जोसेफ पर हमला करने वाले हाथी को मार डालने के आदेश जारी कर दिए गए है।
हाथी के हमले में पॉल की मौत के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों ने हड़ताल कर दी थी और वन विभाग के वाहनों पर हमले भी किए थे। राज्य के वन मंत्री एके ससीन्द्रन मानते हैं कि मानव-पशु संघर्ष केरल के लिए एक बड़ा मुद्दा है। केरल के पास भारत के भूमि क्षेत्र का केवल 1.2 प्रतिशत हिस्सा है, जबकि इसका वन क्षेत्र भारत के कुल वन क्षेत्र का 2.3 प्रतिशत हिस्सा है।
जानवरों और स्थानीय लोगों का आमना सामना
केरल के वन्य अधिकारियों का यह भी कहना है कि अधिक जनसंख्या घनत्व के कारण आश्रित समुदायों के वन संसाधनों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। इसलिए अक्सर जानवरों और स्थानीय लोगों का आमना सामना होता रहता है, जबकि स्थानीय लोगों का कहना है कि हाथी के प्राकृतिक आवासों के सिकुड़ने के लिए सरकारी नीतियां दोषी हैं।
वन क्षेत्रों से दशकों से बांस की कटाई जारी है। बांस हाथी के भोजन का सबसे प्रमुख स्रोत है। यदि उनके भोजन के स्रोत को नष्ट कर दिया जाएगा तो जंगली जानवरों की मानव बस्तियों में आवाजाही बढ़ेगी ही। बहुमूल्य हरे-भरे स्थान, विशाल दलदल और आर्द्रभूमि ख़त्म होने से हाथी जैसे जंगली जानवर खेतों और आवासीय क्षेत्रों की ओर आने के लिए विवश हो रहे हैं। परिणामस्वरूप हाथियों के हमले भी बढ़ रहे हैं। अधिकारी जानवर को ट्रैक करने और उसे वापस जंगल में ले जाने में भी लापरवाही बरत रहे हैं।
हाथी बनाम मनुष्य के संघर्ष की यह त्रासदी बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। सबको याद रखना चाहिए कि मलप्पुरम में गत वर्ष गर्भवती हथिनी की किस तरह निर्मम हत्या कर दी गई थी। हाथी को जानबूझकर पटाखों से भरे फल खिलाए गए थे। फिर कहा गया कि किसान अनानास बम को जंगली सूअरों के लिए बनाते थे और हाथी उसे खा जाते थे।
ऐसी कई और घटनाएं सामने आईं, जब नागरिकों ने जानवरों की हत्या कर दी। हमारी परंपराओं में हाथियों का महत्वपूर्ण स्थान है। कई पौराणिक कथाओं में हाथी देव स्वरूप माने गए हैं। समुद्र मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में सफेद हाथी ऐरावत भी है। भारत के लगभग हर प्राचीन मंदिर में हाथियों की पत्थर की नक्काशी है। हाथी हमारे त्योहारों का भी एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।
1982 में नई दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों में हाथी (अप्पू) को शुभंकर बनाया गया था। कई फिल्मों और टेलीविजन कार्यक्रमों में भी हाथी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए दिखाया गया है। फिर हाथी और मनुष्य के बीच संघर्ष क्यों बढ़ रहा है?
एशियाई हाथी लुप्तप्राय जानवर के रूप में सूचीबद्ध
1986 से ही भारत में एशियाई हाथियों को अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) की लाल सूची में लुप्तप्राय जानवर के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। 2017 की जनगणना के अनुसार, भारत में जंगली हाथियों की आबादी केवल 27,312 है, जबकि केरल में यह 3054 है।
लगातार वन्यजीव के आश्रयों का विनाश और वनों की कटाई से हाथियों की जनसंख्या सीमित रह गई है। मानवीय हस्तक्षेप के कारण हाथियों के पारंपरिक प्रवासी मार्गों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है जिसके कारण हाथी उग्र हो रहे हैं और उनके हमलों से मानव मौतों की घटनाएं बढ़ रही हैं।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 के तहत अपराधियों को बहुत कठोर दंड का प्रावधान नहीं है। अपराधी के लिए अधिकतम 3 वर्ष की कैद या 1000 रुपये का जुर्माना है, या दोनों। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 को मजबूत करने की आवश्यकता है।
यह समझने की जरूरत है कि मानव अस्तित्व जंगल और वन्य जीवन के अस्तित्व से ही जुड़ा हुआ है। इसलिए जंगल और जानवरों के प्रति अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है। देश में जानवरों के प्रति क्रूरता के खिलाफ जब तक कठोर कार्रवाई नहीं होती तब तक लोग जिम्मेदार नहीं होंगे और जंगल और जानवरों को बचाने का महत्त्व नहीं समझेंगे।
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