'द केरला स्टोरी' को नेशनल अवॉर्ड मिलने से मचा हंगामा, जूरी मेंबर आशुतोष गोवारिकर ने बताया फिल्म क्यों थी हकदार
विवादों से घिरी फिल्म 'द केरल स्टोरी' ने 71वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में दो प्रतिष्ठित सम्मान हासिल किए हैं। 1 अगस्त को इन पुरुस्कारों की घोषणा हुई। इसमें सुदीप्तो सेन को सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और प्रशांतनु मोहपात्रा को सर्वश्रेष्ठ सिनेमैटोग्राफी के लिए नवाजा गया। सुदीप्तो ने ही इस फिल्म को डायरेक्ट किया था।
'द केरल स्टोरी' फिल्म अपनी रिलीज के समय से ही विवादों में रही है। जब ये फिल्म रिलीज हुई, तब इसे कई प्रदेशों में बैन भी कर दिया गया था। फिल्म धर्म परिवर्तन के विषय को उजागर करती है। यही वजह रही कि फिल्म विवादों में घिरी रही। कई लोगों ने इसे एक समुदाय को निशाना बनाने वाला दुष्प्रचार बताया। अदा शर्मा की फिल्म केरल की उन महिलाओं की कहानी दिखाती है जिन्हें जबरन धर्म परिवर्तन कराकर आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (आईएस) में भर्ती किया गया था।

इस बार नेशनल अवॉर्ड की जूरी में फिल्ममेकर आशुतोष गोवारिकर भी शामिल थे। उनसे इस फिल्म को अवॉर्ड देने पर सवाल किया गया। जिसमें उन्होंने कहा, पहला अवॉर्ड सिनेमैटोग्राफी के लिए मिला है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी नरेटिव पर हावी होने की कोशिश नहीं की। बहुत ही स्टार्क और रियल थी। दूसरा अवॉर्ड सर्वश्रेष्ठ निर्देशन का है। ये एक बहुत ही कठिन विषय है और इसे जिस स्पष्टता से बताया गया है। जिसके बाद बतौर जूरी हमें लगा कि इसे सम्मानित किया जाना चाहिए। बता दें, अदा की इस फिल्म को पश्चिम बंगाल में बैन कर दिया गया था। वहीं कानून-व्यवस्था के कारण तमिलनाडु में इसकी स्क्रीनिंग रोक दी गई थी, जबकि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों ने इसे कर-मुक्त दर्जा दिया था।
बता दें, अवॉर्ड की घोषणा के बाद केरल सीएम पिनाराई ने X पर लिखा, केरल की छवि धूमिल करने और सांप्रदायिक नफ़रत के बीज बोने के स्पष्ट इरादे से, घोर गलत सूचना फैलाने वाली एक फिल्म को सम्मानित करके, नेशनल फिल्म अवॉर्ड की जूरी ने संघ परिवार की विभाजनकारी विचारधारा में निहित एक कथानक को वैधता प्रदान की है। केरल, वह भूमि जो हमेशा सांप्रदायिक ताकतों के विरुद्ध सद्भाव और प्रतिरोध का प्रतीक रही है। इस निर्णय से घोर अपमानित हुई है। केवल मलयाली ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र में विश्वास रखने वाले सभी लोगों को सत्य और हमारे प्रिय संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए अपनी आवाज़ उठानी चाहिए।












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