Opposition Unity : लोकसभा चुनाव 2024 में भाजपा के सामने विपक्षी एकजुटता के दावें कितने मजबूत?
पीएम पद के संयुक्त उम्मीदवार को लेकर विपक्ष में अभी भी रस्साकसी चल रही है जबकि क्षेत्रीय दलों की नूरा कुश्ती से पीएम मोदी मजबूत नजर आ रहे हैं। दरअसल, विपक्ष एकता के नाम पर खुद गुटों में बंट गया है।

2019 के लोकसभा चुनावों के बाद से ही भाजपा के खिलाफ विपक्षी दलों के एकजुट होने के कयास और प्रयास हो रहे हैं। कई बार अनेक मंचों से कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने कहा है कि पीएम मोदी का मुकाबला करना है तो सबको एकजुट होना पड़ेगा। इसी उद्देश्य को लेकर कभी ममता बनर्जी तो कभी नीतीश कुमार तो कभी के. चंद्रशेखर राव और एम.के. स्टालिन ने विपक्षी दलों का नेतृत्व संभालने की कोशिश की। इसके बावजूद अभी तक कोई भी नेता सबको एकजुट नहीं कर पाया।
दूसरी ओर देश में 55 साल से अधिक शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी भी विपक्षी दलों को एक छाते के नीचे लाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन उनके प्रयास भी सफल नहीं हो रहे।
जेपीसी की मांग को लेकर विपक्ष दिखा एकजुट
मार्च 2023 में राहुल गांधी ने लंदन में एक कार्यक्रम के दौरान आरोप लगाया था कि भारतीय लोकतंत्र के ढांचे पर 'बर्बर हमला' हो रहा है। उन्होंने अफसोस जताते हुए कहा था कि अमेरिका और यूरोप समेत दुनिया के लोकतांत्रिक हिस्से इस पर ध्यान देने में असफल रहे हैं। राहुल ने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के लोकतांत्रिक ढांचे को नष्ट कर रहे हैं। लंदन में दिए इस कथित भाषण के बाद संसद में बवाल मच गया। भाजपा इस बयान के खिलाफ राहुल गांधी से माफी मांगने की मांग करती रही लेकिन कांग्रेस इस बात पर अड़ी है कि राहुल माफी नहीं मांगेंगे।
इसके जवाब में कांग्रेस ने कहा कि सबसे पहले भाजपा गौतम अडानी के मुद्दे पर जेपीसी गठन की स्वीकृति दे। इस तरह दोनों ओर से संसद में लगातार गतिरोध बना रहा। इस गतिरोध के बहाने कांग्रेस की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने अपने पक्ष में गैर भाजपा 16 दलों को साध लिया। शुरुआत में आम आदमी पार्टी कांग्रेस के नाम पर बिदकती-भड़कती रही है। लेकिन बाद में कांग्रेस के इन मुद्दों पर 'आप' भी साथ हो गयी है।
16 विरोधी दल साथ, फिर भी 13 की राह जुदा
इस दौरान विपक्षी दलों की एकता की दिशा में पहला कदम तो सफल माना गया। हालांकि, सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि केंद्र की बीजेपी सरकार से खफा 13 गैर भाजपा दल अभी भी अलग राह चल रहे हैं। वे न खुल कर भाजपा के साथ खड़े दिखते हैं और न कांग्रेस की पहल पर विपक्षी एकता अभियान का समर्थन ही करते हैं।
दरअसल, संसद में जब विपक्ष की मांग भाजपा ने खारिज कर दी तो 16 दलों के सांसदों ने विरोध मार्च निकाला। आश्चर्यजनक रूप से मार्च में आम आदमी पार्टी और समाजवादी पार्टी के सदस्य तो शामिल हुए, पर संसद के दोनों सदनों में 142 सदस्यों वाली 13 पार्टियों के सदस्यों ने खुद को इससे दूर रखा। जिन दलों ने विरोध मार्च से कोई मतलब नहीं रखा, उनमें 31 सदस्यों वाली वाईएसआर कांग्रेस के अलावा 36 सदस्यों वाली टीएमसी, 11 सदस्यों वाली बहुजन समाज पार्टी (बसपा), नवीन पटनायक की पार्टी बीजेडी, अन्नाद्रमुक, टीडीपी और केसी राव की पार्टी बीआरएस शामिल थे।
ममता बनर्जी ने सबसे पहले किए एकता के प्रयास
साल 2024 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए सभी विपक्षी दलों को एकजुट करने की दिशा में सबसे पहला प्रयास पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने किया था। दरअसल, पीएम बनने पर उनका उत्साह इसलिए परवान चढ़ा क्योंकि भाजपा की लाख कोशिशों के बावजूद बंगाल विधानसभा चुनावों में उन्हें जीत हासिल हो गयी। अपने प्रयास के क्रम में वह दिल्ली-मुंबई के दौरे पर घूमती रहीं। कभी शरद पवार तो कभी उद्धव ठाकरे से उनकी मुलाकातें-बातें होती रहीं। उन्हें हकीकत का एहसास शरद पवार और उद्धव ठाकरे ने ही यह कह कर कराया कि कांग्रेस के बिना विपक्षी एकता की कल्पना बेमानी है। तब से ममता शांत हो गयी हैं।
कांग्रेस से नाराज होकर अपनी अलग पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) बनाने वाली ममता बनर्जी ने लंबे समय तक बंगाल में चले वामपंथी शासन का अंत किया था। माना जा रहा था कि इन दोनों पार्टियों का बंगाल में अभ्युदय अब असंभव है। महज बीजेपी से ही ममता का मुकाबला है, जिसने 2 से बढ़ाकर विधानसभा में अपनी सीटें 77 कर ली हैं। इस बीच कांग्रेस-लेफ्ट साथ आ गये हैं। यानी ममता के सामने अब दो दुश्मन होंगे।
विपक्षी एकता के लिए चंद्रशेखर राव की कोशिशें भी जारी
ममता के बाद मुखर रूप से तेलंगाना के सीएम के. चंद्रशेखर राव ने पीएम मोदी के विरोध में विपक्षी मोर्चा बनाने की कोशिश की, जो अब भी जारी है। इसके लिए सबसे पहले उन्होंने बिहार का दौरा किया। महागठबंधन की सरकार बनते ही सीएम नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव से मिलने वह पटना पहुंचे थे। उन्हें जब इस बात का आभास हुआ कि नीतीश कुमार को ही महागठबंधन पीएम फेस बनाना चाहता है तो उन्होंने दूसरी कोशिश शुरू की।
अपनी पार्टी को राष्ट्रीय फलक पर लाने के लिए उन्होंने अपनी पार्टी तेलंगाना राष्ट्र समिति का नामकरण भारत राष्ट्र समिति कर दिया। बीआरएस के लांचिग समारोह में गैर भाजपा विपक्षी दलों के तीन सीएम और एक पूर्व सीएम को आमंत्रित किया। आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल, आप के ही नेता और पंजाब के सीएम भगवंत मान, केरल के सीएम पिनाराई विजयन और समाजवादी पार्टी के नेता यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव ने केसी राव के मंच की शोभा भी बढ़ाई।
एमके स्टालिन भी जुटे विपक्ष को एक करने में
डीएमके नेता और तमिलनाडु के सीएम एमके स्टालिन ने भी विपक्षी एकता की दिशा में अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। उन्होंने अपने जन्मदिन पर विपक्षी नेताओं को जुटाया। उन्होंने सामाजिक न्याय महासंघ के बैनर तले 20 विपक्षी नेताओं को न्यौता भेजा। बैठक में बिहार से आरजेडी नेता और डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव, झारखंड से जेएमएम नेता और सीएम हेमंत सोरेन, कांग्रेस नेता और राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत, समाजवादी पार्टी के नेता और यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव, जम्मू कश्मीर के पूर्व सीएम फारूक अब्दुल्ला और दोनों कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता प्रमुख रूप से शामिल हुए। बात सामाजिक न्याय पर हुई, लेकिन मकसद विपक्षी दलों को एक मंच पर लाना था। लेकिन नीतीश कुमार ने स्टालिन के दोनों आयोजनों से दूरी रखी।
पीएम पद की दौड़ में नीतीश भी
बिहार में महागठबंधन की सरकार बनते ही सबसे बड़े सहयोगी आरजेडी ने कहना शुरू किया कि नीतीश कुमार अब विपक्षी एकता के लिए देश का दौरा करेंगे। वह विपक्ष की ओर से पीएम का फेस होंगे। आरजेडी के सुर में नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने भी सुर मिलाना शुरू किया। जेडीयू के नेता यह कहते नहीं थकते कि नीतीश कुमार पीएम मैटेरियल हैं। हालांकि नीतीश अपनी ओर से हमेशा इस बात से इनकार करते रहे। अलबत्ता उन्होंने निःसंकोच यह स्वीकार किया कि वे विपक्षी एकता की मुहिम में जुटेंगे।
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे के बुलावे पर दिल्ली पहुंचे नीतीश
हाल ही में अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को फोन किया था, जिसके बाद उत्साहित नीतीश कुमार दिल्ली दौरे पर गए। बिहार के डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव पहले से ही दिल्ली में थे। ऐसे में नीतीश कुमार की उम्मीदें भी जग गई। नीतीश कुमार ने तेजस्वी यादव व आरजेडी और जेडीयू नेताओं के साथ मलिकार्जुन खड़गे से मुलाकात की। इस दौरान राहुल गांधी भी उपस्थित रहे। उन्होंने विपक्षी एकजुटता के प्रयासों को लेकर नीतीश की सराहना भी की। नीतीश कुमार तेजस्वी यादव के घर भी गए।
पूर्व में भी की थी अनेक नेताओं से मुलाकात
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इससे पहले जब दिल्ली का दौरा किया था, तब उन्होंने विपक्ष के कई नेताओं से मुलाकात की थी। उन्होंने कांग्रेस नेता राहुल गांधी, सीताराम येचुरी, अरविंद केजरीवाल, शरद पवार, अखिलेश यादव, ओम प्रकाश चैटाला और भाकपा माले के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य के अलावा जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी से मुलाकात की। इसके अलावा राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ से भी मुलाकात की।
शरद पवार का अलग स्टैंड
नेशनल कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के मुखिया और वरिष्ठ नेता शरद पवार विपक्ष की एकजुटता, भाजपा और मोदी पर कथित हमले को लेकर अपना अलग स्टैंड रखते हैं। विपक्ष द्वारा प्रधानमंत्री मोदी की डिग्री को लेकर उठाए जा रहे सवालों की पवार ने आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह कोई मुद्दा नहीं है। नेता इस पर अपना समय बर्बाद कर रहे हैं। इससे पहले भी शरद पवार ने अडानी मामले पर भी विपक्ष के स्टैंड की आलोचना की थी और जेपीसी की मांग को खारिज कर दिया था। ऐसे में शरद पवार के बयान भाजपा को राहत देने वाले साबित हो रहे हैं। दूसरी ओर विपक्षी एकजुटता के लिए भी नई समस्या खड़ी कर रहे हैं।
विपक्षी दलों में उभरे मतभेद से एनडीए की बल्ले-बल्ले
एकता के प्रयास में जुटे विपक्ष में दिख रहे मतभेद से एनडीए खुश लेकिन मौन है। 2019 से ही नरेंद्र मोदी के खिलाफ लगातार विपक्षी एकता की कोशिश हो रही है। हर बार यह प्रयोग नाकाम साबित हुआ है। विपक्ष में बिखराव बीजेपी की राह आसान ही कर रहा है। दूसरी ओर, कांग्रेस या राहुल को आगे रखने से पीएम की उम्मीद पाले दूसरे विपक्षी नेताओं को अपना नुकसान नजर आ रहा है।
2024 में भी मोदी के सामने कोई चेहरा नहीं
विपक्षी एकता तो बहाना है। विपक्षी दलों के जितने नेता एकजुटता की कवायद में लगे हैं, सबके निशाने पर पीएम की कुर्सी है। ममता बनर्जी, नीतीश कुमार और केसीआर के बाद अब एमके स्टालिन विपक्ष को गोलबंद करने का प्रयास कर रहे हैं। हाल ही में सूरत की एक अदालत ने मानहानि मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को दो साल की सजा सुना दी है।
विपक्ष के इन नेताओं को लगता है कि अब मैदान खाली है। संभव है कि विपक्षी पार्टियां इनमें किसी एक के नाम पर सहमत भी हो जाएं। लेकिन अतीत के अनुभव हैं कि विपक्षी एकता राष्ट्रीय स्तर पर हो भी जाए, तब भी इसके टिकाऊ रहने की उम्मीद बेमानी है। वर्तमान में विपक्ष की नुरा-कुश्ती को देखकर यह तय माना जा रहा है कि मोदी के समक्ष कोई भी विपक्षी एकजुटता का संयुक्त उम्मीदवार 2024 में आना भी संभव नहीं लगता।












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