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मैं दिल्ली हूं.. मैं दिल्ली हूं.. आसानी से हाथ नहीं आऊंगी

[चुनावी मंडप में बैठने जा रही दिल्ली ने बोला, अंकुर शर्मा ने लिखा] मैं दिल्ली हूं....आज एक बार फिर से मेरे तख्त को लेकर मारा-मारी बची हुई है। मौजूदा समीकरण कह रहे हैं कि मैं एक बार फिर चुनावी रंग में रंगने जा रही हूं। हालांकि मेरे बाश‍िंदों के लिए यह काफी मुश्किल वक्त है, लेकिन मुझसे शादी करने को तैयार तीनों वर (भाजपा, आप और कांग्रेस) फिर से मुझे चुनावी दु्ल्हन बनाना चाह रहे हैं।

मैं सोच में पड़ गई हूं! सोच रही हूं कि आखिर वो क्या वजहें हैं, जिनके कारण फिर से सभी दूल्हे मेरे लिए बारात लाने को आमादा हैं। तीनों दूल्हों को जितना ज्ञान राजनीतिशास्त्र का है, उतना ही ज्ञान इतिहास का भी, शायद तभी यह मुझे मंडप में बिठाना चाहते हैं। अगर आप मेरे इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो देखेंगे कि आज तक भारत पर उसी ने लंबे वक्त तक शासन किया है, जिसने मुझे जीता है, मेरे सिंहासन पर कब्जा जमाया है। चाहे वो मुगल हो या फिर अंग्रेज़। हर किसी की ख्वाहिश मुझे ही फतेह करने की रही है।

अब इसे वहम माना जाये या टोटका.. लेकिन इसी वजह से सारे राजघरानों (राजनीतिक दलों) की मंशा हमेशा से मेरा दिल जीतने की रही है। जब-जब मुझे लेकर जोड़-तोड़ की बिसात बिछी.. तब-तब मैंने अपना विकारल रूप भी दिखाया है। क्योंकि मैं दिल्ली हूं.. मैं दिल्ली हूं.. आसानी से हाथ नहीं आऊंगी।

मैंने ही जलालुद्दीन को अकबर बनाया

महाभारत काल से लेकर ब्रिटीश युग तक मैंने देश के हर संघर्ष को काफी करीब से देखा है, इसलिए मेरा दिल यह जानता है कि मुझ पर राज करने वाले को वाकई में पहले मेरे शहर के लोगों का दिल जीतना पड़ेगा। मैंने ही जलालुद्दीन को अकबर बनाया और मैंने ही लोगों को हर धर्म के प्रति सजदा करना सिखाया।

इसलिए मैं ही राजघरानों की महबूबा हूं और मैं ही मोहब्बत। इसीलिए हर कोई मुझे जीतना चाहता है, लेकिन मैं दिल्ली हूं.. मैं दिल्ली हूं.. आसानी से हाथ नहीं आऊंगी।

कमल, पंजा, झाड़ू राजवंश

मुझे लगता है कि इन्हीं सारी बातों के मद्देनजर ही शायद कमल के राजा (भाजपा), जिनका कद पिछले स्वयंवर में सबसे ऊंचा था, आज सबसे आगे चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं स्वयंवर रचाओ-स्वयंवर रचाओ। क्योंकि उन्हें पता है कि जीत का कारवां (2015 के बिहार चुनाव, 2017 में उत्तर प्रदेश के चुनाव) तभी आगे बढ़ेगा जब मेरे सिंहासन पर उन्हें जगह मिलेगी। कमल राजवंश यह भी जानता है कि पूरे भारत को विकास के पथ पर लाने के लिये 2020 तक का वक्त चाहिये, जो कि मेरे बिना संभव नहीं है। इसलिए ही कमल राजवंश की पुरजोर कोशिश है, कि वो मुझे इम्प्रेस करे। भले ही उसका भगवा रंग देश के कई साम्राज्यों में फैल चुका है, लेकिन दिल्ली की दुल्हन का दिल उसे जीतना अभी बाकी है।

दिल्ली की दुल्हन का दिल जीतना अभी बाकी है

रही बात झाडू की, तो शायद मेरे घर वाले (दिल्लीवासी) अब उनके वादों पर भरोसा नहीं करने वाले। लेकिन हो सकता है कि झाड़ू की सफाई उन्हें फिर से रास आ जाये। इसलिए झाडूं राजवंश (आम आदमी पार्टी) भी मुझे फिर से मंडप (चुनाव) में देखना चाह रही है। तो वहीं मेरा पुराना रखवाला (कांग्रेस), जिसके हाथों (पंजा) में मैं एक दशक तक रही, अब शायद अपनी गलतियों से सबक ले चुका है। और उसे लगता है कि वो फिर से मुझे इम्प्रेस कर लेगा। इसीलिए वो भी फिर से मुझे अपनी महबूबा बनाने की चाहत लिये गली-गली घूम रहा है। लेकिन मैं उन्हें भी मैं बताना चाहूंगी कि मैं दिल्ली हूं.. मैं दिल्ली हूं.. आसानी से हाथ नहीं आऊंगी..।

नोट- "मैं दिल्ली हूं, मैं दिल्ली हूं" शीर्षक बीआर चोपड़ा के धारावाहिक मैं दिल्ली हूं से प्रेरित है।

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