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UHNI Donors: भारतीय धनाढ्य दान देने में हैं बड़े कंजूस

UHNI Donors: 'बड़ा भया तो क्या भया, जैसे पेड़ खजूर। पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर।' इन पंक्तियों में कबीर दास ने बताया है कि खजूर का पेड़ बहुत बड़ा और उंचा होता है, लेकिन वह किसी राहगीर को छाया नहीं दे पाता और उसके फल भी बहुत ऊँचाई पर लगते हैं। यही बात उन लोगों पर भी लागू होती है, जो धन और प्रभाव तो बहुत रखते हैं पर वे किसी के काम नहीं आते। अगर आप बहुत धनवान हैं या समृद्ध परिवार से हैं, लेकिन किसी कमजोर का भला नहीं कर पा रहे या किसी जरूरतमंद के काम नहीं आ रहे तो ऐसे अमीर होने का कोई फायदा नहीं है।

एक अंतरराष्ट्रीय सर्वे रिपोर्ट में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया है कि भारतीय धनाढ्य दान देने में या परोपकार के मामले में बड़े कंजूस हैं। बेन एंड कंपनी और दासरा की 'इंडियन फिलैंथ्रोपी रिपोर्ट 2023' के अनुसार अमेरिका, ब्रिटेन और चीन की तुलना में तमाम आर्थिक वर्गों के भारतीय यूएचएनआई (अल्ट्रा-हाई नेट वर्थ इंडिविजुअल) काफी कम दान करते हैं।

Indian Philanthropy Report 2023 Indian rich UHNI very little donation

वित्तीय वर्ष 2022-23 में देश के यूएचएनआई यानी सबसे ज्यादा नेटवर्थ वाले लोगों की कमाई और परोपकार के लिए दान में काफी बड़ा फासला है। देश के इन धनकुबेरों ने बीते वित्तीय साल में अपनी दौलत में तो 9.2 फीसदी का इजाफा किया, मगर उसके मुकाबले परोपकार के मामले में उनका योगदान महज 5 फीसदी की संकीर्णता पर अटका रहा। इसके अलावा 50,000 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति वाले टॉप के यूएचएनआई ने तो इस दौरान अपनी नेटवर्थ में 19 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की।

देश में धनकुबेर बढ़े, मगर दानदाताओं की ओर से घटा योगदान

देश में मिलेनियर्स या करोड़पतियों की संख्या में बीते एक दशक में 300 फीसदी से अधिक की उछाल आई है। 10 लाख डॉलर के बराबर की परिसम्पति होने के बाद देश में करोड़पति का दर्जा दिया जाता है। आंकड़ों के मुताबिक साल 2014 में देश में ऐसे ढाई लाख करोड़पति थे। 2022 में इनकी गिनती 7 लाख 96 हजार से ज्यादा हो गई। देश में सामुदायिक क्षेत्र में आर्थिक योगदान करने वाले की गिनती या इस रूप में दी जाने वाली रकम के आंकड़े में इस तरह की उम्मीद जगाने वाली बढ़ोतरी नहीं देखी गई। ज्यादातर अमीर सिंगापुर, दुबई, ऑस्ट्रेलिया या ब्रिटेन जैसे देशों में जाकर बस रहे हैं।

कोविड-19 महामारी के दौर में कमाई और दान का अनुपात बिगड़ा

द हिंदू बिजनेसलाइन की एक रिपोर्ट के अनुसार, "देश में बीते कई वर्षों से बड़े दानदाताओं के योगदान में बढ़ोतरी मध्यम रही है। वित्त वर्ष 2020 और 2022 के बीच यानी कोविड-19 महामारी के दौरान अजीम प्रेमजी को छोड़कर शीर्ष दानदाताओं की संपत्ति के 7 प्रतिशत सीएजीआर के साथ 24 प्रतिशत बढ़ी। वहीं निफ्टी50 में उनकी तरक्की 25 प्रतिशत तक दर्ज की गई। पिछले साल कमाई और दौलत में उछाल के बावजूद दान देने में यूएचएनआई के योगदान में गिरावट आई, खासकर उनकी शुद्ध संपत्ति के एक हिस्से के रूप में यह काफी कम रहा। 'इंडियन फिलैंथ्रोपी रिपोर्ट 2023' के मुताबिक, भारतीय यूएचएनआई को इस मामले में चीन, ब्रिटेन और अमेरिका के अपने जैसे अमीरों की बराबरी करने के लिए परोपकार के लिए अपने कुल योगदान को 8 से 13 गुना तक बढ़ाना पड़ सकता है।

किन सामाजिक क्षेत्रों में पैसा देते हैं देश के सबसे बड़े दानदाता

भारत में टॉप डोनर्स या फिलांथ्रोपिस्ट्स की ओर से ज्यादातर आर्थिक योगदान कुछ खास सामाजिक क्षेत्रों में ही होता आ रहा है। देश में परंपरागत रूप से यूएचएनआई का पैसा शिक्षा की ओर अधिक जाता रहा है। अजीम प्रेमजी ने वित्त वर्ष 2020 और 2021 में शिक्षा के लिए लगभग 16,000 करोड़ रुपए दिए। वित्त वर्ष 2021 में अजीम प्रेमजी के योगदान को छोड़कर भी यूएचएनआई के योगदान का 49 प्रतिशत हिस्सा स्वास्थ्य, सेवा और शिक्षा में दिया गया।

वित्त वर्ष 2022 में भी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा का योगदान कुल दान का 58 प्रतिशत था, जबकि कला, संस्कृति, हेरिटेज, ग्रामीण विकास और आजीविका बढ़ाने जैसे क्षेत्रों में योगदान कम हो गया। बेन एंड कंपनी के मुंबई ऑफिस के एक सिनियर एनीलिस्ट जिष्णु बतब्याल का कहना है कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसे ऐतिहासिक रूप से पसंदीदा क्षेत्रों को पहले की पीढ़ी और अब की पीढ़ी, दोनों तरह के फंडर्स द्वारा मदद पहुंचाया जाना जारी है, लेकिन ये समूह अब कम प्रतिनिधित्व वाले क्षेत्रों पर फोकस बढ़ाना भी शुरू कर रहे हैं। इनमें जीवन कौशल, शिक्षक प्रशिक्षण, विशेष जरूरतों वाली शिक्षा, टीबी, आंखों की बीमारी और कैंसर देखभाल जैसे क्षेत्र भी शामिल हैं।

देश में उच्च आय और बेहद उच्च आय वर्ग में कैसे बढ़ेगी दान की भावना

भारत में पारिवारिक तौर पर परोपकारी रहे लोगों ने देश के एचएनआई और यूएचएनआई के लिए दान देने में आने वाली बाधाओं को कम करने के बारे में कई बार बातचीत के दौर में कुछ तरीके सुझाए हैं। दासरा की को-फाउंडर और पार्टनर नीरा नंदी ने कहा कि परोपकार क्षेत्र में अधिक प्रोफेशनलिज्म और माइक्रो स्किल लाने के लिए संस्थानों और प्रतिभा पर ध्यान केंद्रित करने वाले विश्वसनीय मध्यस्थों की संख्या बढ़ाए जाने की आवश्यकता है। उनका कहना है कि ऐसे मध्यस्थ प्रभावित समुदायों, गैर-लाभकारी संगठनों और फंडर्स के बीच संबंध को भी बेहतर तरीके से व्यवस्थित कर सकते हैं।

मिसाल के तौर पर इन दिनों एसीटी ग्रांट्स, ग्रो फंड, यंग इंडिया फिलैंथ्रोपिक प्लेज (वाईआईपीपी) और रीबिल्ड इंडिया फंड जैसे फंडों की स्थापना के जरिए इस दिशा में पहले ही कुछ प्रगति हो चुकी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि निजी इक्विटी फंड और नए साधनों जैसे वापसी योग्य अनुदान, मिश्रित वित्त और ब्याज छूट के तरीकों के साथ नए वित्तीय मंचों को भी इस दिशा में आगे बढ़ाया जा रहा है।

भारत में भी हैं दानवीर

हुरुन रिसर्च और एडलगिव फाउंडेशन की साल 2021 की रिपोर्ट में बताया गया था कि भारत दुनिया के सबसे अमीरों की लिस्ट में 11वें नंबर पर था, लेकिन दुनिया में सबसे ज्यादा दान देने वालों की लिस्ट में कुछ भारतीय भी अव्वल है। 100 सालों में दुनिया के सबसे बड़े दानदाताओं की लिस्ट में टाटा ग्रुप के संस्थापक जमशेदजी टाटा का नाम पहले नंबर पर था। सदी के टॉप 50 दानदाताओं में भारत की एक और शख्सियत शामिल की गई, वह अजीम हाशिम प्रेमजी हैं।

एडेलगिव हुरुन इंडिया फिलैंथ्रोपी लिस्ट 2022 के मुताबिक भारत में 2018 में सालाना 100 करोड़ रुपये से ज्यादा दान करने वाले लोगों की संख्या महज दो थी। साल 2022 में यानी चार साल में ही यह संख्या बढ़कर 15 हो गई। वहीं, देश में 50 करोड़ रुपये से ज्यादा सालाना दान करने वाले की गिनती 20 है तो 2022 की लिस्ट में 20 करोड़ रुपये से ऊपर सालाना दान करने वाले 43 धनकुबेर के नाम सामने आए। साल 2023 की यह लिस्ट अभी तक प्रकाशित नहीं की गई है।

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