Separatists in Canada: कनाडा खुद झेल चुका है अलगाववाद का दंश

Separatists in Canada: रूस के बाद दुनिया के दूसरे सबसे बड़े क्षेत्रफल वाले देश कनाडा ने भी लंबे समय तक अलग क्यूबेक की मांग वाले आंदोलन का दंश झेला है। यह कनाडा की दुखती रग है। क्योंकि कनाडा कभी बर्दाश्त नहीं कर पायेगा कि कोई उसके देश में दबा दिए गए अलगाववाद को हवा दे। फिर कनाडा भारत के लिए यह क्यों नहीं सोचता कि उसे भी अपने यहाँ किसी भारत विरोधी समूह को पनाह देकर भारत की अखंडता को चुनौती नहीं देनी चाहिए।

क्या है क्यूबेक स्वतंत्रता का आंदोलन

यह ऐतिहासिक तथ्य है कि शुरुआत में कनाडा को चार राज्यों के संघ के तौर पर बनाया गया था। क्यूबेक इसका प्रमुख हिस्सा है। कनाडा में आबादी के मामले में क्यूबेक पहले और क्षेत्रफल के मामले में दूसरे नंबर का राज्य है। क्यूबेक स्वतंत्रता आंदोलनकारियों का कहना है कि क्यूबेक ही असली कनाडा है। यह स्पष्ट रूप से बाकी कनाडा से अलग है। क्यूबेक में कनाडाई अंग्रेजी नहीं, बल्कि फ्रेंच बोलने वाले लोग 90 फीसदी से ज्यादा हैं। क्यूबेक में 94 प्रतिशत लोग फ्रेंच लिखते, पढ़ते और बोलते हैं। बाकी पूरा कनाडा अंग्रेजी लिखता, पढ़ता और बोलता है। क्यूबेक और कनाडा का विभाजन साफ तौर पर दिखता है।

India Canada news Separatists in Canada itself has suffered the brunt of separatism

साल 1980 और 1995 में दो बार क्यूबेक की आजादी के मुद्दे पर रेफरेंडम भी हो चुका है। दूसरी बार यानी साल 1995 वाले रेफरेंडम में अलगाव ना चाहने वाले 50.06 प्रतिशत के मुकाबले अलगाव चाहने वालों की संख्या 49.04 प्रतिशत थी। यानी महज एक प्रतिशत के अंतर के कारण इस रेफरेंडम में क्यूबेक की स्वतंत्रता की मांग पूरी नहीं हो सकी। हालांकि बाद के दिनों में क्यूबेक को अधिक स्वायत्तता देनी पड़ी, मगर अलग क्यूबेक देश की मांग यानि क्यूबेक की स्वतंत्रता को समर्थन देने वाले कनाडाई नेता लगातार दुनिया भर में घूम रहे हैं। यूरोपीय नेताओं से मिलकर समर्थन मांग और जुटा रहे हैं। कनाडा से अलग होकर अगर क्यूबेक स्वतंत्र देश बना तो कनाडा की आर्थिक और सामाजिक दोनों ही तरह से कमर टूट जाएगी।

कनाडा में 1957 से जारी है क्यूबेक मुक्ति आंदोलन

उत्तरी अमेरिका में स्थित दस प्रांत और तीन प्रदेशों वाले देश कनाडा में 25 जनवरी, 1957 से जारी क्यूबेक मुक्ति आंदोलन के अलावा कस्काडिया, वेस्टर्न कनाडा, अल्बर्टा और सस्केचेवान जैसे राज्य भी समय-समय पर अलग होने और स्वतंत्रता की मांग करते रहते हैं। उन सबके पास कनाडा में रहने के नुकसान और उससे अलग होने के फायदे की बड़ी लिस्ट और कई दलीलें हैं।

कनाडा इन सब राज्यों के अलगाववादियों के सशस्त्र आंदोलन को भी लंबे समय तक झेलता रहा है। खासकर मौजूदा प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के पिता पियरे ट्रूडो के दो बार के शासनकाल (1968-1984) में अलगाववाद ने कनाडा को काफी नुकसान पहुंचाया था। इन हालातों की वापसी से जस्टिन ट्रूडो को इसलिए भी परहेज करना चाहिए कि अलगाववादी आंदोलनों के चलते कनाडा में उनकी लिबरल पार्टी काफी कमजोर होती गई है। पिता सीनियर ट्रूडो के बाद पुत्र जूनियर ट्रूडो को भी अल्पमत की सरकार चलानी पड़ रही है।

ऐसे हालात में अगर कनाडा के अलगाववादियों ने फिर से सिर उठाया तो ट्रूडो का राजनीतिक भविष्य कहीं का नहीं रहेगा। पोस्ट कोविड ग्लोबल ऑर्डर में कनाडा की मौजूदा हालत वैसे भी बहुत बेहतर हालत में नहीं मानी जा रही। फिलहाल भारत और कनाडा की दोस्ती और आपसी सहयोग की साझा भावना जस्टिन ट्रूडो के लिए ताकत और बचाव दोनों है।

भारत विरोधी कई अलगाववादी संगठनों के कनाडा में ठिकाने

भारत के विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की ओर से बताया गया है कि कनाडा में आतंकवादी समूहों का समर्थन करने वाले कम से कम नौ अलगाववादी संगठनों के ठिकाने हैं। इनमें वर्ल्ड सिख ऑर्गनाइजेशन, खालिस्तान टाइगर फोर्स, सिख फॉर जस्टिस और बब्बर खालसा इंटरनेशनल जैसे खालिस्तान समर्थक कुख्यात संगठन पाकिस्तान के उकसावे पर भारत के खिलाफ कनाडा की जमीन का इस्तेमाल कर रहे हैं।

हालिया राजनयिक तनाव के बाद भारतीय अधिकारियों ने साफ कहा है कि कनाडा ने कई सालों से भारत में कई संगीन वारदातों में शामिल आतंकियों और मोस्ट वांटेड अपराधियों को वापस भेजने के अनुरोध पर कोई कार्रवाई नहीं की है। वहीं, भारत में आतंकवादी घोषित और सजायाफ्ता सरगनाओं की तस्वीर लगाने, भारत विरोधी रैली निकालने और उनमें खालिस्तानी नारेबाजी-पोस्टरबाजी को रोकने की तरफ कदम बढ़ाने के बजाय कनाडा सरकार से उनको समर्थन देने और उनका बचाव करने की खबर सामने आती रहती है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पिछले 5 साल में भारत सरकार ने कनाडा से खालिस्तानी समर्थक और आपराधिक वारदातों से जुड़े सरगनाओं के प्रत्यर्पण के लिए 26 बार अपील की, लेकिन जस्टिन ट्रूडो सरकार ने उन पर न तो कोई कार्रवाई की और न ही कोई सकारात्मक जवाब दिया। सुरक्षा एजेंसियों के सूत्रों के मुताबिक भारत में जघन्य आपराधिक वारदातों में मोस्ट वॉन्टेड 13 आतंकवादी और कुख्यात अपराधी इस वक्त कनाडा में खुलेआम घूम रहे हैं। इनमें से एक संदीप सिंह उर्फ सनी के तो कनाडा बॉर्डर सर्विसेज एजेंसी में सुपरिटेंडेंट के पद पर काम करने की पुख्ता खबर है। भारत में 30 संगीन मामले में नामजद गैंगस्टर सुक्खा को भी कनाडा सरकार ने भारत भेजने से मना कर दिया था।

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