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E-Waste: इलेक्ट्रॉनिक कचरा स्वास्थ्य एवं पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा

E-Waste: इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट जीवन में आसानी दिलाने के साथ साथ गंभीर समस्याओं कारण भी बन रहे हैं। भारत जैसे देशों में इन उत्पादों के रियूज और रिसाईकल की सुविधा नहीं होने तथा हर महीने उत्पादों की नई श्रृंखला बाजार में आने के कारण इलेक्ट्रॉनिक कबाड़ भी तेजी से बढ़ रहा है। इसी इलेक्ट्रॉनिक कबाड़ को ई कचरा भी कहते हैं। अभी तक यह पश्चिम देशों की समस्या थी, पर अब भारत के लिए भी गंभीर खतरा बनता जा रहा है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़ों के अनुसार, 2021-22 के दौरान देश में 2021-22 में 16.01 लाख टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ, लेकिन केवल 33 प्रतिशत कचरा ही एकत्रित और प्रोसेस किया गया था। बाकी लगभग 70 प्रतिशत कचरा प्रदूषण का कारण बन रहा है जिससे पर्यावरण, प्रकृति एवं स्वास्थ्य के लिए बड़ा खतरा उत्पन्न हो रहा है ।

E-Waste: Electronic waste is a big threat to health and environment

क्या है ई वेस्ट

ई-कचरा से तात्पर्य उन सभी इलेक्ट्रॉनिक और इलेक्ट्रिकल उपकरणों (ईईई) तथा उनके पार्ट्स से है, जो उपभोगकर्ता द्वारा दोबारा इस्तेमाल में नहीं लाया जाता। ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2020 के अनुसार भारत दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा ई-वेस्ट उत्पादक है। इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बनाने में जहरीले पदार्थों (शीशा, पारा, कैडमियम आदि) का इस्तेमाल होता है, जिसका मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

पारा, कैडमियम, सीसा, पॉलीग्रोमिनेटेड फ्लेम रिटाडेंट्स, बेरियम, लिथियम आदि ई-कचरे के जहरीले अवशेष मानव स्वास्थ्य के लिए बहुत खतरनाक हैं। इन विषाक्त पदार्थों के सम्पर्क में आने पर मनुष्य के हृदय, यकृत, मस्तिष्क, गुर्दे और अन्य अंगों को क्षति पहुंच सकती है। इसके अलावा, यह ई-वेस्ट मिट्टी और भूजल को भी दूषित करता है। कह सकते हैं कि ई- उत्पादों की अंधी दौड़ ने एक अन्तहीन समस्या को जन्म दे दिया है।

दुनिया में हर साल 3 से 5 करोड़ टन का ई-वेस्ट

एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में हर साल 3 से 5 करोड़ टन ई-वेस्ट पैदा हो रहा है। ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर के मुताबिक भारत सालाना करीब 20 लाख टन ई-वेस्ट पैदा करता है और अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी के बाद ई-वेस्ट उत्पादक देशों में 5वें स्थान पर है। ई-वेस्ट के निपटारे में भारत काफी पीछे है, जहां केवल 0.003 मीट्रिक टन का निपटारा ही किया जाता है।

यूएन के मुताबिक, दुनिया के हर व्यक्ति ने साल 2021 में 7.6 किलो ई-वेस्ट डंप किया। भारत में हर साल लगभग 25 करोड़ मोबाइल ई-वेस्ट के रूप में जमा हो रहे हैं। यह आंकड़ा चिंता का बड़ा कारण है, क्योंकि इनसे कैंसर और डीएनए डैमेज जैसी बीमारियों के साथ कृषि उत्पाद एवं पर्यावरण के लिए भी खतरा बढ़ रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ने भी अनुसार ई-कचरे से निकलने वाले जहरीले पदार्थों को लेकर चेतावनी जारी की है।

2030 इलेक्ट्रॉनिक कचरे में 38 फीसदी की वृद्धि

एक अन्य आंकड़े के मुताबिक अगर वर्ष 2019 में उत्पादित इलेक्ट्रॉनिक कचरे को रिसाईकल कर लिया गया होता वो करीब 425,833 करोड़ रुपए का फायदा होता। यह दुनिया के कई देशों के जीडीपी से भी ज्यादा है। यूनाइटेड नेशंस यूनिवर्सिटी की ओर से जारी ग्लोबल ई-वेस्ट मॉनिटर 2020 रिपोर्ट के मुताबिक 2019 में दुनिया में 5.36 करोड़ मीट्रिक टन ई-कचरा पैदा हुआ था।

अनुमान है कि साल 2030 तक इस वैश्विक इलेक्ट्रॉनिक कचरे में तकरीबन 38 प्रतिशत तक वृद्धि हो जाएगी। अब अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह समस्या कितनी बड़ी है और आने वाले समय में यह और कितना वृहद रूप लेने वाली है। केवल देश की राजधानी दिल्ली की बात करें तो यहां हर साल 2 लाख टन ई-कचरा पैदा होता है। इसी ई कचरे के कारण आग लगने जैसी कई जानलेवा घटनाएं हो चुकी है।

नई टेक्नोलॉजी आते ही पुराना बाहर

दुनियाभर में इलेक्ट्रॉनिक कचरे के बढ़ने की सबसे बड़ी वजह इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों की तेजी से बढ़ती खपत है। आज बाजार में उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों का जीवन काल छोटा है। इस वजह से इन्हें जल्द फेंक दिया जाता है। जैसे ही नई टेक्नोलॉजी आती है, पुराने को डंप कर दिया जाता है। इसके साथ ही कई देशों में इन उत्पादों की मरम्मत और रिसाईक्लिंग की सीमित व्यवस्था है या बहुत महंगी है। ऐसे में जैसे ही कोई उत्पाद खराब होता है, लोग उसे ठीक कराने की जगह बदलना ज्यादा पसंद करते हैं।

2021 में डेफ्ट यूनिवर्सिटी आफ टेक्नोलॉजी द्वारा किए गए सर्वेक्षण में फोन बदलने का सबसे बड़ा कारण सॉफ्टवेयर का धीमा होना और बैटरी में गिरावट रहा है। दूसरा बड़ा कारण नए फोन के प्रति आकर्षण था। कंपनियों की मार्केटिंग और दोस्तों व नाते रिश्तेदारों द्वारा हर साल फोन बदलने की आदतों से भी प्रभावित होकर लोग नया फोन लेते हैं, जबकि इसकी जरूरत नहीं होती। इस वजह से भी ई-कचरे में इजाफा हो रहा है।

रियूज और रिसाईकल ही है समस्या का समाधान

इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए आमजन को ही आगे आना होगा। ई-वेस्ट के निस्तारण का सबसे सरल उपाय उसका रियूज और रिसाईकल होना है। हाल ही में दिल्ली में भारत का पहला ई-कचरा इको पार्क प्रस्तावित है‌ 20 एकड़ में बनने वाले इस पार्क में बैटरी इलेक्ट्रॉनिक सामान, लैपटॉप, चार्जर मोबाइल और पीसी से अनूठे एवं दर्शनीय चीजों को निर्मित किया जाएगा।

कानपुर में ई-वेस्ट प्रबंधन का एक बेहतरीन मॉडल सामने आया है। यहां जयपुर के एक कलाकार ने ई-वेस्ट से 10 फीट लंबी मूर्ति बनाई है। इसे बनाने में 250 डेस्कटॉप और 200 मदरबोर्ड और ऐसी अनेक खराब इलेक्ट्रनिक वस्तुओं का उपयोग किया गया है। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि आमजन को बार-बार इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों को बदलने की अपनी इच्छा पर लगाम लगानी होगी। वहीं प्रभावी कार्रवाई के लिए सरकारों को भी आगे आना होगा।

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