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Collegium System: किरेन रिजिजू ने फिर कॉलेजियम सिस्टम के खिलाफ मोर्चा खोला, आखिर क्या है पूरा विवाद?

4 नवंबर को भारत के कानून एवं न्याय मंत्री किरेन रिजिजू ने एक न्यूज़ चैनल द्वारा आयोजित कॉनक्लेव में न्यायपालिका पर तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की। मुंबई में आयोजित इस कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि न्यायपालिका को कार्य पालिका के क्षेत्र में प्रवेश करके अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करना चाहिए और देश को चलाने का कार्य निर्वाचित प्रतिनिधियों पर छोड़ देना चाहिए।

collegium system Kiren Rijiju know the whole controversy

किरेन रिजिजू ने इसी कार्यक्रम में यह भी कहा कि जजों का चुनाव करने के लिए सुप्रीम कोर्ट का मौजूदा कॉलेजियम सिस्टम अपारदर्शी है। जो सबसे योग्य है, उसी को जज बनाया जाना चाहिए, न कि ऐसे किसी को बना दिया जाए जिसे कॉलेजियम जानता हो। न्यायपालिका में भी बहुत राजनीति है, हालांकि, यह बात जज जाहिर नहीं होने देते।
इससे पहले, 17 अक्टूबर को अहमदाबाद में हुए साबरमती संवाद कार्यक्रम में भी न्यायपालिका पर टिप्पणी करते हुए किरेन रिजिजू ने कहा था कि "सुप्रीम कोर्ट में कुछ 40 से 45 न्यायाधीशों की तानाशाही चलती है, सिर्फ इसलिए कि वो अच्छी अंग्रेजी बोल लेते हैं। न्यायाधीशों का मुख्य कार्य है न्याय देना है न कि न्यायाधीश चुनना।" उन्होंने तंज करते हुए यह तक कह दिया था कि न्यायाधीशों का आधा समय तो नए जजों को चुनने में ही लग जाता है।

क्या है कॉलेजियम सिस्टम ?

कॉलेजियम सिस्टम, न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण की प्रणाली है। यह व्यवस्था न तो भारत की संविधान सभा में तय की गयी थी और न ही भारतीय संसद द्वारा प्रस्तावित है। संविधान में भी कॉलेजियम सिस्टम का कहीं कोई जिक्र नहीं हैं। दरअसल, यह व्यवस्था खुद सुप्रीम कोर्ट ने अपनी सुविधानुसार विकसित की है।

साल 1993 में सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को अपनाया था। इसके अनुसार कॉलेजियम एक समूह होता है जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश के अलावा शीर्ष कोर्ट के 4 सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल होते हैं। कॉलेजियम समूह मिलकर सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों में जजों की नियुक्ति तथा तबादलों का फैसला करता है। उच्च न्यायालयों के कौन से जज पदोन्नत होकर सर्वोच्च न्यायालय जाएंगे यह फैसला भी कॉलेजियम ही करता है। कॉलेजियम की सिफारिशें प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भेजी जाती हैं और उनकी मंज़ूरी मिलने के बाद ही नियुक्ति की जाती है।

सुप्रीम कोर्ट इस कॉलेजियम सिस्टम में बदलाव अथवा इसके स्थान पर अन्य व्यवस्था को अपनाने को लेकर अडिग रहता है। साल 1998 में तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन ने भी इस व्यवस्था पर प्रश्न उठाये थे लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों के मामले - The Third Judges Case of 1998 में इस व्यवस्था को उचित बताया था।

साल 2013 में एक गैर सरकारी संस्था ने कॉलेजियम सिस्टम के खिलाफ एक याचिका दायर की तो सुप्रीम कोर्ट ने इस पर विचार करने से ही इंकार कर दिया। इसी साल तत्कालीन चीफ जस्टिस पी सताशिवम ने भी कॉलेजियम सिस्टम से छेड़छाड़ करने पर कड़ी प्रतिकिया की थी। उन्होंने कहा था कि कॉलेजियम प्रणाली में बदलाव की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा था कि न्यायपालिका नियुक्ति की वर्तमान प्रणाली में सुधार के लिए कोई भी अच्छे सुझाव देने या कदम उठाने का स्वागत करेगी।

किरेन रिजिजू कॉलेजियम के खिलाफ क्यों?

साल 2014 में भाजपा चुनाव जीतकर सत्ता में आई तो केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्त‍ि आयोग (नेशनल जुडिशल अपॉइंटमेंट कमीशन - NJAC) नाम से एक आयोग का गठन किया। इस आयोग को सरकार ने संसद से मंजूरी भी दिलवाई। एनजेएसी एक्ट 13 अगस्त 2014 को लोकसभा और अगले दिन यह राज्यसभा द्वारा पारित हुआ। तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी एनजेएसी एक्ट को अपनी स्वीकृति देते हुए इसे एक संवैधानिक दर्जा दे दिया था।
एनजेएसी एक्ट का सबसे बड़ा उद्देश्य कॉलेजियम सिस्टम को खत्म करना था। भारत में 16 राज्यों ने इस आयोग में रुचि दिखाते हुए अपनी स्वीकृति भी दी थी। इसमें उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं स्थान्तरण के लिए छह सदस्यों को शामिल करने का प्रस्ताव बनाया गया था। इसमें देश के चीफ जस्टिस को प्रमुख बनाने सहित सुप्रीम कोर्ट के 2 वरिष्ठ न्यायाधीशों, कानून मंत्री और विभिन्न क्षेत्रों से जुड़ीं 2 जानी-मानी हस्तियों को बतौर सदस्य शामिल किया जाना था।

नेशनल ज्यूडिशल अपॉइंटमेंट कमिशन के अनुसार भारत में और किसी भी राज्य में न्यायिक अधिकारियों, कानूनी अधिकारियों और कानूनी कर्मचारियों की भर्ती, नियुक्ति और स्थानांतरण की शक्ति भारत सरकार और राज्य सरकारों के अंतर्गत आ जायेगी।

एनजेएसी एक्ट 13 अप्रैल 2015 को लागू हुआ। हालाँकि, 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने इस एक्ट को असंवैधानिक बताते हुए इसे काम करने से रोक दिया।

लेखक परिचय : Manshul Rathodiya युवा पत्रकार एवं लेखक हैं।

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