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Holi Celebration: प्रहलाद की बुआ होलिका का दहन पूर्णिया में हुआ, होली मशहूर हुई मथुरा की

होली का नाम आते ही सबसे पहले मथुरा, बरसाना, वृंदावन, गोकुल, नंदगांव के नाम हमारे जेहन में आते हैं। मगर क्या आप जानते हैं कि प्रहलाद की बुआ होलिका का दहन बिहार के पूर्णिया में हुआ था।

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Holi Celebration: हिंदू मान्यताओं के अनुसार होलिका दहन बिहार के पूर्णिया जिले के धरहरा गांव में हुआ था। प्राचीन काल में इस गांव में राजा हिरण्यकश्यप का महल हुआ करता था। पुराणों के अनुसार राजा हिरण्यकश्यप के एक पुत्र था जिसका नाम प्रहलाद था। प्रहलाद को भगवान विष्णु की आराधना में अधिक रूचि थी इसलिए उनका नाम भक्त प्रहलाद पड़ा। मगर उनके पिता राजा हिरण्यकश्यप को अपने बेटे की रूचि हमेशा नागवार गुजरती थी। इसलिए उन्होंने भक्त प्रहलाद को समझाने के प्रयास किये। जब उन्होंने देखा कि उनके समझने पर भी भक्त प्रहलाद पर कोई असर नहीं हुआ तो उन्होंने उन्हें डराने के प्रयास किये। इन सब के बावजूद भी प्रहलाद की भक्ति पर कोई असर नही पड़ा।

आखिरकार, राजा हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका को बुलाया। देवी होलिका ने अपनी तपस्या से आग में न जलने वाला एक वस्त्र प्राप्त कर लिया था। होलिका वह वस्त्र ओढ़कर भक्त प्रहलाद के साथ लकड़ियों के ढेर में बैठ गयी। फिर राजा हिरण्यकश्यप के सैनिकों ने लकड़ियों में आग लगा दी। मगर अचानक वह वस्त्र होलिका की देह से उड़ गया। होलिका इस आग में भस्म हो गयी लेकिन भक्त प्रहलाद को कुछ नहीं हुआ। मान्यता है कि भक्त प्रहलाद की जान हमेशा भगवान विष्णु की कृपा से बची रही।

इसी घटना को बुराई पर अच्छाई की जीत माना जाता है। इसलिए देशभर में होलिका दहन की शुरुआत हुई। तब से आजतक पूर्णिया के धरहरा गांव के लोग होलिका दहन कर राख से होली खेलते हैं।

भगवान श्री कृष्ण के समय होली

द्वापर युग में भगवान श्री कृष्ण और होली से जुड़ी एक कथा है। एक बार बाल कृष्ण ने अपनी मां यशोदा से पूछा कि राधा का रंग गोरा क्यों है? जबकि वह सांवले है। इसपर मैया यशोदा ने उन्हें कहा कि तुम राधा के चेहरे पर रंग लगाओ और देखो कि उसका रंग कैसे बदलता है। बाल कृष्ण ने यह सलाह मान ली और अपने मित्रों के संग राधा को रंग लगाने चले गए। यहीं से मथुरा के आसपास होली में रंग लगाने की परंपरा शुरू हो गयी।

लठमार होली

एक अन्य कथा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण अपने मित्रों के साथ राधा रानी के गांव बरसाना जाते थे। बार-बार आने के कारण राधा रानी और उनकी सखियां कान्हा और उनके सखाओं को लाठी मारकर भगा देती थी। लठमार होली की परंपरा यहां से शुरू होकर आजतक कायम है। आज बरसाना की महिलाएं भगवान श्री कृष्ण का पीछा करने की कोशिश के प्रतीक में नंदगांव के पुरुषों को डंडों से पीटती है। महिलाओं की लाठी से खुद को बचाने के लिए पुरुष ढाल का इस्तेमाल करते है।

दाउजी का हुरंगा होली

हुरंगा होली या दाऊजी का हुरंगा एक प्रसिद्ध होली है। यह मथुरा के बलदेव में होती है जहां दाऊजी का प्राचीन मंदिर स्थित है। हुरंगा होली को लेकर सबसे प्रचलित मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण जब राधा रानी के साथ होली खेलने आते थे तो गोपियों से भी शरारत करते थे। गोपियां परेशान होकर कान्हा और उनके मित्रों के वस्त्र फाड़ देती थी। इसलिए हुरंगा होली, देवर और भाभी के बीच दाऊजी मंदिर के अंदर खेली जाती है। यह होली मुख्य होली के एक दिन बाद मनाई जाती है।

बांकेबिहारी की फूलों की होली

यह विश्व प्रसिद्द श्री बांकेबिहारी मंदिर में मनाई जाती है। मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण अपनी सखियों और प्रिय राधा रानी के साथ वृंदावन के जंगलों में फूलों से होली खेलते थे। तभी से फूलों की होली की परंपरा इस मंदिर में आजतक कायम है।

लड्डू मार होली

ऐसा माना जाता है कि एकबार राधारानी के पिता वृषभानु ने नंदबाबा को होली में आने का न्योता दिया था। जिसे नंदबाबा ने स्वीकार कर लिया। नंदबाबा ने अपने पुरोहित के हाथों निमंत्रण स्वीकार करने का पत्र राधारानी के पिता को भेज दिया। और जब नंदबाबा के पुरोहित बरसाने पहुंचे तब वृषभानु ने पुरोहित का काफी आदर-सत्कार किया और लड्डू परोसे। बरसाने की गोपियों ने पुरोहित को गुलाल भी लगाया। इसके बाद पुरोहित ने थाल में रखे हुए लड्डू गोपियों के ऊपर मारने शुरू कर दिए। तब से ही इस लड्डू मार होली की शुरुआत हुई।

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