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Delhi Lok Sabha Seats: लोक सभा चुनावों में कैसा रहा है दिल्ली की सीटों का परिणाम, जानें पूरा इतिहास

Delhi Lok Sabha Seats: भारत की आजादी के बाद दिल्ली में पहला आम चुनाव साल 1952 में हुआ था, जबकि साल 1956 में राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा मिला था। तब से अब तक हुए सभी लोक सभा चुनावों में दिल्ली की सीटों पर किन पार्टियों का पलड़ा भारी रहा है, उसके बारे में जानकारी महत्वपूर्ण है।

पहला आम चुनाव 1952

पहले आम चुनाव में दिल्ली में केवल 4 लोकसभा सीटें थीं, जिसमें नई दिल्ली और दिल्ली शहर में 1-1 सीट शामिल थी। वहीं बाहरी दिल्ली में 2 लोकसभा सीटें थीं।

Delhi Lok Sabha Seats

आज़ादी के बाद पहले चुनाव में दिल्ली की 4 लोकसभा सीटों के लिए 19 उम्मीदवारों ने नामांकन किया था, जिसमें से 11 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई। पहले चुनाव को जीतने वाले उम्मीदवारों में नई दिल्ली से सुचेता कृपलानी (किसान मजदूर प्रजा पार्टी), दिल्ली शहर से राधा रमण (कांग्रेस) और बाहरी दिल्ली से सी.के. नायर और नवल प्रभाकर (कांग्रेस) ने जीत दर्ज की थी।

बता दें कि पहले लोकसभा चुनाव में दिल्ली के कुल 6 लाख 55 हज़ार 900 मतदाताओं ने वोट डाले थे, जिसमें से 2 उम्मीदवारों को 1-1 लाख वोट हासिल हुए थे। दिल्ली के पहले आम चुनाव में चार में से एक महिला उम्मीदवार सुचेता कृपलानी को जीत मिली थी, जबकि पूरे चुनाव में करीब 57.09 फीसदी का मतदान हुआ था।

दूसरा आम चुनाव 1957

साल 1957 में दूसरी बार लोकसभा चुनाव हुए थे, जिसमें दिल्ली की चांदनी चौक, दिल्ली सदर, नई दिल्ली और बाहरी दिल्ली ये चार सीटें शामिल थीं। इन सीटों पर राधा रमण, ब्रह्म प्रकाश, सुचेता कृपलानी और नवल प्रभाकर ने जीत हासिल की थी।

तीसरा आम चुनाव 1962

तीसरे आम चुनाव में दिल्ली के पास पांच लोकसभा सीटें हो गई थीं, जिसमें 4 सीटों के अलावा करोल बाग संसदीय क्षेत्र का गठन किया गया था। उन चुनावों में चांदनी चौक से शामनाथ, दिल्ली सदर से शिव चरण गुप्ता, करोल बाग से नवल प्रभाकर, नई दिल्ली से मेहरचंद खन्ना और बाहरी दिल्ली से ब्रह्म प्रकाश विजयी हुए थे।

इस चुनाव में कुल 13 लाख 45 हज़ार 360 वोटर थे, जिनमें से 9 लाख 24 हज़ार 885 मतदाताओं ने वोट डाले थे। दिल्ली के तीसरे आम चुनाव में सभी जीते हुए उम्मीदवार कांग्रेस पार्टी से ताल्लुक रखते थे।

चौथा आम चुनाव 1967

चौथे आम चुनाव में दिल्ली के मतदाताओं की संख्या 16 लाख 84 हज़ार 714 हो गई थी। इन चुनावों में परिसीमन के कारण अब दिल्ली में पहली बार 7 संसदीय क्षेत्र अस्तित्व में आए थे। चांदनी चौक से आर. गोपाल, दिल्ली सदर से के.एल. गुप्ता, पूर्वी दिल्ली से एच. देवगन, करोल बाग से आर.एस विधार्थी, नई दिल्ली से एम.एल. सोनदी, बाहरी दिल्ली से ब्रह्म प्रकाश और दक्षिणी दिल्ली से बलराज मधोक ने जीत दर्ज की थी।

दिल्ली के चौथे आम चुनाव में कांग्रेस को केवल एक सीट मिली थी, जबकि बाकी सभी छह सीटों पर भारतीय जनसंघ (वर्तमान भारतीय जनता पार्टी) के उम्मीदवारों ने जीत हासिल करके नया रिकॉर्ड दर्ज किया था।

पांचवा आम चुनाव 1971

इन चुनावों में कांग्रेस ने वापसी करते हुए दिल्ली की सभी 7 लोकसभा सीटों पर जीत हासिल की थी। इस बार चुनावों में 13 लाख 14 हज़ार 480 वोट पड़े, जिनमें से 64 प्रतिशत वोट कांग्रेस ने हासिल किए थे। बाकि 29 प्रतिशत वोट भारतीय जनसंघ और 7 प्रतिशत अन्य पार्टी के उम्मीदवारों को मिले थे।

छठा आम चुनाव 1977

आपातकाल हटाने के बाद साल 1977 में छठी बार आम चुनाव हुए थे, जिसमें दिल्ली की सातों लोकसभा सीट पर जनता पार्टी (भारतीय लोक दल के चुनाव चिन्ह "हलधर" पर चुनाव लड़ा) का कब्जा हुआ था। इन आम चुनावों में कांग्रेस को एक भी सीट नहीं मिल पाई थी। आम चुनावों में जीतने वाले उम्मीदवारों की लिस्ट में सिकंदर बख्त, कँवर लाल गुप्ता, किशोर लाल, शिव नरेना, अटल बिहारी बाजपाई, ब्रह्म प्रकाश और विजय कुमार मल्होत्रा जैसे दिग्गजों का नाम शामिल था।

इन चुनावों में जनता पार्टी ने कुल 18 लाख 16 हज़ार वोट में से 68 प्रतिशत वोट हासिल किए थे और इसके साथ ही जनता पार्टी दिल्ली की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी।

सातवां आम चुनाव 1980

जनता पार्टी की सरकार आपसी मतभेदों के कारण पांच साल का कार्यकाल पूरा करने से पहले ही गिर गई और साल 1980 के आम चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने दिल्ली की 6 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि 1 सीट जनता पार्टी को मिली थी। उस समय मतदाताओं की संख्या 30 लाख 96 हज़ार थी, जिसमें से 19 लाख 19 हज़ार लोगों ने वोट दिया था।

1980 के आम चुनावों में जनता पार्टी (भाजपा की स्थापना से पहले) की तरफ से केवल अटल बिहारी वाजपेयी को नई दिल्ली से एक सीट मिली थी, जबकि उनके पक्ष में 1 लाख 96 हज़ार वोट डाले गए थे। वहीं बाकी 6 सीटों पर कांग्रेस ने 50 प्रतिशत वोट की बढ़त के साथ जीत हासिल की थी।

आठवां आम चुनाव 1984

इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में हुए लोकसभा चुनावों में कांग्रेस के पक्ष में जोरदार सहानुभूति लहर चली थी। उस कारण 68 फीसदी वोट के साथ कांग्रेस सभी सीटों पर विजयी रही थी। वहीं बीजेपी को मात्र 18 फीसदी वोट मिले, और पार्टी कोई भी सीट अपने नाम नही कर पाई थी।

नवां आम चुनाव 1989

इस चुनाव में कांग्रेस के विरोध में विपक्षी दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा था। दिल्ली में भी भाजपा और जनता दल में सीटों पर समझौता हुआ था। भारतीय जनता पार्टी ने 26 प्रतिशत वोट के साथ दिल्ली की 4 सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं 43 प्रतिशत वोटों के साथ कांग्रेस ने चांदनी चौक और पूर्वी दिल्ली की 2 सीटों पर जीत हासिल की थी। भाजपा के सहयोगी जनता दल को 16 प्रतिशत वोट के साथ एक सीट पर जीत मिली थी।

दसवां आम चुनाव 1991

साल 1989 में हुए आम चुनाव के 16 महीने बाद ही नौवीं लोकसभा भंग कर दी गई। देश 10वें आम चुनाव के मुहाने पर था, जो कि मध्यावधि चुनाव था। साल 1991 में दिल्ली में भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभर रही थी, जिसने दिल्ली की 5 सीट (चांदनी चौक, पूर्वी दिल्ली, करोल बाग, नई दिल्ली और दक्षिणी दिल्ली) पर जीत हासिल की थी। कांग्रेस को 2 सीट (दिल्ली सदर और बाहरी दिल्ली) पर संतुष्टि करनी पड़ी थी। दिल्ली के दसवें आम चुनाव में दोनों दलों के लिए 40 प्रतिशत वोट पड़े थे।

ग्यारहवां आम चुनाव 1996

साल 1996 के लोकसभा चुनावों से गठबंधन की राजनीति प्रारंभ हो गयी थी। इस बार कांग्रेस गठबंधन को यूपीए और बीजेपी के गठबंधन को एनडीए नाम दिया गया था। इन चुनावों में एनडीए को 5 सीट और यूपीए को 2 सीट हासिल हुई थी। इस जीत में सबसे बड़ा नाम सुषमा स्वराज का रहा था, जिन्होंने दक्षिणी दिल्ली से सीट हासिल की थी। इस साल दिल्ली में कुल 80 लाख वोटर थे, जिनमें से केवल 40 लाख 79 हज़ार लोगों ने वोट डाले थे।

इस चुनाव में सबसे महवपूर्ण सीट पूर्वी दिल्ली की थी, जहां से 122 प्रत्याशी चुनावी मैदान में उतरे थे। इनमें 117 पुरुष और 5 महिला प्रत्याशी थी।

बारहवां आम चुनाव 1998

साल 1998 के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली की 7 में से 6 सीटों पर जीत हासिल की थी, जबकि कांग्रेस ने करोल बाग सीट पर मामूली जीत दर्ज की। इन चुनावों में दिल्ली की जनता ने बीजेपी को 50 प्रतिशत वोट दिए और कांग्रेस को 42 प्रतिशत वोट मिले थे।

तेरहवां आम चुनाव 1999

अटल बिहारी वाजपेयी की 13 महीने पुरानी सरकार सदन में विश्वास मत साबित न कर पाने की वजह से गिर गई थी। इसके बाद सितंबर-अक्टूबर 1999 में 13वीं लोकसभा के लिए चुनाव हुए थे। दिल्ली में हुए इन चुनावों में बीजेपी ने क्लीन स्वीप करते हुए 51 प्रतिशत वोट के साथ सभी 7 सीटें हासिल कर ली।

चौदहवां आम चुनाव 2004

इन चुनावों में कांग्रेस ने बड़ा उलट फेर करते हुए बीजेपी से 7 में से 6 सीट छीन ली थी। बीजेपी को सिर्फ दक्षिणी दिल्ली से जीत मिली थी, और वहां से जीतने वाले उम्मीदवार का नाम विजय कुमार मल्होत्रा था।

पंद्रहवां आम चुनाव 2009

एक करोड़ मतदाताओं के साथ पहली बार दिल्ली लोकसभा चुनाव के लिए तैयार थी। इस बार लोकसभा सीटों में भी बदलाव किए गए जैसे चांदनी चौक, पूर्वी दिल्ली, नई दिल्ली, नार्थ ईस्ट दिल्ली, नार्थ वेस्ट दिल्ली, दक्षिणी दिल्ली और पश्चिमी दिल्ली। लेकिन अब भी दिल्ली में केवल 7 ही लोकसभा सीटें थी।

इन चुनावों में कुल 57 लाख 54 हज़ार वोट पड़े थे, जिनमें से 57 फीसदी वोट केवल कांग्रेस की झोली में गिरे और कांग्रेस ने सातों लोकसभा सीटों पर कब्जा जमा लिया।

सोलहवां आम चुनाव 2014

दिल्ली में कई वर्षो से कांग्रेस की सत्ता रहीं, लेकिन दिल्ली ही नहीं 2014 में देश से भी कांग्रेस का सफाया हुआ। दिल्ली में बीजेपी ने सभी 7 लोकसभा सीटों पर कब्ज़ा किया, जबकि इस साल कुल 82 लाख 71 हज़ार 586 वोट पड़े थे।

सत्रहवां आम चुनाव 2019

सत्रहवें भारतीय आम चुनाव 12 मई 2019 को हुए थे। अन्य सभी राज्यों के साथ 17वीं लोकसभा के गठन के लिए 23 मई 2019 को दिल्ली में परिणाम घोषित किए गए। इन चुनावों में चांदनी चौक से हर्ष वर्धन, उत्तर पूर्वी दिल्ली से मनोज तिवारी, पूर्वी दिल्ली से गौतम गंभीर, नई दिल्ली से मिनाक्षी लेखी, उत्तर पश्चिमी से हंसराज, पश्चिमी दिल्ली से प्रवेश वर्मा और दक्षिणी दिल्ली से रमेश बिधुड़ी ने जीत हासिल की थी। ये सभी भाजपा के उम्मीदवार थे। इस चुनाव में बीजेपी को 56.9 प्रतिशत, कांग्रेस को 22.6 प्रतिशत और आम आदमी पार्टी को 18.2 प्रतिशत वोट मिले थे।

तो ये था दिल्ली के लोकसभा चुनावों का इतिहास। अब 2024 के चुनावों की तैयारी शुरू हो गई है। देखते हैं इस बार दिल्ली के मतदाता किसे अपना वोट देते हैं।

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