Ganga Dussehra: गंगा दशहरा पर मां गंगा की उपासना करने से साधकों को मिलती है समस्त पापों से मुक्ति
गंगा दशहरा (दशमी) पृथ्वी पर गंगा नदी के अवतरण दिवस का पर्व है। अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए राजा भगीरथ ने तपस्या की थी।

सृष्टि के निर्माता भगवान ब्रह्मा के कमंडल से राजा भगीरथ द्वारा देवी गंगा के धरती पर अवतरण दिवस को गंगा दशहरा (दशमी) के नाम से जाना जाता है। पृथ्वी पर अवतार से पहले गंगा नदी स्वर्ग का हिस्सा हुआ करती थी। गंगा नदी को भारत की सबसे पवित्र नदियों में से एक माना जाता है, इस कारण उन्हें सम्मान से मां गंगा अथवा गंगा मैया पुकारते हुए पूजा जाता है।
गंगा दशहरा का पर्व ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाता है। यह दिन हिन्दू के साथ-साथ समस्त मानव जाति के लिए विशेष है। इस तिथि में स्नान, दान, तर्पण से दस पापों का नाश होता है, इसलिए इसे दशहरा कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन मां गंगा की शुद्ध मन से उपासना करने पर सभी पापों से मुक्ति मिलती है।
गंगा दशहरा के शुभ मुहूर्त
पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 29 मई को सुबह 11 बजकर 49 मिनट पर शुरू होगी और अगले दिन 30 मई को दोपहर 01 बजकर 07 मिनट पर खत्म होगी। उदयातिथि के अनुसार गंगा दशहरा 30 मई को मान्य रहेगा।
- हस्त नक्षत्र- 30 मई सुबह 04:29 से 31 मई सुबह 6 बजे तक
- व्यतीपात योग- 30 मई रात 08:55 से 31 मई रात 08:15 तक
- स्नान एवं दान - सुबह 04.03 - सुबह 04.43
गंगा दशहरा पर बन रहे हैं तीन शुभ योग
गंगा दशहरा का पर्व इस बार तीन शुभ योग के बीच में मनाया जाएगा। इस दिन रवि योग, सिद्धि योग और धन योग का निर्माण हो रहा हैं। इसके साथ ही ज्योतिष में भौतिक सुखों के कारक माने जाने वाले शुक्र ग्रह का गोचर भी कर्क राशि में हो रहा है और इस प्रकार से धन योग भी इस दिन बन रहा है। इन शुभ संयोग के बीच में गंगा दशहरे का महत्व और बढ़ गया है। इस दिन दान करने से आपके घर में सुख समृद्धि और धन वैभव बढ़ता हैं।
गंगा दशहरा का महत्व
ब्रह्मपुराण के अनुसार गंगा दशहरा के दिन हस्त नक्षत्र विशेष महत्व रखता है। मान्यता है इस अवधि में जो गंगा स्नान करता है उसके दस तरह के पापों का नाश हो जाता है, इसलिए इसे दशहरा कहते है। इन दस पाप में 3 दैहिक, 4 वाणी के द्वारा किए पाप और 3 मानसिक पाप शामिल हैं। जैसे झूठ बोलना, हिंसा, नास्तिक बुद्धि रखना, कड़वा बोलना, बिना मंजूरी के दूसरे की चीज लेना, परस्त्री गमन, दूसरों की निंदा करना, किसी का अहित करना, दूसरे की चीजों को गैर कानूनी ढंग से लेने का विचार करना, दूसरे का बुरा होने की कामना करना शामिल हैं।
गंगा दशहरा पर इन वस्तुओं का करें दान
गंगा दशहरे के पर्व पर गरीब और जरूरतमंद लोगों को दान करने का विशेष महत्व हैं। ऐसा कहा जाता है कि गंगा दशहरा पर दान की जाने वाली वस्तुओं की संख्या 10 होनी चाहिए। इस दिन आप 10 फल, 10 पंखे, 10 सुराही, 10 छाते या फिर 10 हिस्से अन्न का दान कर सकते हैं। गंगा दशहरे पर कुछ लोग अपने घर में हवन-पूजन करवाते हैं। कहते है इस दिन हवन करने से आपके घर से हर प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है।
पानी में गंगाजल मिलाकर घर पर भी कर सकते हैं स्नान
गंगा दशहरा पर पवित्र गंगा नदी में स्नान जरूर करना चाहिए। अगर आपके लिए ऐसा कर पाना संभव न हो तो आपको घर पर ही स्नान करते हुए पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान कर लेना चाहिए। इस दिन मां गंगा की पूजा-अर्चना की जाती है।
भारत से बांग्लादेश तक बहती है गंगा
गंगा नदी हिमालय के गंगोत्री ग्लेशियर के टर्मिनस गोमुख से शुरू होती है। यह ग्लेशियर 3,892 मीटर (12,769 फीट) की ऊंचाई पर स्थित है। जब इस ग्लेशियर की बर्फ पिघलती है तो यह भागीरथी नदी के साफ पानी का निर्माण करती है। चूंकि भागीरथी नदी हिमालय से नीचे बहती है, यह अलकनंदा नदी में मिलती है और आधिकारिक तौर पर गंगा नदी का निर्माण करती है। गंगा नदी हिमालय पर्वत से 2,525 किलोमीटर (1,569 मील) उत्तरी भारत और बांग्लादेश में बंगाल की खाड़ी में बहती है। गंगा नदी पर स्थित प्रमुख शहर इलाहाबाद, कानपुर, वाराणसी, लखनऊ, पटना और कोलकाता हैं।
अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए भगीरथ ने की तपस्या
राजा दिलीप की मृत्यु के बाद भगीरथ राजा बने। भगीरथ के पूर्वज राजा सगर के 60 पुत्रों की मृत्यु के बाद उनका उद्धार नहीं हो पा रहा था। अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए राजा भगीरथ ने देव नदी गंगा को धरती पर लाने के लिए कठोर तप किया था। भगीरथ ने सबसे पहले भगवान ब्रह्मा को प्रसन्न करने के लिए तप किया। जब भगवान ब्रह्मा प्रकट हुए तो उन्होंने वरदान मांगने के लिए कहा। राजा भगीरथ ने वरदान मांगा कि मैं मेरे पूर्वज सगर के पुत्रों के उद्धार के लिए स्वर्ग से देव नदी गंगा को धरती पर लाना चाहता हूं। गंगा के जल से मेरे पूर्वजों को मुक्ति मिलेगी, नया जीवन मिलेगा और मुझे भी एक पुत्र की प्राप्ति होगी।
भगवान ब्रह्मा ने भगीरथ को यह वरदान दे दिया, लेकिन सावधान किया कि जब गंगा धरती पर उतरेगी तो उसके वेग को सहन करने और बांध देने के लिए किसी शक्ति की आवश्यकता होगी। अन्यथा, गंगा की धारा धरती को भेदकर पाताल में चली जाएगी। गंगा की धारा को थामने की शक्ति सिर्फ भगवान शिव में है, इसलिए तुम उनको भी प्रसन्न करो। फिर राजा भगीरथ ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तप किया। भगीरथ की तपस्या से भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने भगीरथ को वरदान दिया कि जब गंगा स्वर्ग से उतरेंगी तो वह उसे अपनी जटाओं में स्थान देंगे। भगीरथ को लगा कि अब तो काम हो गया। गंगा के स्वर्ग से धरती पर उतरने में कोई दिक्कत नहीं है।
भगवान शिव ने गंगा को सात धाराओं में बांटा
उस समय मां गंगा ने अपनी एक चिंता बताई कि जब भगवान शिव उन्हें अपनी जटाओं में रोकेंगे तो कहीं वह अपवित्र तो नहीं हो जाएंगी? मां गंगा की यह बात भगवान शिव को मालूम हुई तो उन्हें इसमें अपना अपमान दिखाई दिया। जब मां गंगा भगवान शिव की जटाओं में आईं तो उन्होंने गंगा को जटाओं में ही रोक लिया। इस प्रकार जल की धारा जटाओं तक तो आई, लेकिन पृथ्वी पर नहीं गिरी। राजा भगीरथ को पूरी बात मालूम हुई तो उन्होंने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए फिर से तप किया।
गंगा को सात धाराओं में बांट दिया
भगवान शिव प्रसन्न हुए और उन्होंने गंगा को सात धाराओं में बांट दिया। उन्हीं सात धाराओं में से एक गंगा बनकर भगीरथ के पीछे-पीछे चल दी। भागीरथ को हिमालय से गंगासागर तक पहुंचाने के मार्ग में कई दिक्कतें आईं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और वह हर मुश्किल को हल करते हुए आगे बढ़ते रहे। उनकी लगन देखकर ही भगवान ब्रह्मा ने उन्हें वरदान दिया कि धरती पर गंगा का एक नाम भागीरथी भी होगा। गंगा, भगीरथ की पुत्री के रूप में भी दुनिया में जानी जाएगी। भगीरथ की मेहनत से गंगा धरती पर आईं और उनके पूर्वजों का उद्धार हो गया।
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