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अमृत महोत्सव: भिलाई की सविता धपवाल सहित 50 प्लस महिलाओं ने किया ऐसा कमाल, राष्ट्रपति ने की तारीफ

देश की 75वीं वर्षगांठ पर आजादी का अमृत महोत्सव को खास बनाने पद्मभूषण बछेंद्री पाल के नेतृत्व में 50 वर्ष से अधिक उम्र की देश भर की 11 महिलाओं का समूह हिमालय की विभिन्न चोटियों पर तिरंगा फहराकर लौटा है

दुर्ग, 21अगस्त। छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले की तालपुरी भिलाई निवासी पर्वतारोही सविता धपवाल ने हिमालय की दुर्गम चोटियां फतह कर एक नया कीर्तिमान रच दिया है। देश की 75वीं वर्षगांठ पर आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है, इस मौके को खास बनाने पद्मभूषण बछेंद्री पाल के नेतृत्व में 50 वर्ष से अधिक उम्र की देश भर की 11 महिलाओं का समूह हिमालय की विभिन्न चोटियों पर तिरंगा फहराकर लौटा है। इस टीम में भिलाई सविता धपवाल भी शामिल रहीं।

140 दिन में पूरा किया सफर

140 दिन में पूरा किया सफर

इस जोखिम भरे सफर में महिलाओं ने खतरनाक 35 दर्रों को पार करते हुए। 4977 किमी का सफर तय किया। इस अभियान के माध्यम से महिलाओं के समूह ने बच्चों की शिक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने और सेहतमंद भारत (फिट इंडिया) का संदेश फैलाने में अपना योगदान दिया। सविता धपवाल ने बताया कि पर्वतारोहण के क्षेत्र में ऐसा पहली बार हुआ जब 50 प्लस की 11 महिलाएं बारिश और बर्फबारी के इस विपरीत मौसम के बावजूद हिमालय की दुर्गम चोटियों पर पांच महीना तक ट्रैकिंग करती रहीं।

50 प्लस महिलाओं ने किया ट्रैकिंग

50 प्लस महिलाओं ने किया ट्रैकिंग

इस समूह की खास बात यह रही कि इसमें सभी महिलाएं 50 वर्ष से अधिक उम्र की थीं। 11 महिलाओं का यह "ट्रांस हिमालयन अभियान" "आजादी के अमृत महोत्सव" को खास बनाने मुख्य रूप से टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन द्वारा 'फिट इंडिया' के बैनर तले केंद्र सरकार के खेल और युवा मामलों के मंत्रालय के सहयोग से आयोजित किया गया था। पहली बार उम्रदराज महिलाएं दुर्गम चोटियों पर 5 महीना रहीं। जिसमें भारतीय सेना इस पूरे सफर में सुरक्षा के लिहाज से सहभागी रही।

कोई पेंशनर तो कोई सेवानिवृत्त

कोई पेंशनर तो कोई सेवानिवृत्त

पर्वतारोही सविता धपवाल ने बताया कि अभियान का एक लक्ष्य कम से कम खर्च में ट्रैकिंग पूरी करना था। इसलिए कई मौके ऐसे आए जब रास्ते में कोई अन्य साधन न होने पर श्मशान घाट में रुकना पड़ा। कई बार स्कूल भवन, नदी के किनारे से लेकर गांव में मिले खाली कमरे तक में रुकना पड़ा। उन्होंने बताया कि समूह की महिलाओं प्रतिदिन औसतन 13.5 घंटे पैदल चलती रहीं।उन्होंने बताया कि अभियान दल में सबसे कम उम्र 53 और सर्वाधिक उम्र में 68 वर्ष की प्रतिभागी थीं। यह सभी महिलाएं सेवानिवृत्त कॉर्पोरेट पेशेवर, सेवानिवृत्त सैनिक, गृहिणियां, सेवानिवृत्त लोकोमोटिव ड्राइवर,नानी-दादी और कामकाजी समूह का हिस्सा थीं।

माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली महिला थी सविता धपवाल

माउंट एवरेस्ट फतह करने वाली पहली महिला थी सविता धपवाल

टीम का नेतृत्व 1984 में एवरेस्ट फतह करने वाली पहली भारतीय महिला, महान पर्वतारोही और पद्म भूषण बछेंद्री पाल कर रही थीं। वहीं इस टीम में एवरेस्ट फतह करने वाले 2 और पर्वतारोही शामिल थे। जिसमें तेनजिंग नोर्गे एडवेंचर अवार्डी सविता धपवाल ने 1993 में अविभाजित मध्यप्रदेश से पहली महिला प्रतिभागी के तौर पर माउंट एवरेस्ट को फतह किया था। वहीं दूसरी एवरेस्ट विजेता पश्चिम बंगाल की चेतना साहू थी। तब बछेंद्री पाल के इस समूह को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में शामिल किया गया था।

वापसी के बाद इन लोगों से की सौजन्य मुलाकात

वापसी के बाद इन लोगों से की सौजन्य मुलाकात

अभियान के सफलतापूर्वक संपन्न होने के बाद 11 महिलाओं के इस दल ने देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू,उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर सहित कई मंत्रियों व प्रमुख लोगों से मुलाकात की। इसके पहले भिलाई से उनकी रवानगी पर भिलाई स्टील प्लांट के डायरेक्टर इंचार्ज अनिर्बान दासगुप्ता व अन्य वरिष्ठ अधिकारियों ने शुभकामनाएं दी थी, और नई दिल्ली में सेल चेयरमैन सोमा मंडल से भी सौजन्य मुलाकात की।

सविता ने 13 वीं बार फतह किया हिमालय

सविता ने 13 वीं बार फतह किया हिमालय

सविता धपवाल भिलाई स्टील प्लांट के शिक्षा विभाग में पदस्थ हैं। 1987 से अब तक वह 8 प्रमुख पर्वतारोही अभियान में हिस्सा ले चुकी हैं। वहीं इसके पहले 12 बार हिमालय की विभिन्न चोटियों की ट्रैकिंग कर चुकी हैं। सविता धपवाल ने भिलाई लौटने के बाद बताया कि अभियान को 8 मार्च को दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर खेल मंत्रालय में सचिव सुजाता चतुर्वेदी ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया था।

कारगिल विजय दिवस पर समाप्त किया अभियान

कारगिल विजय दिवस पर समाप्त किया अभियान

महिलाओं के समूह ने वास्तविक ट्रैकिंग ऐतिहासिक दांडी मार्च शुरू होने की तिथि की यादगार के तौर पर 12 मार्च से भारत-म्यांमार सीमा स्थित पंगसाउ दर्रे से शुरू हुई। जिसके बाद टीम अरुणाचल प्रदेश, असम, सिक्किम और पश्चिम बंगाल से होते हुए कुछ महत्वपूर्ण स्थानों हाशिमारा और रेशम मार्ग से होते हुए ज़ुलुक, कुलुप, नाथंग और नाथू ला दर्रा पहुंची। इस अभियान ने लमखागा दर्रा (17,320 फीट) पूरा किया, जो ट्रेकर्स के लिए तकनीकी रूप से बेहद चुनौतीपूर्ण था। हिमाचल क्षेत्र में उन्होंने सफलतापूर्वक भाबा दर्रे को पार किया। यहां से कज़ांड किब्बर पहुंचे और परंग ला दर्रा (18,300 फीट) अभियान का सबसे ऊंचा दर्रा फतह किया। इसके बाद टीम ने स्पीति घाटी से होते हुए लेह लद्दाख में प्रवेश किया और फिर कारगिल पहुंची। यहां 26 जुलाई को कारगिल विजय दिवस मनाने के लिए अभियान का समापन द्रास सेक्टर कारगिल में हुआ। यहां टीम ने द्रास सेक्टर में कारगिल युद्ध स्मारक में कारगिल विजय दिवस समारोह में शामिल हुई।

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