अंग्रेजों को धूल चटाने में माहिर थे नाना साहिब

हिंदी सिनेमा के मैग्नम ओपस बाजीराव मस्तानी में हमने पेशवा बाजीराव और उनके जीवन को बड़ी नजदीकी से देखा है। पर उस राज्य की कई बातों को हम नहीं जानते। आज ही के दिन नाना साहिब में खुद को पेशवा के रूप में स्थापित किया था इसलिए आज हम आपको पेशवाई के इतिहास के विषय में कुछ जरुरी बातें बताते हैं।

प्लासी युद्ध: नवाब सिराजुद्दौला से छल से जीते थे लार्ड क्लाइव

Interesting Facts about Nana Sahib in hindi

मराठा मंत्रियों को पेशवा कहते थे

मराठा साम्राज्य के प्रधानमंत्रियों को पेशवा कहते थे। राजा का सलाहकार परिषद जिसे अष्टप्रधान कहते हैं; ये उसके सबसे प्रमुख होते थे। राजा के बाद इन्हीं का स्थान आता था। 'पेशवा' फारसी शब्द है जिसका अर्थ 'अग्रणी' है। पेशवाई सत्ता के वास्तविक संस्थापन का, तथा पेशवा पद को वंशपरंपरागत रूप देने का क्रेडिट ऐतिहासिक क्रम से सातवें पेशवा, बालाजी विश्वनाथ को जाता है।

पेशवाओं का शासनकाल-

  • बालाजी विश्वनाथ पेशवा (1714-1720)
  • प्रथम बाजीराव पेशवा (1720-1740)
  • बालाजी बाजीराव पेशवा ऊर्फ नानासाहेब पेशवा (1740-1761)
  • माधवराव बल्लाल पेशवा ऊर्फ थोरले माधवराव पेशवा (1761-1772)
  • नारायणराव पेशवा (1772-1774)
  • रघुनाथराव पेशवा (अल्पकाल)
  • सवाई माधवराव पेशवा (1774-1795)
  • दूसरे बाजीराव पेशवा (1796-1818)
  • दूसरे नानासाहेब पेशवा (सिंहासन पर नहीं बैठ पाए)

वीरता की मिसाल थे नाना

नाना साहेब सन 1857 के भारतीय स्वतन्त्रता के प्रथम संग्राम के शिल्पकार थे। उनका मूल नाम 'धोंडूपंत' था। स्वतंत्रता संग्राम में नाना साहेब ने कानपुर में अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोहियों का नेतृत्व किया। नाना साहब ने सन् 1824 में वेणुग्राम निवासी माधवनारायण राव के घर जन्म लिया था। इनके पिता पेशवा बाजीराव द्वितीय के सगोत्र भाई थे। पेशवा ने बालक नानाराव को अपना दत्तक पुत्र स्वीकार किया और उनकी शिक्षा दीक्षा का प्रबंध किया। उन्हें हाथी घोड़े की सवारी, तलवार व बंदूक चलाने की विधि सिखाई गई और कई भाषाओं का अच्छा ज्ञान भी कराया गया।

1857 गदर के हीरो थे

1857 में जब मेरठ में क्रांति का श्रीगणेश हुआ तो नाना साहब ने बड़ी वीरता और दक्षता से क्रांति की सेनाओं का कभी गुप्त रूप से और कभी प्रकट रूप से नेतृत्व किया। क्रांति प्रारंभ होते ही उनके अनुयायियों ने अंग्रेजी खजाने से साढ़े आठ लाख रुपया और कुछ युद्धसामग्री प्राप्त की। कानपुर के अंग्रेज एक गढ़ में कैद हो गए और क्रांतिकारियों ने वहाँ पर भारतीय ध्वजा फहराई।

कानपुर में अंग्रेजों को धूल चटाई

1 जुलाई 1857 को जब कानपुर से अंग्रेजों ने प्रस्थान किया तो नाना साहब ने पूर्ण् स्वतंत्रता की घोषणा की तथा पेशवा की उपाधि भी धारण की। नाना साहब का अदम्य साहस कभी भी कम नहीं हुआ और उन्होंने क्रांतिकारी सेनाओं का बराबर नेतृत्व किया। फतेहपुर आदि के स्थानों में नाना के दल से और अंग्रेजों में भीषण युद्ध हुए। कभी क्रांतिकारी जीते तो कभी अंग्रेज। तथापि अंग्रेज बढ़ते आ रहे थे। इसके अनंतर नाना साहब ने अंग्रेजों सेनाओं को बढ़ते देख नाना साहब ने गंगा नदी पार की और लखनऊ को प्रस्थान किया।

भारतीय इतिहास की किताब में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है इनका नाम

अंग्रेज सरकार ने नाना साहब को पकड़वाने के निमित्त बड़े बड़े इनाम घोषित किए किंतु वे निष्फल रहे। सचमुच नाना साहब का त्याग एवं स्वातंत्र्य, उनकी वीरता और सैनिक योग्यता उन्हें भारतीय इतिहास के एक प्रमुख व्यक्ति के आसन पर बिठा देती है।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+