Lok Sabha Election: चुनाव खर्च में भारत अब अमेरिका से भी आगे

Lok Sabha Election: देश में नई लोकसभा चुनने के लिए चुनाव अभियान शुरू हो चुका है। अपने अपने उम्मीदवारों की जीत के लिए सभी दल एड़ी-चोटी का जोर लगाएंगे।

मतदाताओं को लुभाने के लिए दावे और वायदे के साथ और भी बहुत सारे प्रलोभन देते हुए अक्सर देखा जाता है। जाहिर है इसमें धन का भी जमकर उपयोग होता है। आखिर कितना खर्च होता है चुनाव में? क्या भारत दुनिया में सबसे महंगे चुनाव वाला देश बन गया है, इसकी पड़ताल करते हैं।

Lok Sabha Election 2024

अमेरिका और भारत दोनों में प्रतिस्पर्धा

इस समय दुनिया के दो देशों के बीच चुनाव खर्च को लेकर प्रतिस्पर्धा हो रही है। एक तो भारत और दूसरा अमेरिका। खर्च करने में कौन कितना आगे है, यह कहना मुश्किल है। ओपन सीक्रेट्स वेबसाईट के अनुसार, 2020 में अमेरिका के संघीय चुनाव में लगभग 14.4 बिलियन डॉलर खर्च किये गए थे। जो कि पिछले अमेरिकी संघीय चुनाव के खर्च से दुगुना था।

इसमें राष्ट्रपति पद की दौड़ के लिए $5.7 बिलियन डॉलर और कांग्रेस की सीटों के लिए $8.7 बिलियन डॉलर खर्च हुए थे। इसके अलावा राज्य स्तर पर उम्मीदवारों और मतपत्र उपायों के लिए अलग से $2.5 बिलियन डॉलर खर्च किए गए। डेमोक्रेट्स ने रिपब्लिकन से अधिक खर्च किया। 2020 में, ट्रम्प और बिडेन दो मुख्य प्रतिद्वंद्वी थे।

अब नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज की रिपोर्ट देखिए। एजेंसी का दावा है कि भारत के राजनीतिक दल और उम्मीदवार 2024 के चुनाव में लगभग 14.4 बिलियन डॉलर से अधिक खर्च करने के लिए तैयार हैं। यानी भारतीय चुनाव में अमेरिका से भी ज्यादा खर्च होने का अनुमान है। भारत के आम चुनावों में रिकॉर्ड मात्रा में चुनावी खर्च केवल कागजों में उपयोग होने वाले खर्च ही शामिल नहीं होते, बल्कि इसमे भारी मात्रा में जनता को रिश्वत बांटने और अन्य गैर कानूनी कार्यों में भी हुए खर्च शामिल है। बेहिसाब नकदी का भी प्रयोग होता है भारतीय चुनाव में।

सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज का तो यह भी कहना है कि 2024 के भारत के चुनावों में 2019 में चुनावों की तुलना में दोगुना से अधिक खर्च होगा। हालांकि भारत के चुनाव आयोग ने उम्मीदवारों के लिए आधिकारिक खर्च की सीमा 70 लाख रुपये से 95 लाख रुपये निर्धारित की है, जबकि एक लोकसभा सीट के लिए 30 करोड़ रुपये तक और एक विधानसभा सीट के लिए 10 करोड़ रुपये तक उम्मीदवारों द्वारा खर्च किए जाने का अनुमान लगाया जाता है।

लोकसभा चुनाव कराने के लिए अनुमानित कुल खर्च का लगभग 10 प्रतिशत केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता है। शेष राशि राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों द्वारा खर्च की जाती है, और उनके कानूनी और लेखा व्यय भी जमा करना अनिवार्य होता है। लेकिन पार्टियां और उम्मीदवार वास्तविक खर्च राशि का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही दर्शाते हैं।

स्पष्ट है कि उम्मीदवारों के खर्च पर चुनाव आयोग की सीमा प्रभावी नहीं है और कानूनों को ठीक से लागू नहीं किया जाता है। काले धन का उपयोग बड़े पैमाने पर होता है। आधिकारिक आकड़ों के अनुसार 2019 के आम चुनाव में भाजपा ने लगभग 11.4 अरब रुपये खर्च किए, जो कि कांग्रेस द्वारा खर्च की गई राशि से दोगुना था।

ब्रिटेन और फ़्रांस बेहतरीन उदाहरण

दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहां आज भी चुनाव खर्च काफी कम है और वे अनुसरण करने योग्य हैं। इनमें सबसे ऊपर नाम आता है यूनाइटेड किंगडम का। 2019 के संसदीय चुनावों में प्रचार अभियान के लिए केवल एक महीने का समय का निर्धारण किया गया। इस चुनाव में प्रधानमंत्री के रूप में बोरिस जॉनसन का चुनाव हुआ और खर्च पर कड़ी सीमाओं का पालन भी किया गया।

इसके उलट अमेरिका में चुनाव प्रचार अक्सर चुनाव से एक वर्ष पहले ही शुरू हो जाता है और खर्च पर कोई सीमा नहीं होती। ब्रिटेन के चुनाव आयोग के अनुसार उम्मीदवारों, राजनीतिक दलों और अन्य राजनीतिक समूहों ने 2019 के चुनाव में केवल £56 मिलियन पाउन्ड खर्च किए।

2018 में एक सर्वेक्षण में पाया गया कि ब्रिटेन में सांसद बनने के लिए नेता औसतन £10 हजार पाउन्ड से अधिक का खर्च करते थे। टोरीज़ ने औसतन £18 हजार पाउन्ड और लेबर ने £19 हजार पाउन्ड से अधिक खर्च किए। अभियान की वास्तविक लागत यूके के कानून द्वारा नियंत्रित होती है। पंजीकरण करने के लिए £500 पाउन्ड का भुगतान करना होता है। अगर अमेरिका से इस खर्च की तुलना करें तो 2020 अमेरिकी सीनेट के चुनाव में जॉर्जिया की सीट पर 500 मिलियन डॉलर से भी ज्यादा खर्च कर दिए गए थे।

फ्रांस भी उन देशों में शामिल है जहां चुनाव खर्च पर सख्ती का कड़ाई से पालन किया जाता है। फ्रांसीसी सरकार के अनुसार 2022 में फ्रांस के राष्ट्रपति चुनावों के दौरान सभी 12 उम्मीदवारों ने संयुक्त रूप से 83 मिलियन यूरो या लगभग 88 मिलियन डॉलर खर्च किए। इनमें से राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने सबसे अधिक 16.7 मिलियन यूरो खर्च किए।

कहां से कहां आ गए हम

1951 के पहले चुनाव में मात्र 10.5 करोड़ रुपये ही खर्च हुए थे। इस बीच, भारत के मतदाता 1952 में 17.32 करोड़ से पांच गुना से अधिक बढ़कर 2019 में 91.2 करोड़ और 2024 में 97 करोड़ हो गए हैं। मतदाताओं की संख्या के हिसाब से भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। उसी हिसाब से हर चुनाव के बाद मतदान कराने की लागत भी बढ़ी है।

2009 और 2014 के लोकसभा चुनावों के बीच मतदान लागत 1,114.4 करोड़ रुपये से तीन गुना बढ़कर 3,870.3 करोड़ रुपये हो गई थी। अब इस बार के लिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने केन्द्रीय बजट से चुनाव से संबंधित व्यय के लिए अतिरिक्त 3,147.92 करोड़ रुपये और चुनाव के लिए 73.67 करोड़ रुपये रखे हैं।

इन खर्चों में मतदान कर्मियों और सशस्त्र सुरक्षा कर्मियों की तैनाती, मतदान केंद्रों की स्थापना और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की खरीद, और जागरूकता कार्यक्रम चलाने और मतदाता पहचान पत्र जारी करने के लिए चुनाव आयोग (ईसी) का प्रशासनिक व्यय शामिल है। चुनाव आयोग का भी बजट साल दर साल बढ़ता जा रहा है। 2019 के आम चुनाव से एक साल पहले 236.6 करोड़ रुपये से बढ़कर 2023-24 के बजट में 340 करोड़ रुपये हो गया है।

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