Mosquitoes: 22 अरब डॉलर खर्च के बावजूद भी मच्छर मारने के तरीके फेल
Mosquitoes: 22 मलेरिया, डेंगू और अन्य जानलेवा बीमारियां फैलाने वाले मच्छरों को मारने के लिए दुनियाभर में हर साल कम से कम 22 अरब डॉलर (1.83 लाख करोड़ रु.) खर्च होते हैं। इसमें कीटनाशक, लार्वानाशक और कीटनाशक- उपचारित मच्छरदानियों पर होने वाला खर्च भी शामिल है। इसके बावजूद इस जंग में मच्छर ही जीत रहे हैं।
कीटनाशक जैसे परंपरागत तरीके अब कारगर नहीं रहे हैं। दरअसल, मच्छरों ने उनसे निपटने के लिए प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर ली है। केवल मच्छरदानी ही अब ऐसा तरीका बचा है, जिसके अंदर रहने पर लोग इनसे बच सकते हैं, लेकिन इसमें रहने की भी अपनी एक सीमा है। जैसे ही ही आप बाहर निकलते हैं, किसी न किसी जगह आपको मच्छरों का सामना करना ही पड़ता है।

मच्छर जनित बीमारियों से सालाना 6.2 लाख मौतें
जलवायु परिवर्तन से ऐसी जगहों की संख्या और क्षेत्र बढ़े हैं, जो मच्छरों के पैदा होने और बढ़ने के लिए अनुकूल हैं। इसी का असर है कि डेंगू फ्लोरिडा और फ्रांस तक फैल गया है, जो उष्ण कटिबंधीय नहीं हैं। केन्या में मच्छरों से लड़ने वाले वैज्ञानिक एरिक ओचोमो स्टेफनी का कहना है कि ऐसा लगता है, जैसे मच्छर जीत रहे हैं।
2019 में मच्छर जनित बीमारियों से करीब 5.75 लाख लोगों की जान गई थी। 2021 में यह संख्या 6.2 लाख पहुंच गई। इसे देखते हुए वैज्ञानिक दिन-रात नए समाधानों की तलाश कर रहे हैं। इनमें मच्छरों को जैविक व आनुवंशिक रूप से संशोधित करना भी शामिल है। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के इवान मुगेनी मुलोंगो और उनकी टीम प्रिंसिपे द्वीप पर ऐसा ही प्रयोग कर रही है। यह टीम परजीवी पर नियंत्रण के लिए लैब में एनोफेलीज कोलुजी को इंजीनियर कर चुकी है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि जीन ड्राइव के एक इस्तेमाल से विरासत में मिला गुण पूरी आबादी में तेजी से फैलता है। इससे कुछ ही महीनों में मलेरिया फैलाने वाली प्रजाति का हर मच्छर परजीवी के प्रति प्रभावी रूप से इम्यून बन सकता है। अफ्रीकी द्वीप देश साओ टोमे और प्रिंसिपे मलेरिया के खिलाफ युद्ध में सफलता का प्रतीक बन गया है। पांच साल में यहां मलेरिया से एक भी मौत नहीं हुई।
मच्छरों की तीन हजार से अधिक प्रजातियां, घातक बीमारियों के वाहक
मच्छरों की तीन हजार से अधिक प्रजातियां हैं, लेकिन इनमें से कुछ ही मानव रक्त का सेवन करती हैं और बीमारी फैलाती हैं। सबसे खतरनाक मच्छर एनोफेलीज, एडीज और क्यूलेक्स की कुछ प्रजातियां हैं। एडीज एजिप्टी अकेले लसीका फाइलेरिया, जीका, डेंगू और पीला बुखार फैलाता है।
मच्छर के काटने से होने वाली बीमारियों में मुख्यतः डेंगू बुखार, वेस्ट नाइल वायरस, मलेरिया, पीला बुखार, चिकनगुनिया, जीका तथा रिफ्ट वैली फीवर (आरवीएफ) शामिल है। विश्व रिपोर्ट बताती है कि लगभग 228 मिलियन लोग मच्छर जनित बीमारियों से पीड़ित थे, जिनसे 4,05,000 से अधिक लोगों की मौत हो गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बताया कि उप-सहारा अफ्रीकी देशों में मच्छर जनित बीमारियों का प्रकोप अधिक है।
प्लास्टिक रिपेलेंट शीट, शुगर पाउच और आइवरमेक्टिन जैसे तरीके आएंगे
मच्छरों से निपटने के पारंपरिक तरीके फेल होने के चलते वैज्ञानिक इनोवेटिव तरीके ला रहे हैं। दीवारों पर लटकाई जाने वाली प्लास्टिक रिपेलेंट शीट मच्छरों को भ्रमित कर देती है। जिससे वे ऊंचाई पर ही रहते हैं। यह शीट एक साल चलती है। अट्रैक्टिव टारगेटेड शुगर बैट जैसे नए प्रकार के कीटनाशक से युक्त शर्करा तरल के पाउच से भरा होता है। इसे पीने से मच्छर मर जाते हैं। एक शीट छह माह चलती है और इसका खर्च करीब 166 रुपए है। आइवरमेक्टिन भी मच्छरों को मारने में प्रभावी है। इन सभी इनोवेशन को बाजार में आने में कुछ साल लगेंगे, तब तक मानव जाति का मच्छरों से संघर्ष ऐसे ही चलता रहेगा।












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