देशभर में पहुंच रही छ.ग. के शिल्पग्राम में बनी मुर्तियां, मिट्टी की प्रतिमा में प्रांण फुंक दे ऐसी है कला
थनौद में बनी मूर्तियों और झांकियों की डिमांड छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य राज्यों में भी साल भर बनी रहती है। यदि गूगल में भी आप थनौद सर्च करेंगे तो आपको यहां की मूर्तिकला की पहली तस्वीर ही देखने को मिलेगी,
दुर्ग, 16 जुलाई। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले का ग्राम थनौद अपनी मूर्ति कला के लिए पूरे देश भर में प्रसिद्ध है यहां बनी मूर्तियों की विशेषता के कारण लोग यहां आकर मूर्तियां बनवाते हैं। इस गांव की खास बात यह है कि यहां लगभग दो सौ परिवार मूर्तिकला का ही काम करके अपना परिवार का चलाते हैं। इस गांव में मूर्तिकला का इतिहास 100 साल पुराना है। यहां बनी मूर्तियों और झांकियों की डिमांड छत्तीसगढ़ के अलावा अन्य राज्यों में भी साल भर बनी रहती है। यदि गूगल में भी आप थनौद सर्च करेंगे तो आपको यहां की मूर्तिकला की पहली तस्वीर ही देखने को मिलेगी।

मिट्टी की प्रतिमा में प्रांण फुंक दे ऐसी है कला
मिट्टी की प्रतिमा को जीवंत रूप में सजाने का काम यह मूर्तिकार करते हैं। इन प्रतिमाओं में कलकत्ता की विशेष मिट्टी का प्रयोग मूर्तियों के निर्माण के बाद अंतिम रूप देने के लिए की जाती है। यहां की मूर्तिकला की विशेषता के कारण अन्य राज्य से लोग यहां आकर मूर्तियां बनवाते हैं। थनौद गांव के शिल्पकार सिर्फ मिट्टी से ही मूर्ति नहीं बनाते बल्कि पत्थरों को तराश कर भी मूर्ति बनाने की कला में माहिर हैं। राजनांदगांव की विशालकाय प्रतिमा मां पाताल भैरवी जिसका निर्माण थनौद गांव के मूर्तिकार बालम चक्रधारी ने किया है। राज्य सरकार ने उन्हें छत्तीसगढ़ माटी कला बोर्ड का अध्यक्ष बनाया हैं ।

कृषि से नही होता गुजारा इसलिए मूर्तिकला ही सहारा
ये शिल्पकार किसान भी हैं। लेकिन कम कृषि भूमि होने के कारण यह किसान अपने खेतों से एक ही फसल लेते हैं। साल भर यह मूर्तियां बनाकर अपना जीवन यापन करते हैं। यहां के चक्रधारी परिवार ने इस कला को आज के आधुनिकतम युग में भी बचा कर रखा है। बालम चक्रधारी बताते हैं की इस कला के माध्यम से ही वे अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं। बाकि समय मटके व अन्य खलौने बनाकर गुजारा करते हैं। बच्चे स्कूल से आने के बाद पिता के साथ मूर्तिकला में हाथ बटाते हैं। अगर सीजन में मूर्तियों की डिमांड कम रही तो उन्हें मजदूरी के लिए बाहर भी जाना पड़ता है। यहां एक फिट से लेकर विशालकाय मूर्तियां भी बनाई जाती है।

यहां के शिल्पकार अजय चक्रधारी बताते हैं। यह उनका पुश्तैनी कार्य है उनका परिवार लगभग 100 साल पहले से मूर्तिकला से ही अपना जीवन यापन करता आ रहा है। यह निवास करने वाले चक्रधारी परिवार बड़े मेहनती होते हैं। वे मूर्तियां बनाने के लिए पहले विधि विधान से मिट्टी की पूजा करते हैं इसके बाद मिट्टी में अन्य चीजें मिलाई जाती है। सुबह से ही मिट्टी गूथने से लेकर मूर्तियों की रंगाई तक सारा कार्य करते हैं। वहीं इनके साथ कार्य करते-करते इनके बच्चों में भी यह हुनर अपने आप ही आ जाता है।
छत्तीसगढ़ समेत अन्य राज्यों में फैली है ख्याति
दो हजार की आबादी वाले थनौद गांव की पहचान छत्तीसगढ़ के बाहर अन्य राज्यों में भी है। यहां के मूर्तिकार अपनी माटी कला से सुंदर- सुंदर मूर्तियां बनाते हैं। इसके अलावा लोगों की डिमांड के आधार पर मूर्तियां तैयार की जाती है। दरअसल थनौद गांव में साल भर मूर्तियां और झांकियां बनती है। नवरात्रि पर्व पर दुर्गा पूजा व गणेश चतुर्दशी में सबसे ज्यादा मूर्तियों के डिमांड आतें है। बाकि दीपावली या बाकी समय मूर्तियों की डिमांड कम होती है। महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, झारखंड और बिहार जैसे राज्यों के साथ साथ मायानगरी मुम्बई में भी यहां बनी मूर्तियों और झांकियांकी डिमांड रहती हैं।
कोरोना और महंगाई ने तोड़ी कमर, कमाई रह गई आधी
कोविड के दौरान लॉकडाउन और सरकार के निर्देश का असर पूरे देश में पढ़ने के साथ-साथ मूर्तिकार पर भी पड़ा। लगातार 2 साल तक कोरोना संक्रमण काल में मूर्तियों की डिमांड लगभग नहीं के बराबर थी। इसके साथ ही सरकार ने 5 फीट तक की मूर्तियां स्थापित करने की गाइड लाइन जारी की थी। जिससे इन शिल्पकार ओ को आजीविका चलाने में कई मुसीबतों का सामना करना पड़ा। इस कार्य मे प्रयोग होने वाले रंग, लकड़ी व मजदूरी महंगी होने के कारण इन मूर्ति कारों को मूर्तियों के वाजिब दाम नहीं मिल पाते हैं। मूर्ति में प्रयोग होने वाले रंग लकड़ियां व अन्य संसाधन काफी महंगे होते जा रहे हैं जिसके चलते कमाए आधी हो गई है।












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