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Defence Corridor: रक्षा उत्पादन को जी 20 से मिला बल, जानिए डिफेंस कॉरिडोर का महत्त्व

Defence Corridor: दिल्ली में जी 20 की बैठक में भारत को जिन क्षेत्रों में बड़ी सफलता मिली, उनमें रक्षा उत्पादन क्षेत्र भी शामिल है। खासकर फ्रांस और जापान ने भारत के साथ रक्षा से जुड़े उत्पादन पर जल्दी एक रोडमैप तैयार करने का प्रस्ताव रखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रॉन ने भारत में उन्नत रक्षा प्रौद्योगिकियों के उत्पादन का विस्तार करने का फैसला किया, जिसमें इंडो-पैसिफिक क्षेत्र और उससे आगे अन्य देशों को भी शामिल किया जाएगा। जापान के प्रधानमंत्री ने भी इसमें सहमति जताई।

डिफेन्स टेक्नोलॉजी और प्लेटफार्मों के डिजाइन, विकास, परीक्षण के लिए औद्योगिक रोडमैप को शीघ्र अंतिम रूप देने पर जोर दिया गया। चीन का इंडो-पैसिफिक में दबदबा नहीं रहे इसलिए यूरोपीय देश भारत को मुख्य भागीदार बनाना चाहते हैं। भारत ने भी अब रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए कमर कस ली है। पिछले दिनों रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने ऐलान किया कि रक्षा औद्योगिक गलियारे (डिफेंस कॉरिडोर) में नट-बोल्ट से लेकर ब्रह्मोस मिसाइल तक का निर्माण होगा।

Defense production got boost from G20, know the importance of Defense Corridor

भारत दुनिया के उन पांच बड़े देशों में शामिल है जो अपनी रक्षा पर सबसे अधिक खर्च करते हैं। अब देश रक्षा उत्पादन में तेजी से विश्व में अपनी जगह मज़बूत करता जा रहा है। मोदी सरकार इस समय दो डिफेन्स कॉरिडोर को विकसित करने में लगी हुई है। एक उत्तर प्रदेश और दूसरा तमिलनाडु में ।

सरकार का उद्देश्य भारतीय एयरोस्पेस और रक्षा क्षेत्र में विदेशी निर्भरता को कम करना है। साथ दूसरे देशों को रक्षा सामान एक्सपोर्ट करना है। मेक इन इंडिया का असर यह है कि हमारा रक्षा निर्यात वर्ष 2022-23 में लगभग 16,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। मोदी सरकार का डिफेन्स कॉरिडोर स्थापित करने का फैसला अब फल देने लगा है।

क्या है डिफेंस कॉरिडोर?

डिफेंस कॉरिडोर भारत सरकार की एक महत्वाकांक्षी परियोजना है। ये डिफेंस क्षेत्र से जुड़ा प्रोजेक्ट है। दरअसल डिफेंस कॉरिडोर एक रूट होता है, जिसमें कई शहर शामिल होते हैं। इन शहरों में सेना के काम आने वाले सामानों के निर्माण के लिए इंडस्ट्री-उद्योग विकसित किए जाते हैं। जिसमें कई प्राइवेट व सरकारी कंपनियां हिस्सा लेती हैं। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र दोनों रक्षा उत्पादन में भाग ले रहे हैं, विशेषकर मध्यम और लघु क्षेत्र की इकाइयां डिफेंस कॉरिडोर्स में ज्यादा लाभ की स्थिति में होंगी।

डिफेंस कॉरिडोर की अहमियत

रक्षा सामानों के उत्पादन के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में डिफेंस कॉरिडोर का खासा महत्व है। वर्तमान परिदृश्य में भारत रक्षा क्षेत्र की अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए ज्यादातर विदेशों पर निर्भर है। भारत अपनी जरूरत के अधिकांश हथियार दूसरे देशों से आयात करता है। इसलिए इस डिफेंस कॉरिडोर की अहमियत बहुत खास है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के रक्षा उत्पादों और हथियारों का उत्पादन होने के साथ ही इन डिफेंस कॉरिडोरों के कारण ही क्षेत्रीय उद्योगों का विकास होगा। साथ ही नए रोजगार का मौका बनेगा। ये उद्योग ग्लोबल सप्लाई चेन के साथ भी जुड़ सकेंगे।

तमिलनाडु और उत्तर प्रदेश में बन रहा कॉरिडोर

देश में दो डिफेंस इंडस्ट्रियल कॉरिडोर बनाए जा रहे हैं। इनमें से पहला तमिलनाडु के पांच शहरों चेन्नई, होसूर, कोयंबटूर, सलेम और तिरुचिरापल्ली में और दूसरा उत्तर प्रदेश के छह शहरों आगरा, प्रयागराज, लखनऊ, कानपुर, झांसी और चित्रकूट में। उत्तर प्रदेश डिफेंस कॉरिडोर के लिए उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण को नोडल एजेंसी बनाया गया है।

डिफेंस कॉरिडोर में क्या-क्या सामान बनेंगे?

डिफेंस कॉरिडोर में बुलेट प्रूफ जैकेट, ड्रोन, लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, तोप और उसके गोले, क्रूज मिसाइल, विभिन्न तरह की बंदूकें आदि बनाए जाएंगे। बीते महीने ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा था कि लखनऊ में ब्रह्मोस मिसाइल भी बनेगा। साथ ही लड़ाकू विमान, तोप, टैंक, पनडुब्बी, युद्धपोत, हेलीकॉप्टर, सैनिकों के लिए बूट, बुलेट प्रूफ जैकेट, पैराशूट, ग्लब्स आदि के उत्पादन से जुड़ी इकाइयां इन कॉरिडोर में स्थापित होंगी। अगस्त, 2020 में रक्षा मंत्रालय ने 101 रक्षा सामानों की लिस्ट बनाई थी। जिसके तहत 2020 से 2024 तक जिनका आयात बंद हो जाएगा। इसके बारे में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी कहा था अब भारत इन सामानों के उत्पादन में सक्षम हो सके, इसका सुनहरा अवसर है।

उत्तर प्रदेश में निवेश

यूपी डिफेंस कॉरिडोर में निवेश के लिए 100 से ज्यादा कंपनियां तैयार हैं। 30 से ज्यादा कंपनियों के साथ करार भी हो चुका है। ये कंपनियां 50 हजार करोड़ से ज्यादा का निवेश करेंगी। इन कंपनियों में अडाणी डिफेंस सिस्टम्स एंड टेक्नॉलोजीज, जेनसर एयरोस्पेस, अनंत टेक्नॉलोजीज, एंड्योर एयरोसिस्टम्स प्रमुख हैं।

कौन क्या बनाएगा?

● अडाणी डिफेंस सिस्टम्स - शॉर्ट रेंज मिसाइलें और गोला-बारूद
● जेनसर एयरोस्पेस - लाइट ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट (राजस रक्षण)
● अनंत टेक्नॉलोजीज - लोअर अर्थ ऑर्बिट और जिओसिंक्रोनस सेटलाइट्स
● आधुनिक मटीरियल - डिफेंस टेक्सटाइल्स
● डॉटम एडवांस्ड कंपोजिट्स - कार्बन फिल्टर, ग्लास फाइबर आदि
● डेल्टा कॉम्बेट सिस्टम्स - हथियार और गोला-बारूद

तमिलनाडु में ये कंपनियां कर रही हैं इंवेस्टमेंट?

तटीय राज्य होने की वजह से तमिलनाडु डिफेंस कॉरिडोर की खास भूमिका रहेगी। यहां चार मुख्य समुद्री पोर्ट और 22 छोटे समुद्री पोर्ट्स हैं। साथ ही चार इंटरनेशनल और 2 डोमेस्टिक एयरपोर्ट हैं। इसलिए इसका रणनीतिक महत्व बहुत रहेगा। जनवरी, 2019 में इस कॉरिडोर का उद्घाटन हुआ था। यहां आवश्यक परीक्षण, सर्टिफिकेशन फैसिलिटी, निर्यात सुविधा केंद्र, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर्स का काम होगा।

फ्रांस की कंपनी एमबीडीए और भारत की एल एंड टी कोयंबटूर में मिसाइल वैपन सिस्टम का निर्माण करेंगी। बीएचईएल रानीपेट में 200 करोड़ के निवेश से एयरो स्पेस बना रहा है। इसके अलावा कुलाशेखरापट्टनम में इसरो ने 1000 करोड़ के निवेश से सैटेलाइट लॉच स्टेशन बनाने की योजना पर काम कर रहा है। इससे भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम को नईगति मिलेगी। कोयंबटूर में एलएमडब्ल्यू और बोइंग ने स्कील सेंटर स्थापित करने का फैसला किया है। जो एयरोस्पेस और डिफेंस इंडस्ट्री को जरुरी मानव संसाधन की आपूर्ति करेगा।

डिफेंस कॉरिडोर का बजट

भारत ने 2025 तक 130 बिलियन अमेरीकी डॉलर का खर्च कर रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने का लक्ष्य रखा है। इसमें निजी क्षेत्र की भागीदारी महत्वपूर्ण होगी। निर्यात को भी बढ़ावा मिलेगा। विदेशी उपकरण निर्माता भारतीय कंपनियों के साथ रणनीतिक साझेदारी कर रही हैं। योजना के अनुसार 2025 तक भारत का लक्ष्य 1.75 लाख करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादन करने का है। उत्पादन करने का है। 35 हजार करोड़ रुपये का निर्यात लक्ष्य भी तय किया गया है।

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