Bankim Chandra Chatterjee: सरकारी अधिकारी थे बंकिम चंद्र चटर्जी, फिर भी देशभक्ति में लिख दिया वंदेमातरम गीत
Bankim Chandra Chatterjee: वंदे मातरम को लिखकर महान साहित्य रचनाकार और स्वतंत्रता सेनानी बंकिम चंद्र चटर्जी सदा के लिए अमर हो गये। वंदे मातरम सिर्फ एक गीत या नारा ही नहीं है, बल्कि आजादी की एक संपूर्ण संघर्ष गाथा है। कई वीर इस घोष व गीत को गाकर देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दे चुके हैं। वंदे मातरम बोलते ही एक जोश तन मन में जाग जाता है। आज इस वंदे मातरम के रचयिता बंकिम चंद्र चटर्जी की जयंती है।
बंकिम चंद्र की साहित्य यात्रा
बंकिम चंद्र एक विद्वान लेखक थे। उनकी पहली प्रकाशित कृति राजमोहन्स वाइफ थी, जोकि अंग्रेजी में थी। इसके बाद उनकी बांग्ला कृति 'दुर्गेश नंदिनी' थी जो 1865 में छपी थी। बंकिम की शिक्षा हुगली कॉलेज और प्रेसीडेंसी कॉलेज में हुई थी। वर्ष 1857 में उन्होंने बीए पास किया और 1869 में उन्होंने कानून की डिग्री भी हासिल की। बंकिम एक सरकारी अधिकारी रहे थे। उन्होंने कई उच्च सरकारी पदों पर नौकरी की और 1891 में सरकारी सेवा से रिटायर हुए। अप्रैल 1872 में उन्होंने 'बंग दर्शन' नाम से एक पत्रिका निकालनी शुरू की जिसमें उन्होंने गंभीर साहित्यिक-सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दे उठाए।

वंदे मातरम का इतिहास
वंदे मातरम का इतिहास बड़ा ही दिलचस्प है। बंकिम चंद्र ने वंदे मातरम की रचना 1870 में की थी। इसमें उन्होंने भारत को दुर्गा का स्वरूप मानते हुए देशवासियों को उस मां की संतान बताया। भारत को दुर्गा का प्रतीक मानने के कारण मुस्लिम समुदाय का एक वर्ग इससे खफा था। रवींद्रनाथ, बंकिम चंद्र की कविताओं के प्रशंसक रहे थे और उन्होंने नेहरू से कहा कि वंदे मातरम के पहले दो छंदों को ही सार्वजनिक रूप से गाया जाए। वंदे मातरम को एक कविता के रूप में लिखा गया था लेकिन बाद में उसे आनंदमठ उपन्यास का हिस्सा बनाया गया।
कभी नहीं हुआ प्रमोशन
यदि आप सरकारी या गैर सरकारी नौकरी करते हैं तो प्रमोशन जरूर चाहते होंगे। पर क्या आप जानते हैं कि बंकिम चंद्र चटर्जी एक सरकारी कर्मचारी थे लेकिन कभी उनका प्रमोशन नहीं हो पाया था। 1858 में वह कोलकाता के डिप्टी कलेक्टर पद पर नियुक्त हुए। इस पद पर रहते हुए उन्होंने कानून की डिग्री हासिल की थी। उस वक्त बड़े पदों पर केवल अंग्रेज ही तैनात होते थे। बंकिम चंद्र चटर्जी का अंग्रेज अधिकारियों से संघर्ष होता रहता था। इसी वजह से उनका कभी प्रमोशन नहीं हुआ था।
वंदे मातरम बना राष्ट्रगीत
वंदे मातरम इतना प्रसिद्ध हुआ था कि स्वयं गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे संगीत दिया था। वहीं आजाद भारत में 24 जनवरी, 1950 को भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम को राष्ट्रगीत का दर्जा दिए जाने की घोषणा की थी। बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने लेखन से जन्मभूमि के प्रति श्रद्धा का भाव जगाया। उन्होंने देश के नवजागरण के लिए उच्च कोटि के साहित्य की रचना की। वहीं आपकी जानकारी के लिए बता दें कि बंकिम चंद्र चटर्जी ने 1872 में पहली बंगाली पत्रिका 'बंग दर्शन' का प्रकाशन शुरू किया था। तब रविंद्र नाथ टैगोर ने बंग दर्शन में ही लिखना शुरू किया था। वह बंकिम चंद्र चटर्जी को अपना गुरु मानते थे।
नौकरी के साथ-साथ देशभक्ति
ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बनने के बाद भारतीयों का जीवन पहले से भी ज्यादा कठिन हो गया था। सरकारी नौकरी में रहते हुए बंकिम चंद्र चटर्जी स्वतंत्रता आंदोलन में खुलकर सक्रिय भागीदारी नहीं कर सकते थे। बंकिम चंद्र कविता और उपन्यास दोनों ही लिखने में पारंगत थे। उन्होंने आनंदमठ नाम का उपन्यास लिखा। इस उपन्यास ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में प्राण फूंक दिए। यह उपन्यास 1882 में कई भागों में प्रकाशित हुआ। इसमें 1773 में हुए स्वराज आंदोलन की कहानी है। बंकिम चंद्र चटर्जी ने अपने लेखन से राष्ट्रवाद का अलख जगाया। विदेशी सरकार की सेवा के साथ-साथ देश के नवजागरण के लिए उच्च कोटि के साहित्य की रचना की। 8 अप्रैल 1894 को इस महान साहित्य सेवी और देशसेवी का निधन हो गया। इससे बांग्ला साहित्य और समाज के साथ-साथ पूरे देश को गहरा आघात पहुंचा।












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